मन्दी-ग्रस्त भारत को रसातल से बाहर लाने के उपाय


मोदी सरकार की दूसरी शासन पारी के पहले 100 दिन पूरे होने के बाद सरकारी प्रचार-तंत्र इस अवधि में प्राप्त उपलब्धियों का यशोगान करना चाह रहा है। कहा गया है कि दृढ़-निश्चयी भारत उभर आया है, जिसने अन्तर्राष्ट्रीय कूटनीति में उपलब्धियों के झण्डे गाड़़ दिये। विश्व व्यापी मन्दी के समक्ष भारत आज भी अपनी लोचशील अर्थव्यवस्था और वृहतमांग मण्डी की सम्भावनाओं के साथ विदेशी निवेशकों को लुभाता है। भारत में सुविधा से व्यापार और उद्यम कर सकने की क्षमता के सूचकांक में तरक्की दिखाई देती है, और देश में कश्मीर के विशेष राज्य के रुतबे को समाप्त करके, अनुच्छेद 370 और 35 ए को समाप्त करके कश्मीर में भारत-विदेश के निवेशकों के लिए सरकार ने निवेश की सम्भावनाओं के अक्षित द्वार खोल दिये हैं। लेकिन दूसरी ओर इस काल में जिस तेज़ी के साथ देश मन्दी के दुष्चक्र में घिर गया। 6 वर्ष के बाद देश की आर्थिक विकास दर फिर 5 प्रतिशत पर आ गिरी, जबकि आज तक दावे तो यह किये जाते रहे कि भारत इस समय विश्व में सबसे तेज़ गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में हैं। देश पांच वर्ष में कृषकों की आय को दुगना और सकल घरेलू आय को भी आज की तुलना में दुगना करके पचास खरब रुपए तक पहुंचा देगा। सरकारी अर्थशास्त्री देश की अर्थव्यवस्था के स्वत: स्फूर्त और विकसित कहला पाने के योग्य होने के लिए वर्तमान सात प्रतिशत आर्थिक विकास दर से आठ प्रतिशत और फिर इसके दस प्रतिशत तक पहुंच जाने के सपने देख रहे हैं। 2018 की आर्थिक विकास दर 8.3 प्रतिशत तक पहुंच गयी थी। लेकिन वास्तविकता कुछ और रही। इस वर्ष की पहली तिमाही में आर्थिक विकास दर 5.7 प्रतिशत और दूसरी तिमाही में 5 प्रतिशत पर गिर गई। देश के मुख्य पांच आर्थिक क्षेत्रों में चार में भारी अवनति दिखाई दी। विनिर्माण क्षेत्र, खेताबाड़ी और उद्योग धंधों का बंटाधार हो गया। इन वर्षों में बुनियादी ढांचा बन पाया, न बुनियादी उद्योगों ने प्रगति की। मोदी और नीति आयोग ने अत्याधिक जनसंख्या के नियंत्रण को रेखांकित किया, लेकिन इसके लिए कोई नई और मौलिक नीति पेश नहीं की। इन 100 दिनों में बेरोज़गारी दूर करने के नये सार्थक उपायों की घोषणा नहीं हुई।  रोज़गार मेले और मैगा शापिंग फैस्टीवल जिसकी घोषणा अभी वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मन्दी से उभरने के नये उपायों में की है, कोई सार्थक उपाय नहीं। अगर यह सार्थक उपाय होते तो पंजाब में कैप्टन अमरेन्द्र शासन के इन लगभग तीन वर्षों में कितने रोज़गार मेले लगाये, बेरोज़गारी खत्म हो गयी? खत्म तो क्या होनी थी, यह तो 6.1 प्रतिशत पर चली गई, जो पिछले दशक की सबसे ऊंची दर थी। बल्कि मन्दी की इस दुर्दशा में देश में आटोमोबाइल क्षेत्र, टैक्सटाइल से लेकर बिस्कुट उद्योग को ऐसा ग्रहण लगा कि देश में नया रोज़गार क्या पैदा होना था, छंटनी की समस्या पैदा हो गई। उद्योग, उद्यम बन्द होने लगे, लाखों नये बेकार पैदा हो गये, पूरी कोशिश के बावजूद महंगाई नियंत्रित नहीं हुई, बल्कि परचून महंगाई और दैनिक व्यवहार की वस्तुओं में मूल्य सूचकांक दस प्रतिशत से ऊपर चला गया। विकास के लिए राजस्व की कमी आने लगी। जी.एस.टी. के लागू होने के दो वर्ष बाद इसका कर राजस्व इस तिमाही भी एक लाख करोड़ रुपए का आंकड़ा छू नहीं पाया। बड़े पैमाने पर जी.एस.टी. में कर चोरी हुई, वैध व्यवसाय और उद्यम घटा। पंजाब के अर्थतन्त्र के बखिये इतनी बिजली-पानी की माफी ने नहीं तोड़े, जितने बड़े पैमाने पर होने वाली बिजली चोरी ने तोड़ दिये। जहां तक भ्रष्टाचार उन्मूलन का संबंध है, सरकार ने इन 100 दिनों में कोई बड़ा घोटाला नहीं होने दिया, लेकिन विश्व के भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का भ्रष्टाचार का दर्जा नहीं घटा। उसका शुमार आज भी दुनिया और एशिया के सबसे बड़े भ्रष्टाचारी देशों में होता है। मोदी सरकार ने देश को मन्दी के अन्धे कुएं से निकालने के लिए अभी तक तीन बूस्टर डोज़ दिये हैं। 23 अगस्त को बैंकों को 70 हज़ार करोड़ और हाऊसिंग फाइनांस कंपनियों  को 30 हज़ार करोड़ रुपए देने की घोषणा की है। कैपिटल गेन पर सरचार्ज भी खत्म कर दिया। 26 अगस्त को रिज़र्व बैंक ने अपने सुरक्षित कोष में सबसे अधिक 1.76 लाख करोड़ रुपए दे दिये और 30 अगस्त को देश के 6 सरकारी बैंकों का चार बड़े बैंकों में विलय कर दिया। सत्ताईस की जगह बारह सरकारी बैंक बना दिये और अब चौथी बूस्टर डोज़ में रियल एस्टेट निर्माण क्षेत्र को और 70 हज़ार करोड़ रुपए का बूस्टर दे दिया है। समझा जा रहा है कि देश में बढ़ती बेकारी का अन्त निर्माण सम्पदा क्षेत्र करेगा। इसके लिए 20 हज़ार करोड़ रुपए का फंड बना दिया गया है जो अधूरे पड़े साढ़े तीन लाख घरों को पूरा करेगा। रेखांकित हो कि यह केवल अधूरे पड़े मकानों को पूरा करेगा, कोई लम्बी-चौड़ी नई निर्माण योजना नहीं शुरू करेगा। दूसरी ओर भारत का निर्यात क्षेत्र भी महा अवसाद अवस्था में घिर गया है। डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य के गिरने और हमारे निर्यातों के सस्ता हो जाने के बावजूद हमारे निर्यात बढ़ नहीं पाये, बल्कि 8 प्रतिशत घट गये।  निर्यात पर लगे करों का समय पर पुनर्भुगतान न हो पाना देश के निर्यातकों को निरुत्साह कर गया। अब अगले वर्ष 2020 से इस योजना को पचास हज़ार करोड़ रुपए के अनुदान से तरोताज़ा किया जायेगा। लेकिन यह कोई नया अनुदान नहीं है। चालीस-पैंतालीस हज़ार करोड़ रुपए की राहत तो अभी भी दी जा रही है। यूं इस अनुदान से हमारा निर्यात उद्योग कुलांचे भरने लगेगा, ऐसी उम्मीद न रखनी चाहिए। जब तक ये बूस्टर नीतियां अपने सामने मध्यम, लघु और कुटीर उद्योगों को बूस्ट करने का कोई नया उद्देश्य नहीं रखतीं, और कृषकों और उद्यमी समाज को नव अनुसंधान का संदेश नहीं देती, तब तक देश मन्दी के दुष्चक्र से तत्काल निकल आयेगा, इसे अभी दुराशा मानिये।