एकता व समुचित रणनीति की कमी से किसान आन्दोलन पहुंचा वर्तमान अंजाम तक

अगर हो जीत की चाहत मुहारत जंग की सीखो,
कदम दो आगे तो एक पीछे को लेना भी पड़ता है।
मुझे यह कहने में कोई झिझक नहीं कि जो हाल इस किसान मोर्चे का हुआ है, वह होना ही था, पहला किसान मोर्चा जिसकी वास्तविक उपलब्धि 3 कृषि बिल रद्द करवाने तथा कुछ वादे लेने के अतिरिक्त कुछ अधिक भी नहीं, परन्तु फि भी उस मोर्चे ने एक बड़ा प्रभाव अवश्य सृजित किया था, क्योंकि जिस प्रकार की मन-मज़र्ी तथा हठधर्मिता करने वाली सरकार थी व है, उसे पीछे हटने के लिए मजबूर करने ने देश और दुनिया में किसानों तथा विशेषकर पंजाबियों एवं सिखों के एक शांतिप्रिय संघर्षशील व एकजुटता वाले लोग होने की छवि बना दी थी।
परन्तु इस बार का मोर्चा चाहे किसानों की मांगों पर ही आधारित था, परन्तु यह बिना किसी तैयारी, बिना किसी मुहारत तथा अन्य वर्गों को साथ लेना तो दूर की बात, अपितु बिना अपने बड़े संगठनों को साथ लिए ही लगाया गया था। वास्तव में यह मोर्चा पहले किसान मोर्चे में लगे आरोपों, अमानत की बड़ी राशि, कुछ नेताओं का कद अधिक और कम उभरने, राजनीतिक नेताओं की किसान नेताओं से निकटता, आपसी ईर्ष्या तथा ‘मैं बड़ा, मैं अच्छा’ में से निकला था। इसका परिणाम पहले मोर्चे के बाद के महीनों के समाचार पत्रों में प्रकाशित अनेक समाचारों से मिल सकता है। पहला मोर्चा भी बेशक पंजाबियों को परेशान करता था, परन्तु उसके साथ आमतौर पर पंजाब के किसानों के अतिरिक्त अन्य वर्ग भी जुड़ गए थे और वे दिल्ली की दहलीज़ पर लगा हुआ था। पहले मोर्चे के बाद किसान संगठनों में फूट एवं अंह का कितना प्रभाव पैदा हुआ था, इसका अनुमान इस बात से ही लगाया जा सकता है कि इस समय पंजाब में कहने को लगभग सौ-सवा सौ किसान संगठन हैं, जिनमें से अनेक के पास तो 10-20 सदस्य भी नहीं होंगे। अनेक ने तो किसान संगठन के नाम को रोज़गार ही बना लिया और निजी विवादों में भी धरने देना, धमकाना तथा पैसे बनाने से भी गुरेज़ नहीं किया। प्रतिदिन सड़कें जाम होना तो अब आम पंजाबियों को भी चुभने लग पड़ा था। फिर यातायात तथा शांति किसी भी प्रदेश के आर्थिक, सामाजिक तथा शैक्षणिक विकास के लिए ज़रूरी होती है। मार्ग बंद होने के कारण पंजाब के व्यापार का ही नुकसान नहीं हुआ, अपितु आम जन को भी परेशानी में डाला और पंजाब का अरबों रुपये का नुकसान भी हुआ है। पंजाब में बाहर से कोई उद्योग लगाने के लिए आने हेतु निवेशक कम ही तैयार हुए। नि:संदेह किसानों की दलील है कि हम तो दिल्ली जा रहे थे, रास्ते तो हरियाणा सरकार ने रोके हैं, परन्तु उसे बहाना तो हमने ही दिया है। नहीं तो महात्मा गांधी ने कितने मोर्चे लगाए, कितनी बार हालात के अनुसार वापस लिए, मास्टर तारा सिंह भी ऐसा करते रहे। दूसरे विश्व युद्ध में युद्ध की रणनीति ही यह रही कि 2 कदम आगे एक कदम पीछे अर्थात जब तक बिना अपना बड़ा नुकसान होने के आगे बढ़ा जा सके, बढ़ते जाओ, जहां यह प्रतीत हो कि दुश्मन शक्तिशाली है, वहां ज़रूरत एवं रणनीति के अनुसार पीछे हटें, या मार्ग बदल कर आगे बढ़ें। सिर्फ आगे ही बढ़ना तथा लचकहीन होना किसी युद्ध, संघर्ष या लड़ाई को जीतने में समर्थ नहीं होता, अपितु लचकहीन शाखाएं तो हर तूफान में टूटती ही दिखाई देती हैं। वैसे भी जब कोई मरणव्रत इतना लम्बा हो जाता है कि उस पर विश्वास टूटने लग पड़े तो यह सुनिश्चित रूप में किसी भी संघर्ष के लिए हानिकारक हो जाता है। इस समय अनेक तरह की साज़िशों की चर्चा भी गर्म है, जिसका ज़िक्र करना इस समय उचित नहीं है, परन्तु जिस प्रकार इस मोर्चे का खात्मा हुआ है, जिस प्रकार लगभग नाममात्र विरोध के बाद पंजाब पुलिस इस मोर्चे को उठाने में सफल रही है, वह कई तरह के सवाल खड़े करता ही है, परन्तु जिस प्रकार यह मोर्चा खत्म हुआ, वह पंजाब के लिए एक खतरे की घंटी भी बजा गया है। हमें नहीं लगता कि अब पंजाबी तथा सिख कई वर्ष पंजाब तथा सिखों के साथ हुए अन्याय या नये होने वाले अन्याय का विरोध करने में समर्थ हो सकेंगे। हालांकि जिस प्रकार का दौर चल रहा है, एक तरफ पंजाब ‘पुलिस राज’ में तबदील होता दिखाई दे रहा है, दूसरी ओर देश में भी साम्प्रदायिकता बढ़ती जा रही है, उसमें पंजाबी एकता तथा सिखों में भी सरबत दा भला की भावना से आपसी एकता की सबसे अधिक ज़रूरत है, परन्तु अफसोस न तो पंजाबियों में इस समय बंगालियों तथा तमिलों की भांति भाषायी एवं सांस्कृतिक एकता है और न ही सिखों में किसी एकता के कोई आसार हैं। बस हन्ने हन्ने मीरी के अलग-अलग ध्वज तो हैं, परन्तु ताकत किसी के पास भी नहीं है। मुझे डर है कि हमारी हालत प्रसिद्ध शायर राहत इंदौरी के इस शे’अर जैसी न हो जाए : 
मुझ को रोने का सलीका भी नहीं है शायद,
लोग हंसते हैं मुझे देख के आते जाते।  
सदियों की परम्परा तोड़ी 
दुनिया भर का सिद्धांत है कि जब विरोधी देश, विरोधी गुट, विरोधी पार्टियां, यहां तक कि किसी को तोड़ कर अलग देश मांगने वाले गुटों के प्रतिनिधि भी बातचीत की मेज़ पर बैठने के लिए बुलाए जाते हैं तो उनकी सुरक्षा तथा आने-जाने के सुरक्षित मार्ग की गारंटी दी जाती है। बेशक सरकारों का अधिकार है कि कोई मोर्चा, कोई संघर्ष कानून का उल्लंघन करता है या आम जन के जीवन के लिए मुश्किलें खड़ी कर रहा है तो उसे हटाए, परन्तु ऐसा इतिहास के किसी भी दौर में कम ही हुआ है कि किसी पक्ष को बातचीत के लिए बुला कर गिरफ्तार कर लिया जाए। यह नैतिक रूप में किसी भी तरह उचित नहीं, परन्तु आगामी समय में इसका पंजाब की विश्वसनीयता पर गम्भीर प्रभाव अवश्य पड़ेग। आंदोलनरत संगठन जल्द सरकार पर विश्वास नहीं करेंगे। 
हिमाचल तथा सिख
नि:संदेह हम सैद्धांतिक रूप में हिमाचल में सिख युवाओं की गाड़ियां रोक कर जबरन उनसे निशान साहिब या संत भिंडरावाला की तस्वीरें उतारने को ़गैर-कानूनी धक्का समझते हैं, क्योंकि यदि इसमें किसी को कुछ गलत भी प्रतीत होता है तो कार्रवाई हिमाचल पुलिस करे और वह भी कानून के अनुसार, परन्तु किसी हिमाचली साम्प्रदायिक गुट को यह करने की अनुमति एवं विशेषकर कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं है। ऐसे घटनाक्रम के समय पुलिस का तामाशाई बनना तो किसी भी प्रकार उचित नहीं। परन्तु एक प्रश्न अपने आप को पूछना ज़रूरी है कि जब हिमाचल में संत भिंडरावाला से संबंधित कोई समारोह नहीं हो रहा तो हम उनकी तस्वीरें लगा कर साम्प्रदायिक ताकतों को खुलेपन का अवसर क्यों दे रहे हैं।  हालांकि सच यह है कि वास्तविक लड़ाई कांग्रेस सरकार तथा हिमाचल भाजपा की आपसी लड़ाई है, जिसका खमियाज़ा सिखों को भुगतना पड़ रहा है। फिर जब हिमाचल में हुई ज़्यादती के विरोध में हम स्वयं हिमाचल से आए वाहनों से ही धक्का करते हैं तो हम पंजाब से बाहर रहते हमारे सिख भाइयों के बारे में नहीं सोचते कि इसका उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ेगा। 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल में 79000 से अधिक सिख आबादी है, जो कुल आबादी का 1.16 प्रतिशत है। सो, आवश्यक है कि जहां भी सिखों के साथ अन्याय होता है, उसका जवाब देने के लिए हम स्वयं भी अन्याय करने न उतरें, अपितु अन्य अहिंसक तथा कानूनी तरीकों का सहारा लें। राजनीतिक स्तर पर बातचीत करें। नहीं तो जिस दौर में हम जीवन व्यतीत कर रहे हैं, उसके अनुसार ही हमें जीने के तरीके भी अपनाने चाहिएं और आपसी एकता को अपनी ताकत बनाना चाहिए, ताकि कोई हमसे अन्याय कर ही न सके। नुसूर वाहिदी के शब्दों में :
सलीका जिन को होता है ़गम-ए-दौरां में जीने का, 
वो यूं शीशे को हर पत्थर से टकराया नहीं करते।
पंजाब यूनिवर्सिटी तथा मास्टर तारा सिंह
पंजाब यूनिवर्सिटी में गुरु नानक रिसर्च इंस्टीच्यूट बर्मिंघ्म (यू.के.)यूनिवर्सिटी के अपने इतिहास विभाग तथा पंजाबी साहित्य अकादमी ने ‘पहला मास्टर तारा सिंह यादगारी लैक्चर’ करवाना था। हैरानी की बात है कि यूनिवर्सिटी के वी.सी. रेणु विग ने पूर्व राज्यसभा सांसद तरलोचन सिंह को उनके द्वारा लिखे पत्र के जवाब में बताया कि यह विद्यार्थियों की गतिविधियों के कारण स्थगित किया गया है, जबकि विद्यार्थियों का इससे कोई प्रत्यक्ष संबंध ही नहीं था।
 यूनिवर्सिटी के अध्यापकों ने भी इस लैक्चर को रद्द करने को राजनीति से प्रेरित बताया है, परन्तु शायद पंजाब यूनिवर्सिटी के अधिकारियों को नहीं पता कि मास्टर तारा सिंह ही वह देश भक्त शख्सियत थे, जिनके भारत के साथ जाने के फैसले के कारण आज पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, हिमाचल तथा कश्मीर भारत का हिस्सा हैं, नहीं तो पाकिस्तान की सीमा दिल्ली की दहलीज़ तक होती। इसलिए इस प्रकार की बहानेबाज़ी करके इतनी बड़ी शख्सियत संबंधी कार्यक्रम को बिल्कुल अंतिम समय पर रद्द करना वास्तव में ही बहुत निंदनीय कार्रवाई है। 

-मो. 92168-60000 

#एकता व समुचित रणनीति की कमी से किसान आन्दोलन पहुंचा वर्तमान अंजाम तक