भारतीय ज्ञान परम्परा का पर्वोत्सव है गुरु पूर्णिमा
भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसने ज्ञान को केवल जानकारी नहीं माना बल्कि आत्मोन्नति और लोककल्याण का साधन माना है। इसलिए गुरु का स्थान हमारे समाज में सबसे ऊपर रहा है। गुरु अज्ञान रूपी अंधकार से निकालकर हमें ज्ञान का प्रकाश दिखाता है, जो केवल शिक्षा नहीं देता बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाता है। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है और गुरु तथा ईश्वर एक साथ खड़े हों तो पहले गुरु को प्रणाम करने के लिए कहा गया है। यही कारण है कि आषाढ़ पूर्णिमा जिसे गुरु पूर्णिमा भी कहते हैं, को भारतीय ज्ञान परम्परा का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है।
यह केवल एक धार्मिक तिथि भर नहीं है। यह भारतीय सभ्यता की उस चेतना का प्रतीक है, जिसने ज्ञान, विनम्रता और कृतज्ञता को जीवन का सर्वोच्च मूल्य माना है। गुरु पूर्णिमा का संबंध महर्षि वेदव्यास से माना जाता है, जिन्होंने वेदों का संकलन, महाभारत की रचना, अठारह पुराणों का सम्पादन और भारतीय आध्यात्मिक परम्परा को साहित्यिक रूप से व्यवस्थित स्वरूप दिया है। आषाढ़ पूर्णिमा पर महर्षि वेदव्यास का इस कदर प्रभाव है कि इसे व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है। भारतीयों ने वेदव्यास को केवल एक महान ऋषि नहीं माना बल्कि समूची ज्ञान-परम्परा का आधार स्तम्भ माना है। गुरु पूर्णिमा पर उन्हें स्मरण करना वस्तुत: उस अखंड ज्ञान धारा को प्रणाम करना है, जिसने हजारों वर्षों से भारतीय समाज का मार्गदर्शन किया है। शायद इसलिए कबीर दास ने कहा है-
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।।
यह दोहा भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व को अत्यंत सरल शब्दों में व्यक्त करता है।
गुरु पूर्णिमा केवल सनातन धर्म परंपरा तक सीमित नहीं है। बौद्ध धर्म में इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में अपने पांच शिष्यों को पहला उपदेश दिया था जिसे धर्मचक्र प्रवर्तन कहा जाता है। इसीलिए बौद्ध धर्मानुयायियों के लिए भी यह दिन अत्यंत पवित्र है। इसके साथ ही चूंकि जैन धर्म में आचार्य परंपरा का विशेष महत्व है और साधु, संतों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की भावना भी है, इसलिए यह जैन परंपरा और सिख धर्म परंपरा के लिए भी महान दिन है। सिख धर्म तो पूर्णत: गुरुओं की आस्थाओं और उनकी परंपरा का ही विस्तार है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब को तो शाश्वत गुरु मानने की अवधारणा है। इसलिए भारतीय आध्यात्मिक चेतना में गुरु का स्थान किसी एक धर्म तक सीमित नहीं है बल्कि समूचे भारतीय आध्यात्मिक चेतना और परंपरा में ही इसकी व्याप्ति है। भारत में गुरु केवल धार्मिक ही नहीं होते, हमारी समूची संस्कृति भी गुरुओं के प्रताप पर टिकी है। चाहे संगीत में उस्ताद हों, चाहे नृत्य में आचार्य हों, योग में योगगुरु हों, शिल्प में कारीगर हों और जीवन में शिक्षा गुरु हों। कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां भारतीय संस्कृति गुरुओं के प्रताप के बिना एक कदम भी आगे चलती हो।
यहां तक कि प्रकृति, अनुभव और असफलता को भी गुरु का दर्जा दिया गया है। इसका कारण यह है कि भारतीय चिंतन में सीखना एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। जो हमें बेहतर बनाता है, वह किसी न किसी रूप में हमारा गुरु है। इसलिए आज जब शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है, ऐसे समय में गुरु पूर्णिमा का महत्व और बढ़ जाता है ताकि हम इंटरनेट और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इस युग में न भूलें कि सिर्फ जानकारियां ज्ञान नहीं होतीं। इसलिए गुरु का स्थान जीवन में कोई तकनीक या मशीन नहीं ले सकती। गुरु का स्थान भारतीय सभ्यता में हमेशा-हमेशा के लिए सुरक्षित रहेगा क्योंकि जो हमें गुरु देता है, वह कोई भी कृत्रिम या निर्जीव चीज नहीं दे सकती। इसलिए जानकारियां हम कहीं से हासिल कर लें, ज्ञान, संवेदना और विवेक तो हमें गुरु से ही मिलना है। नैतिक दृष्टि से भी गुरु पूर्णिमा का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि गुरु हमें केवल सफलता प्राप्त करना नहीं सिखाता बल्कि सफलता को विनम्रता, ईमानदारी और सेवा के साथ जोड़ना भी सिखाता है। वो बताता है कि ज्ञान का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि समाज तथा मानवता का कल्याण भी है। इसीलिए भारतीय परंपरा में ज्ञान को दान, सेवा और करुणा से भी जोड़ा गया है।
गुरु पूर्णिमा वास्तव में भारतीय संस्कृति का एक ऐसा उत्सव है, जो हमें यह सिखाता है कि ज्ञान ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है और गुरु उस ज्ञान का सबसे विश्वसनीय स्रोत है। ऐसे में समय बदल सकता है, शिक्षा के साधन बदल सकते हैं, लेकिन गुरु की आवश्यकता कभी समाप्त नहीं हो सकती। जब तक मनुष्य सत्य, विवेक और आत्मबोध की खोज करता रहेगा, तब तक गुरु पूर्णिमा भारतीय संस्कृति के सबसे प्रकाशमान पर्वों में से एक बनी रहेगी। यही इस पर्व का धार्मिक और सांस्कृतिक तथा नैतिक संदेश है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



