अथ कॉकरोच गाथा

पिछले दिनों से शब्द ‘कॉकरोच’ इतनी बार सुना है, कि चलते-फिरते, ऊपर-नीचे, कपड़े पहनते, उतारते हमें हर ओर कॉकरोच नज़र आने लगे हैं।
एक बड़ी कुर्सी पर बैठे एक आदमी ने सड़कों, पार्कों और गलियों में मटरगश्ती करते, हंसी ठट्ठा करते नौजवानों को कभी कॉकरोच कह दिया था। भई बड़ा निकृष्ट प्राणी होता है यह कॉकरोच। सदियों से यह आदमी और इसके अर्थहीन जीवन का पीछा करके उसे और भी अर्थहीन कर रहा है। आपको हंसते मुस्कराते, एक दूसरे से प्यार मोहब्बत करते, रूठते मनाते युवा बल इन बड़े प्राणियों को कॉकरोच नज़र आ रहे हैं।
इन्होंने उपेक्षा से उन्हें कॉकरोच कहा और उन्होंने व्यंग्य के साथ इसे स्वीकार कर लिया। फिर दिन-रात वे एक प्रदर्शन स्थल पर इकट्ठे हो गये, एक छोटी-सी मांग लेकर कि ‘हमें ठीक  से पढ़ने दो, ठीक से हमारी मेहनत के नतीजे निकाल दो, और उसके बाद निश्चित रूप से किसी काम-धाम की मंज़िल पर पहुंचा दो।’
आपने समझा, वे राजनीतिज्ञों के खिलौने हैं, लेकिन वे तो धारा का एक प्रबल आवेश थे, जो देश के कोने-कोने से उठा, और उस स्थान पर इकट्ठा हो गया। कॉकरोच तो थोड़े होते हैं न, यहां तो अनगिनत कॉकरोच इकट्ठे हो गये, जो इस देश की प्रेरणा महात्मा गांधी का आंदोलन और प्रदर्शन अपना कर उसी तरीके से अहिंसा और गरिमापूर्ण शांति का मार्ग अपना कर अपनी बात कहना चाहते थे, कि हमें ठीक से पढ़ने दो। अपनी मानसिकता हम पर न लादो। जिस ऊंची इमारत पर बड़े लोग बैठ कर देश की किस्मत का फैसला करते हैं, वे वहां तक जा कर अपनी आवाज़ पहुंचाना चाहते थे। रास्ते में व्यावधान खड़े कर दिए गये। वे और आगे बढ़े तो उन पर अश्रु गैस के गोले बरसाये गये, लाठियां भांजी गईं और पत्थरों की बरसात की गई। जी हां, वही पत्थरों के ट्रक जो आपने उनके प्रदर्शन केन्द्र के बाहर खड़े किए थे, ताकि वे उन्हें अपने हाथों में उठा कर असली कॉकरोच हो जायें। लेकिन उनका सैलाब पत्थरों के साथ गुण्डागर्दी करने नहीं आया था, अपनी ज़िन्दगियों के लिए राहत की सांस मांगने आया था। लंगर की कतार में लग कर मुफ्त राशन छकने की बजाय अपने निठल्ले हाथों के लिए काम मांगने आया था, लेकिन काम देने का वायदा नहीं, यहां तो पत्थर बरसने और अश्रु गैस के गोले उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। आप बताइए, कॉकरोच कौन थे। वह युवा बल जो देश के नव-निर्माण के लिए मेहनत करने का आपसे मौका मांगने आए थे। यह कहने आए थे कि हमें ठीक से पढ़ा कर नये युग के लिए हमारा सही मूल्यांकन कर हमें तैयार कर दो या कि वे लोग जो लाठी और अश्रु गैस के गोलों से उनका स्वागत कर रहे थे। 
आपने उन्हें कॉकरोच कहा, लेकिन तनिक सोचिये, ये कॉकरोच कहां से आये? आपने ही तो उन्हें पैदा किया, लेकिन जैसे इन्सान का बेटा इन्सान और पशु की सन्तान पशु होती है, इसीलिए ये कॉकरोच भी तो किसी कॉकरोच के ही बेटे होंगे। आप खुद बड़े कॉकरोच थे न जिन्होंने ये छोटे-छोटे कॉकरोच पैदा किए जो आज मिल कर इस कॉकरोच युग का अंत कर देना चाहते हैं।
आपने क़ाफका की कहानी ‘मैटामारफेज़िज’ या ‘कायाकल्प तो पढ़ी ही होगी, जिसमें एक अच्छा भला आदमी एक बड़े कीड़े में तबदील हो जाता है, क्योंकि इस व्यवस्था ने उसका जनक बन कर उसे एक कीड़े में तबदील कर दिया। एक कीड़े जैसी ज़िन्दगी जीने के सिवा हमारे पास अब और विकल्प ही क्या बचा है? जैसे वह कहानी एक आज़ाद सांस लेने के लिए छटपटाती है, वैसे ही आपने अपनी भावी पीढ़ी के लिए एक कॉकरोच युग की रचना कर दी, और अब उन्हें अपनी बहुमंज़िली इमारतों में अवस्थित होकर उन्हें कॉकरोच कह कर नकार रहे हो।
कॉकरोच युग ही तो रच दिया आपने, जहां बरस भर किताबों में माथा फोड़ने के बाद जब वे लोग अपने व्यक्तित्व का मूल्यांकन करवाने के लिए परीक्षा भवन में आये, तो वहां बड़े-बड़े कॉकरोच बैठे हुए थे, जिन्होंने उनकी परीक्षाओं को एक दुकान बना  दिया, और उनके प्रश्न-पत्रों को बेच-बेच कर रंक से राजा होने लगे। कहने को सज़ा देने के लिए इन दोषियों के लिए बड़े सख्त कानून बनाये गये। उन्हें और भी सख्त बनाया जा रहा है परन्तु पिछली चौथाई सदी में करोड़ों परीक्षार्थियों का भाग्य बरबाद करने वालों में से अपने पकड़े पैंतालिस और दण्ड दिया दो को। अब बताओ असली कॉकरोच कौन है? पेपर लीक के दुर्भाग्य को स्वीकार कर दूसरी बार परीक्षा देता नौनिहाल या उसके पेपर चुरा उसे बार-बार परीक्षा देने के लिए मजबूर करता परीक्षा नियंत्रक।
इन कॉकरोच का आंदोलन तो दोषी को प्रतीकात्मक दण्ड दिलवा कर खत्म हो गया, लेकिन असली कॉकरोचों को कौन खत्म करेगा, जिन्होंने अपनी नैतिकता विहीन हरकतों से सारी दुनिया को कॉकरोच बना कर अपनी बाहों में समेट रखा है। आज जिन युवकों को कॉकरोच कह उपेक्षित करते हो, समय कहता है कि वही कॉकरोच महाकाल बन कर दुनिया पर हावी हो गए इस कॉकरोच युग का अंत करेंगे।

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