आलसी जीव होता है शैल कृमि
समुद्री शैल कृमि एक समुद्री कृमि है। इसे अंग्रेजी में एकार्न वार्म कहते हैं। यह एक आलसी जीव है तथा एक ही स्थान पर झुंड बनाकर रहता है। कभी-कभी इसके बहुत बड़े-बड़े झुंड भी देखने को मिल जाते हैं। शैल कृमि सागरों और महासागरों के उथले तटों पर पाया जाता है। यह सागर तल की रेत अथवा कीचड़ में मांद बनाता है एवं अपना अधिकांश समय इसी मांद में व्यतीत करता है। शैल कृमि अंग्रेजी के यू के आकार की ऐसी मांद तैयार करता है, जिसमें कम से कम दो प्रवेशद्वार हों सामान्यतया इसकी मांद 25-30 सेंटीमीटर लंबी होती है, किंतु ब्राजील के सागर तटों पर पाया जाने वाला शैल कृमि कई मीटर लंबी मांद बनाता है।
शैल कृमि की शारीरिक संरचना अन्य समुद्री कृमियों से भिन्न होती है। इसकी अनेक जातियां हैं तथा प्रत्येक जाति के कृमि की शारीरिक संरचना में भी आपस में कुछ भिन्नाएं होती हैं। सामान्यतया शैल कृमि की लंबाई 10 सेंटीमीटर से लेकर 20 सेंटीमीटर तक होती है। किंतु ब्राजील के सागर तटों पर पाया जाने वाला बैलेनोक्ला ससगिगास नामक कृमि एक मीटर से भी अधिक लंबा होता है। इसी प्रकार की भिन्नता इसके रंगों में भी देखने को मिलती है। इसके सिर और आसपास का भाग हल्का नीला और सफेद होता है तथा शरीर लाल पीला एवं कत्थई होता है। कभी-कभी कुछ अन्य रंगों के शैलकृमि भी देखने को मिल जाते हैं।
शैल कृमि के शरीर को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है। इसके शरीर के सबसे आगे के भाग में सिर होता है एवं सिर का आगे का भाग सूंड की तरह निकला हुआ होता है। इसके बाद मध्य में पतली सी गर्दन होती है, अंत में तीसरा भाग होता है। यह भाग सबसे बड़ा होता है और ऊपर से नीचे की ओर लगातार पतला हो जाता है तथा अंत में सांप की पूंछ की तरह नुकीला सा हो जाता है। शैल कृमि का मुंह इसके शरीर के पहले और दूसरे भाग के मध्य में होता है। इसके अन्य प्रमुख अंग शरीर के तीसरे भाग में होते हैं। शैल कृमि के शरीर पर जोड़ेदार गलफड़ों वाले छिद्र होते हैं, जिनसे यह सांस लेता है। इसकी अलग-अलग जातियों में गलफड़ों वाले छिद्रों की संख्या अलग-अलग होती है। सामान्यतया बड़े आकार के शैल कृमियों के गलफड़े वाले छिद्रों की संख्या छोटे शैल कृमियों के गलफड़ों के छिद्रों से अधिक होती है। इसके साथ ही कृमि की आयु से भी इसका सीधा संबंध होता है।
शैल कृमि की जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, इसके गलफड़े वाले छिद्रों की संख्या भी बढ़ती जाती है। शैल कृमि के शरीर में रक्त नलिकाएं होती हैं एवं इनमें रक्त संचार भी होता है, किंतु इसका रक्त पानी की तरह रंगहीन होता है, अत: दिखाई नहीं देता। शैल कृमि का तंत्रिका तंत्र भी बड़ा विकसित होता है। यह अपने तंत्रिका तंत्र की सहायता से ही खतरा निकट होने पर सावधान हो जाता है और यदि इसका शत्रु इसके सामने ही आ जाए तो यह बड़ी तेजी से पीछे की ओर भागता है। यह शैल कृमि का एक विशिष्ट गुण है जो अन्य समुद्री कृमियों में देखने को नहीं मिलता।
शैल कृमि एक आलसी जीव है। यह प्राय: अपनी मांद के भीतर पड़ा रहता है और मांद के भीतर ही भोजन करता है। शैल कृमि का प्रमुख भोजन रेत में पाए जाने वाले छोटे-छोटे खाद्य कण हैं। इसके साथ ही यह रेत में पाए जाने वाले बहुत छोटे-छोटे जीवों को भी अपना आहार बनाता है। शैल कृमि अपने शरीर के पहले भाग में स्थित सूंड और सूंड के सीलिया की सहायता से भोजन प्राप्त करता है। इसके सीलिया पानी में जलधाराएं उत्पन्न करते हैं, जिससे रेत और पानी में मिले हुए जीव पानी के साथ इसकी सूंड तक पहुंच जाते हैं। शैल कृमि की सूंड से हमेशा एक विशेष प्रकार का चिपचिपा पदार्थ निकलता रहता है, जिसमें छोटे-छोटे जीव और कण फंस जाते हैं। इन कणों को सूंड द्वारा मुंह तक पहुंचा दिया जाता है और मुंह से ये इसके शरीर के भीतर पहुंच जाते हैं।
शैल कृमि के मुंह के बाल बड़े संवेदनशील होते हैं। ये रेत एवं पानी के साथ आने वाले कणों को छांटने का काम करते हैं। सीलिया के द्वारा रेत एवं पानी के साथ आने वाले अखाद्यकण एवं बड़े कण पुन: पानी में लौटा दिए जाते हैं तथा मुंह तक छोटे-छोटे जीव एवं खाद्य कण ही पहुंचाए जाते हैं। शैल कृमि का भोजन करने का यह ढंग अन्य अनेक समुद्री जीवों में पाया जाता है। यह समुद्री जीवों के भोजन करने का अति प्राचीन ढंग है। इस ढंग से प्राय: वे समुद्री जीव ही भोजन करते हैं, जो शिकारी नहीं होते अथवा बड़े सुस्त और आलसी होते हैं।
शैल कृमि का प्रजनन बड़ा रोचक होता है। इनमें बाह्य निषेचन पाया जाता है। इनमें नर और मादा अलग-अलग होते हैं तथा दोनों की शारीरिक संरचना में बड़ी भिन्नता होती है। प्रजनन काल में नर और मादा दोनों के शरीर में कुछ परिवर्तन होते हैं। ये परिवर्तन इनके शरीर के तीसरे अर्थात् अंतिम भाग में होते हैं। प्रजनन काल में इनके शरीर के अंतिम भाग में गोल-गोल गुमड़े से निकल आते हैं। इनमें से प्रत्येक गुमड़े में एक छिद्र होता है तथा प्रत्येक गुमड़ा एक प्रजनन अंग का कार्य करता है। मादा शैल कृमि के इस गुमड़े में अंडे होते हैं और नर के गुमड़े में शुक्राणु भरे होते हैं। ये दोनों अलग-अलग स्वतंत्र रूप से अपने-अपने अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़ देते हैं। अंडे और शुक्राणु खुले सागर में एक-दूसरे से मिलते हैं, जिससे अंडों का निषेचन हो जाता है। शैल कृमि का अंडा परिपक्व होने पर सागर में ही फूटता है एवं इससे एक लारवा निकलता है। इस लारवे के छोटे-छोटे बालों वाले कई पट्टे होते हैं, जिनकी सहायता से यह सागर में तैरता है। कुछ समय बाद इसके अगले भाग में सूंड जैसा एक अंग विकसित हो जाता है और फिर धीरे-धीरे पूरा शरीर तैयार हो जाता है। अंत में यह सागर तल की रेत अथवा कीचड़ में उपयुक्त स्थान तलाश कर मांद बनाता है और उसी में रहने लगता है।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



