छात्रों से किये वायदों से क्या मुकर रही है सरकार ?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर करीब 36 दिन तक चला छात्र आंदोलन केवल एक शिक्षा मंत्री के इस्तीफे का आंदोलन नहीं था। यह देश की परीक्षा व्यवस्था, युवाओं के भविष्य और सरकारों की जवाबदेही पर उठे गंभीर सवालों का प्रतीक था। इसलिए जब केन्द्र सरकार और आंदोलनकारियों के बीच तीन वायदों पर समझौता हुआ, जिसके बाद आंदोलन खत्म करने की घोषणा की गई, तो केवल आंदोलनकारी ही नहीं पूरी देश ने राहत की सांस ली। सरकार द्वारा आंदोलनकारी छात्रों से किये गये इन तीन वायदों से यह आंदोलन खत्म हुआ था-
* तत्कालीन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा देंगे।
* आंदोलनकारियों के खिलाफ दर्ज एफआईआर व अन्य कानूनी मामलों को वापस लिया जायेगा तथा भविष्य में उन पर किसी तरह की कोई कार्रवाई नहीं की जायेगी।
* परीक्षाओं में ज़रूरी सुधार किए जाएंगे तथा प्रभावित परिवारों के लिए सहायता/मुआवजे की प्रक्रिया पूरी की जायेगी। 
लेकिन अभी इस समझौते को तीन दिन भी पूरे नहीं हुए कि लगता है, केन्द्र सरकार किये गये वायदे से मुकर रही है और उसके इशारे पर अलग-अलग राज्य सरकारें, छात्रों के साथ सख्त बर्ताव करने पर आमादा हो गई हैं। सोशल मीडिया में वायरल खबरों के मुताबिक, जो हो सकता है पूरी तरह से सही न हों, लेकिन जिस तरह से तमाम छात्र और उनके घरवाले कह रहे हैं कि बिहार में लगभग 700 छात्रों पर अलग-अलग तरह के चार्ज लगाये गये हैं जिन्हें अभी तक वापस नहीं लिया गया, जिसके विरोध में 26 दिनों तक भूख हड़ताल करने वाली आइसा नेता नेहा बोरा ने 28 जुलाई 2026 को पटना में छात्रों के साथ मिलने, प्रेस कॉन्फ्रैंस करने और सड़कों पर उतरकर विरोध जताने का निर्णय लिया है क्योंकि सरकार वायदा करने के बावजूद छात्रों के विरुद्ध लगता है, कार्रवाई की योजना बना रही है। अगर वाकई ऐसा होगा तो न सिर्फ फिर से अराजक स्थिति पैदा होने की स्थितियां बन जाएंगी बल्कि केन्द्र सरकार की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लग जायेगा।
लोकतंत्र में सरकार की सबसे बड़ी ताकत उसका बहुमत नहीं बल्कि उसकी विश्वसनीयता होती है। जब कोई सरकार आंदोलन समाप्त कराने के लिए सार्वजनिक मंच से आश्वासन देती है, तो वह केवल आंदोलनकारियों से नहीं बल्कि पूरे देश से वायदा करती है। ऐसे में यदि अब केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें आंदोलनकारी छात्रों को परेशान करती हैं, उनके विरुद्ध केस दर्ज करती हैं, उनके साथ ही उनके मां-बाप को भी कई तरह की परेशानियों में डालती हैं, तो न केवल केन्द्र बल्कि उसके फैसले पर अमल न करने वाली राज्य सरकारों की भी राजनीतिक साख दांव पर लग जायेगी। अगर केन्द्र सरकार अपने वायदे से मुकरती है, तो न केवल पहले से ज्यादा स्थिति खराब हो सकती है बल्कि अगली बार शायद ही किसी आश्वासन पर आंदोलनकारी विश्वास करें। हालांकि यह कॉकरोच जनता पार्टी के प्रतिनिधियों की शायद राजनीतिक अपरिपक्वता ही थी कि उन्होंने सरकार के नुमाइंदों द्वारा किये गये मुंहजुबानी आश्वासन पर भरोसा कर लिया। जबकि राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव जैसे अनुभवी आंदोलनकारियों ने समझौते से पहले और उसके बाद भी यह आशंका जतायी थी कि शायद मुंहजुबानी वायदों से सरकार पीछे भी हट सकती है। योगेंद्र यादव ने तो बाद में एक इंटरव्यू में यह भी कहा कि आंदोलनकारियों की राजनीतिक अपरिपक्वता के कारण ऐसा हुआ।
लेकिन यह चकमा देने का खेल नहीं है। यह पूरे 140 करोड़ भारतीयों से किये गये वायदों की विश्वसनीयता का सवाल है। हालांकि यह भी सही है कि अब तक सरकार की ओर से ऐसा कोई आधिकारिक आदेश, अधिसूचना या न्यायिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया कि सरकार किये गये वायदों से मुकर रही है, लेकिन इसकी आशंका इसलिए बन गई है, क्योंकि आंदोलन खत्म हुए 48 से ज्यादा घंटे बीत चुके हैं, लेकिन अभी तक सरकार की तरफ से किये गये वायदों का कोई लिखित स्वरूप सामने नहीं आया। ऐसा सिर्फ बिहार पुलिस और उत्तर प्रदेश की कुछ छुटपुट कार्रवाइयों और सरकार के अब तक चुप्पी साधे होने के कारण ही अनुमान लगाया जा रहा है और इसी अनुमान से चिंतित होकर आंदोलनकारी छात्र फिर से गोलबंद होने की कोशिश कर रहे हैं, जिनको छात्र नेता नेहा बोरा संबोधित कर चुकी हैं। बहुत संभव है कि ये खबरें झूठी हों किन्तु लोकतंत्र की मजबूती के लिए ऐसा होना ही चाहिए।
मगर यदि ये खबरें सही साबित होती हैं और सरकार का कोई एक्शन आंदोलनकारियों के विरुद्ध अगले दो चार दिन में सामने आता है, तो यह बहुत खराब स्थिति होगी। सबसे पहले तो युवाओं का सरकार पर भरोसा उठ जायेगा और अगर वो दूसरी बार फिर किसी आक्रोश और आवेग के साथ एकत्र हुए तो उन्हें काबू कर पाना आसान नहीं होगा। पिछले कुछ सालों में जिस तरह प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक हुए हैं, सरकारी भर्तियों में देरी और रोज़गार सृजन में असफलता हाथ लगी है, उससे छात्रों में जो गुस्सा है, वह तात्कालिक और किसी नेता विशेष के विरुद्ध गुस्सा नहीं था बल्कि वे मौजूदा सरकार से ही बेहद असंतुष्ट हैं और तिनके के सहारे के रूप में अगर युवाओं के गुस्से में पानी डालने या उन्हें तकनीकी रूप से शांत कराने का मौका मिला है, तो सरकार को न केवल यह मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहिए बल्कि इस बन चुकी स्थिति से सबक लेते हुए ऐसी स्थिति पैदा करनी चाहिए कि युवाओं का उससे जो भरोसा उठ गया दिखता है, वो भरोसा फिर से कायम हो सके। तभी केन्द्र सरकार ने अगले 20 सालों के लिए जो महत्वाकांक्षी मिशन विकसित देश का बना रखा है, उस दिशा में उसे आगे बढ़ने का मौका मिलेगा।
लेकिन यदि सरकार ने शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी एक कसक और छिपी हुई हार के रूप में महसूस करने की कोशिश की तो बात बिगड़ जायेगी और सारे दूरगामी लक्ष्य अपनी नाक ऊंची करने की जद्दोजहद में सिमट जाएंगे। सिर्फ छात्र और आम लोग ही सरकार के पीछे हटने से विचलित नहीं होंगे बल्कि विपक्ष भी इस स्थिति का जमकर फायदा उठायेगा और इसे सरकार की वायदा खिलाफी के रूप में दर्ज करेगा। लोकतांत्रिक आंदोलन अकसर बातचीत के माध्यम से ही समाप्त होते हैं और जब किसी बातचीत पर भरोसा करके आंदोलनकारी अपना आंदोलन समाप्त करते हैं, तो इस विश्वास पर करते हैं कि सरकार उनके साथ किये गये वायदों पर खरा उतरेगी लेकिन यदि ऐसा नहीं होता तो फिर शायद अगली बार सरकार और नागरिकों के बीच विश्वासपूर्ण संवाद कठिन हो जाए। 
अगर केन्द्र सरकार वायदा करने के बाद किये गये किसी वायदे को पूरा करने से मुकरती है, तो उसे उन तमाम ज्वलंत सवालों के जवाब देने होंगे, जिन्हें अभी आंदोलनकारी अपनी एक मांग के पूरे हो जाने की शायद खुशी में भुलाये बैठे हैं। बिना वर्दी और बिना नाम पट्टिका के छात्रों पर लाठीचार्ज करने वाले पुलिसकर्मी, पुलिसकर्मियों के डंडे जिनमें कीले मौजूद थीं और आंदोलकारियों पर पालेट गन से हमला, ये सब वो दबे हुए सवाल हैं, जो अगर अपनी पूरी ताकत से उभर आएं तो सरकार को जवाब देना मुश्किल हो जायेगा। इसलिए बेहतर है कि जो समझौता हो चुका है और जिसकी एक सार्वजनिक जवाबदेही बनती है, सरकार उससे न मुकरे।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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