खुद न तय करें बच्चे का भविष्य

विदेशों में बच्चे जल्दी मैच्योर होकर आत्मनिर्भर बनने लगते हैं लेकिन हमारे यहां ऐसा नहीं है। बीस साल के युवक को भी मांएं यहां बिल्कुल बच्चों की तरह पेंपर करती मिल जाएंगी। अपने बारे में निर्णय लेना तो दूर की बात है। नतीजा यह होता है कि वयस्क होने पर भी उनमें निर्णय लेने का आत्मविश्वास नहीं आ पाता। 
दस वर्ष के बाद बच्चे को इतनी स्वतंत्रता दी जानी चाहिए कि वो अपने बारे में छोटी छोटी बातों में स्वयं फैसले ले और यह तभी संभव है जब उस पर कुछ जिम्मेदारी डाली जाए। दस साल का होते होते बच्चा अपने इन्ट्रेस्ट समझने लगता है, अपने शौक को विस्तार देना चाहता है। अपने लिए एक दिशा खोज लेने के लिये अब तो तैयार हो रहा होता है। इस दौरान गलतियां भी होगीं उससे लेकिन उसे उसके अनुभव का हिस्सा मानकर चलें। अपने निर्णय बच्चों पर थोपने की गलती अक्सर पेरेंटस करते हैं मगर इस तरह वे बच्चे की खुशियां, उसका उत्साह उससे छीन लेते हैं। बच्चे को निर्णय लेते हुए आपकी सलाह की ज़रूरत होती है, तानाशाही की नहीं।
बच्चों को चाहिए मोटिवेशन
आज के बच्चे पेंपर्ड हैं। सुख सुविधाएं आज बेशुमार हैं और पेरेंटस भी बच्चों के साथ यही चाहते हैं कि उन्हें वे सब मिले। तभी जरा पर निकलते ही क्रेडिट कार्ड, बाइक, कार, स्मार्ट फोन, ब्रांडेड शूज, कपड़े, सनग्लासेज सभी कुछ उन्हें मुहैय्या करा दिया जाता है। पेरेंटस की कमाई ठिकाने लगाते बच्चों में न सेवा भाव होता है, न रिश्तों की कद्र, न ही जीवन की समझ।
क्या ही अच्छा हो अगर पेरेंटस बच्चों को सुविधाएं देने के बजाए उन्हें कुछ बनने के लिए मोटिवेट करें। कोशिशों से कामयाब होने का आत्मविश्वास उनमें पनपने दें। उन्हें यह अहसास कराना ज़रूरी है कि ये सब सुविधाएं जो वे लोग भोग रहे हैं, कितनी मेहनत, हार्डवर्क से कमाए गए पैसों से प्राप्त होती हैं। 
विचारों को महत्व दें 
बच्चे हैं, इन्हें क्या समझ है, यह सोचकर बच्चों की बातों को हल्के लेकर यूंही न उड़ाते रहें। ऐसे बच्चे में कॉनफिडेंस नहीं आ पाएगा। उसे अभिव्यक्ति का पूरा अवसर दें। उससे हर विषय चाहे वो पढ़ाई हो, घरेलू हो या करंट न्यूज, उन पर बात करें। उसके विचार ध्यान देकर सुनें। उसकी समझदारी भरी बातों, नॉलेज आदि पर उसे खूब शाबाशी भी दें। वो आपसे ज्यादा खुलकर बातें करेगा।
प्रतिभा को पहचानें
बच्चे के रूझान को पहचानें। अगर वह स्पोर्टस में रूचि रखता है या म्यूजिक या डांस में या ड्रॉइग में तो उसे हतोत्साहित न करें, नंबरों की दौड़ में शामिल होने के लिए बाध्य न करें बल्कि जिस विषय में उसकी दिलचस्पी है, उसमें उसका उत्साहवर्द्धन करें। हो सकता है वो अपने पसंद के क्षेत्र में नाम कमाए, साथ ही वह अन्य क्षेत्रों में भी अच्छा कर पाएगा।
कल्पनाओं के पंख दें
टीवी, कंप्यूटर, वीडियो गेम्स, ये सभी चीजें कल्पनाओं के पंख फैलने नहीं देतीं। सब कुछ वर्चुअली दिखाकर कल्पना के लिए कोई इमेज, कोई पिक्चर बनाने की ये गुंजाइश नहीं छोड़ते। बच्चों के पास खाली समय बिताने का कोई विकल्प न होने पर वे उनके एडिक्ट बन जाते हैं। उन्हें इस एडिक्शन से बचाएं। उन्हें बाहर घुमाने ले जायें, पार्क, जू, ऐतिहासिक स्थलों, गार्डन या शॉपिंग मॉल बाजार में जहां से आप घरेलू ज़रूरतों का सामान भी खरीद लें और बच्चों की तफरीह भी हो जाए। (उर्वशी)

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