धान का रकबा कम करके फसली विभिन्नता लाने की ज़रूरत

धान की काश्त का रकबा कम करके फसली विभिन्नता लाने के लिए विगत लम्बे समय से लगातार यत्न किए जा रहे हैं, लेकिन सफलता नहीं मिली। धान की काश्त का रकबा हर साल बढ़ रहा है, जो अब 32 लाख हेक्टेयर को पार कर गया है। इससे भू-जल का स्तर कम होता गया और किसानों को सबमर्सिबल पम्प लगाने पड़े। संगरूर ज़िले के कनकवाल गांव में धान और गेहूं की काश्त करने वाले ‘आईएआरआई फैलो फार्मर’ पुरस्कार से सम्मानित प्रगतिशील किसान सुखजीत सिंह भंगू कहते कि किसान धान का रकबा इसलिए कम नहीं कर रहे हैं क्योंकि खरीफ के मौसम में धान जितना मुनाफा देने वाली कोई अन्य वैकल्पिक फसल नहीं है। धान के लिए एमएसपी है और सरकारी खरीद होती है। पिछले कुछ समय से कुछ रकबा बासमती की काश्त में अवश्य आया, परनतु इस वर्ष कम हो गया।
 हालांकि कृषि एवं किसान कल्याण विभाग के निदेशक डॉ. गुरजीत सिंह बराड़ का कहना है कि यह गत वर्ष के 6.70 लाख हेक्टेयर रकबे को छू लेगा, क्योंकि पिछले कुछ दिनों से पूसा बासमती-1509 किस्म जो पकने को कम समय लेती है और निर्यात की जाने के कारण मंडीकरण में कोई मुश्किल नहीं आती, तेज़ी से लग रही है और उसकी रोपाई जुलाई से बाद भी 2-3 अगस्त तक होती रहेगी। 
पश्चिम एशिया में ईरान-अमरीका युद्ध के बावजूद बासमती निर्यातकों के अनुसार बासमती चावल की मांग जारी रहेगी और आगामी समय में इसका निर्यात तेज़ी से बढ़ने की संभावना है। घरेलू मंडी में भी बासमती की मांग बरकरार है। आईसीएआर—इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट द्वारा अगले साल से किसानों को बासमती की एक और किस्म आज़माइश के बाद विकसित करके दी जाएगी, जो संस्थान के संयुक्त निदेशक (अनुसंधान) डॉ. विश्वानाथन सी. के अनुसार बकाने, ब्लास्ट और बैक्टीरियल लीफ  ब्लाइट (झंडा रोग, भुरड़ रोग और झुलस रोग) से मुक्त होगी। ये किस्में किसानों तक पहुंचने से बासमती की काश्त का भविष्य और रौशन हो जाएगा। यह किस्म वर्तमान पूसा बासमती-1509 से बेहतर होगी।
फसली विभिन्नता को दूसरा झटका नरमा-कपास की काश्त का रकबा कम होने से भी लगा है। पिछड़ रही फसली विभिन्नता के नुकसान की भरपाई के लिए पंजाब सरकार द्वारा खरीफ सीज़न में 60 हज़ार हेक्टेयर रकबे में मक्के की काश्त जारी रखने की योजनाबंदी की गई है। कृषि विभाग के निदेशक डॉ. बराड़ के अनुसार पंजाब में मूंगफली की काश्त बढ़ाई जाएगी, जिसके लिए किसानों को उपलब्ध करवाने के लिए 500 क्ंिवटल बीज दूसरे राज्यों से मंगवाया गया है। अरहर की काश्त का रकबा भी बढ़ाया जाएगा और मूंग की काश्त पर भी ज़ोर दिया जाएगा। केंद्र द्वारा बनाई गई योजनाओं के तहत कुछ रकबा तिलहन फसलों की काश्त के अधीन लाया जाएगा। इस तरह कुछ रकबा धान के अलावा अन्य फसलों के अधीन लाए जाने के बावजूद प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. सरदारा सिंह जौहल और अंतर्राष्ट्रीय चावल विशेषज्ञ डॉ. गुरदेव सिंह खुश जैसे विशेषज्ञों द्वारा 10 लाख हेक्टेयर रकबा धान की काश्त से निकालने की जो सिफारिश की गई है, उसमें सफलता मिलने की कोई उम्मीद नहीं है, जब तक धान जितना मुनाफा देने वाली वैकल्पिक फसलें किसानों तक नहीं पहुंच जातीं। इसके अलावा फलों की काश्त का रकबा बढ़ाने की गुंजाइश है। इस समय फलों की काश्त 41-42 लाख हेक्टेयर बिजाई अधीन रकबे में से 2-3 प्रतिशत रकबे पर की जाती है, जबकि यह रकबा 6-7 प्रतिशत तक हो सकता है। फलों की काश्त अधीन लगभग आधे रकबे में अकेले किन्नू ही लगे हुए हैं। इस फल के बाग भी कुछ रकबे से उखाड़े जा रहे हैं। आम की काश्त का रकबा बहुत कम है। पंजाब की जलवायु और मिट्टी आम की काश्त के लिए अनुकूल है।
इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टीच्यूट द्वारा आम की अम्रपाली, मलिका, पूसा अरुणिमा, पूसा सूर्या, पूसा प्रतिभा, पूसा श्रेष्ठ, पूसा लालिमा और पूसा पतम्बर आदि जैसी अन्य बौनी किस्में विकसित की गई हैं। इनके लंगड़ा, दशहरी, चोसा तथा अन्य पारम्परिक किस्मों से अधिक पौधे प्रति हेक्टेयर लग जाते हैं, जिससे अधिक उत्पादन मिलता है। अम्रपाली और मलिका व्यापारिक किस्में बन गई हैं। इनका फल मंडी में अन्य परम्परागत किस्मों के मुकाबले अधिक कीमत पर बिक रहा है। इसलिए प्रत्येक वर्ष फल देने वाली पूसा की बौनी किस्मों के बाग लगाना ज़्यादा लाभदायक है। इन बौनी किस्मों के पौधे खेतों में ट्यूबवेलों और घरेलू बागीचियों में भी लगाए जा सकते हैं। इन बौनी किस्मों की काश्त पंजाब में की जा सकती है। इसके अलावा सब्ज़ियों की काश्त के अधीन कुछ रकबा बढ़ाया जा सकता है। आईएआरआई ने पूसा विशेष और अन्य सब्ज़ियों की किस्में विकसित की हैं और पीएयू ने भी कई सब्ज़ियों की किस्में विकसित की हुई हैं, जिन्हें लगाना अधिक लाभदायक है। किसानों की आय बढ़ाने और पंजाब की भूमि की उपजाऊ  शक्ति एवं पर्यावरण बनाए रखने के लिए फसली विभिन्नता बहुत ज़रूरी है, जिसके लिए सरकार को पूरा महत्व देना चाहिए और किसानों की खुलकर सहायता करनी चाहिए।

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