ताश के पत्तों की कहानी 

किसी को भी निश्चित पता नहीं कि ताश की शुरूआत कब और कहां हुई। हर तर्क ठीक लगता है। एक मत के अनुसार ताश का खेल नौवीं शताब्दी में शुरू हुआ था क्योंकि भारत में यह तब तक बहुत प्रचलित हो चुका था। वहीं से यह खेल पूर्व तथा पश्चिम में फैला। ऐसा कहा जाता है कि पश्चिम को इस खेल की जानकारी यहां आने वाले यूरोपीय आक्रामकों से मिली थी। प्राचीनकाल के हर देश में ताश की अलग-अलग किस्में मिलती हैं। कई जगह इसके दस रंग के पत्ते होते थे, जैसा कि भारत में, क्योंकि ये दशावतारों के प्रतीक माने जाते थे।
एक मत के अनुसार ताश का आविष्कार 14वीं शताब्दी में फ्रांस के दरबार में हुआ था ताकि वहां के पागल सम्राट चार्ल्स का दिल लगाया जा सके। एक अन्य मत के अनुसार इसका आविष्कार महान इतालवी चित्राकार तथा वैज्ञानिक लियोनार्डो दविंशी ने किया था। एक लोकमत के अनुसार ताश का खेल पूर्व से यूरोपीय खानाबदोश अपने साथ लाए। यद्यपि इन सभी मतों का कोई भी प्रमाण नहीं मिलता पर इतना निश्चित है कि ताश का आविष्कार पूर्व में ही भारत या चीन में से ही हुआ था।
ताश के खेल का इतिहास आकर्षक है। शताब्दियों से न केवल ताश मनोरंजन के लिए खेली जाती है बल्कि इससे जुआ भी खेला जाता है। इससे कई तरह के खेल खेल सकते हैं क्योंकि आधुनिक ताश के बावन पत्तों को बांटने की कई विधियां प्रचलित हैं। इन खेलों में संयोग के साथ-साथ कौशल की भी ज़रूरत पड़ती है। हालांकि जुए के खेलों में संयोग ही अपनी भूमिका अदा करता है।
सबसे प्राचीन उपलब्ध ताश के पत्ते इतालवी डिजाइनों के मिलते हैं। इन पत्तों से फ्रांस के दरबार में 14वीं शताब्दी में खेला जाता था। यह पत्ते हाथ से चित्रित किए जाते थे। तब ताश की गड्डी आजकल की प्रचलित गड्डी से बड़ी थी तथा उसमें 75 या कभी इससे भी ज्यादा पत्ते होते थे। उसका एक हिस्सा तो आजकल की गड्डी की भांति होता था। 56 पत्ते चार रंगों के होते थे तथा उन पर संख्या भी आजकल के समान होती थी। फर्क सिर्फ इतना होता था कि गुलाम, बादशाह, ‘लाइट’ और बेगम को ताश के चित्रों में गिना जाता था। बाकी पत्तों पर संकेतिक तस्वीरें बनी रहती थी जिन्हें ‘टेरोट्रस’ कहा जाता था। यही नाम ताश की सारी गड्डी का भी था।
ये तस्वीरें जीवन के विभिन्न पक्षों का प्रतिनिधित्व करती थी और इनका आधार लोक कथाएं तथा लोक विश्वास होता था। इनका मूल अर्थ आज लुप्त हो चुका है। शैतान को भी इन तस्वीरों में शामिल किया जाता था तथा मृत्यु, सूर्य, चन्द्रमा, भाग्य का चक्र आदि की तस्वीरें इन पर बनी रहती थी। इसमें एक फालतू पत्ता भी होता था जिसे ली फो (मूर्ख) कहा जाता था और जो आधुनिक ‘जोकर’ का प्राचीन रूप कहा जा सकता है।
ब्रिटेन में ताश के पत्तों पर 1615 ई. से ही महसूल लगाया जा रहा है। कोर्ट कार्डस ताश की तस्वीरों को ‘कोट कार्डस’ कहा जाता था क्योंकि ताश की तस्वीरों को वस्त्र पहने हुए दिखाया जाता था लेकिन आगे चलकर इसे ‘कोर्ट कार्डस’ इसलिए कहा जाने लगा क्योंकि इसकी तस्वीरों के रूप में राजपुरूष अंकित रहते थे। ताश का एक अतिरिक्त पत्ता ‘जोकर’ होता है जिसकी कोई संख्या नहीं होती। खिलाड़ी इसे अपनी मर्जी से कोई भी पत्ता मान कर उसका उपयोग करते हैं। यूं किसी भी खेल में इसका कोई स्थान नहीं होता।
हुकुम के लिए अंग्रेजी शब्द स्पेड है जो इटली से आया है और जिसका अर्थ होता है तलवार। चिड़िया के पत्ते का चिन्ह तिन पत्तियों जैसा होता है। ताश के तस्वीरों वाले पत्तों पर पहले पुरूष सिर बने रहते थे क्योंकि तब ताश को युद्ध का खेल माना जाता था जिसमें स्त्रियों के लिए कोई स्थान नहीं था। तस्वीरों वाले पत्तों पर ऊपर नीचे दो सिरों का प्रचलन इसलिए हुआ ताकि पत्ता उलट कर देखने से दूसरे खिलाड़ियों को इसका पता न चल जाए।
ताश की चार रंग वाली पत्तों की गड्डी में 52 पत्ते वर्ष के 52 सप्ताहों के प्रतीक हैं तथा अलग दो रंग के तेरह पत्ते चंदमासों के प्रतीक हैं। 52 पत्तों तथा जोकर पर अंकित बिंदियों की कुल संख्या 365 होती है और यह वर्ष के दिनों की संकेत मानी जाती हैं। किसी समय चार बादशाहों को चार्लेमेगने, डेविड, ऐलेग्जेंडर और जुलियस सीज़र की प्रतिनिधि माना जाता था। सच्चाई तो यह है कि ताश से संबंधित प्रतीकात्मकता बड़ी विस्तृत रही है।
1463 में विदेशी ताश के लंदन में आयात करने पर रोक लगा दी गई थी तथा बड़े दिन या त्योहार के अतिरिक्त किसी साधारण दिन ताश खेलने की मनाही कर दी गई थी। 16वीं शताब्दी के अंत तक इसका प्रचलन आम हो गया और 1628 में ताश बनाने वाली वशियफुल कंपनी की स्थापना हुई आज ताश समस्त विश्व में प्रचलित है। 
बर्लिन के सरकारी संग्रहालय में पांच शताब्दियों के ताश के पत्तों की स्थाई प्रदर्शनी लगी हुई है। इस प्रदर्शनी से पता चलता है कि फ्रांस की क्रांति के समय बनी ताश के बादशाह, गुलाम और बेगम को समानता स्वतंत्रता और भ्रातृत्व के प्रतीकों के रूप में दिखाया गया है। नेपोलियन के पतन के बाद के बादशाह को रूसी पोशाक में दिखलाया जाता रहा है। (उर्वशी)

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