प्लास्टिक-मुक्त भारत हेतु चाहिए ठोस विकल्प


महाराष्ट्र, दिल्ली और उत्तर प्रदेश जैसे कई राज्यों में प्लास्टिक पर प्रतिबंध की घोषणा कर दी गई है। सरकारी सपना है कि देश प्लास्टिक मुक्त हो जाये। कम से कम सिंगल यूज प्लास्टिक का इस्तेमाल बिल्कुल समाप्त हो। भारत ही क्यों, दुनिया के कई देशों में इस पर पाबंदी लगी है। वनुआतू हर तरह के प्लास्टिक पर रोक लगाने वाला दुनिया का पहला देश बन गया है। पर प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध क्या बिना किसी व्यवहारिक विकल्प के संभव है? ऐसा लगता नहीं। जब प्लास्टिक का इस्तेमाल इतना सामान्य नहीं हुआ था, दूध और यहां तक कि शीतल पेय भी शीशे की बोतलों में आते थे। कोल्ड ड्रिंक की छोटी बोतल का वजन अमूमन 20 से 25 ग्राम होता है। यही कोल्ड ड्रिंक जब कांच की बोतल में आती थी तो बोतल का वजन 200 से 250 ग्राम तक होने लगा। बोतल भारी होगी तो ढुलाई भी मुश्किल और महंगी होगी। बोतलों को लाने ले जाने में ज्यादा तेल जलेगा, बहुत सारी ऊर्जा स्वाहा होगी, ज्यादा धुंआ निकलेगा, भाड़ा ज्यादा लगेगा, मतलब पर्यावरण कई गुना खराब होगा, दाम पर भी जबरदस्त असर होगा।  अमरीकी केमेस्ट्री काउंसिल और पर्यावरणीय अनुसंधान करने वाली संस्था ने अपने एक शोध पत्र में कहा है कि अगर शीतल पेय बनाने वाली कंपनियां प्लास्टिक की जगह कांच, एल्यूमिनियम या टिन की बोतलों का इस्तेमाल करें तो इससे न सिर्फ  बोतलों का दाम बल्कि उत्पाद का दाम भी बढ़ेगा; क्योंकि इससे फैलने वाले पांच गुना ज्यादा प्रदूषण के चलते सरकार इन कंपनियों को कई गुना टैक्स लगायेगी। ऐसे में कंपनी उत्पाद का दाम बढ़ाकर यह लागत ग्राहक से वसूलेगी। मतलब प्रदूषण और पैसे दोनों की मार आमजन झेलेंगे। ऐसे में पर्यावरण के लिहाज से देखें या पैसे के, प्लास्टिक का प्रयोग ही श्रेयस्कर है। प्लास्टिक पर्यावरण के लिए, दूसरे विकल्पों से बेहतर है। यह तो कोई बात न हुयी। उन तर्कों में भी दम है कि खाने-पीने का सामान प्लास्टिक पर रोक की वजह से महंगा हो जाएगा। हरी सब्जी आप बाजार से झोले में ला सकते हैं, कागज के थैले में भी, पर ढाबे से बनी हुई सब्जी झोले में कैसे लायेंगे। प्लास्टिक के सहयोग से हरी सब्जियों की उम्र बढ़ जाती है। खाने को बर्बाद होने से बचाने में प्लास्टिक का बहुत बड़ा रोल है। प्लास्टिक में लिपटा खीरा फ्रिज में दो हफ्ते टिक सकता है पर खुला हुआ दो दिन से ज्यादा मुश्किल से। मॉल, बड़ी दुकानों वगैरह में बिकने वाले मांस की पैकेजिंग भी प्लास्टिक में होती है। इससे कच्चा मांस ज्यादा दिनों तक सुरक्षित रहता है। सेब, अंगूर जैसे अनेक फलों की बर्बादी 75 फीसद तक प्लास्टिक के चलते ही कम हो पाती है। 
खाने-पीने के सामान की उम्र केवल एक दिन बढ़ जाने से भारतीय आंकड़े का तो पता नहीं पर ब्रिटेनवासियों के 50 करोड़ पाउंड से अधिक बच जाते हैं। संसारभर में सालाना करीब एक खरब डॉलर का खाना किसी के काम नहीं आता। महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसका खामियाजा अमूमन खाद्य सामग्री तैयार करने वाले निर्माता या खुदरा दुकानदार ज्यादा उठाते हैं। सबसे ज्यादा पाबंदी सिंगल यूज यानी केवल एक बार इस्तेमाल हो सकने वाले प्लास्टिक पर है। दलील यह कि सबसे बड़ा खलनायक यही है। जितना प्लास्टिक कचरा है, उसका आधा यही है। पर उधर यह भी एक तर्क है कि यही है जिसकी वजह से खाने की चीजों की बर्बादी रुकती है। हालांकि दुनिया की बर्बादी का सामान साबित हो चुके इस प्लास्टिक के समर्थन में यह तर्क बहुत लचर है। सरकार, समाज ऐसे तर्कों को नहीं मानने वाला जो प्लास्टिक के प्रयोग के समर्थन में हो, मानना भी नहीं चाहिये। प्लास्टिक को निबटाने के तरीके ढूंढने में वैज्ञानिक, कई दशक से लगे हुये हैं। कानपुर के चंद्रशेखर आजाद कृषि विश्वविद्यालय के एक वैज्ञानिक ने प्लास्टिक और अलसी के सूखे पौधे को मिलाकर प्लास्टिक को निबटाने की युक्ति ढूंढी,कानपुर और मुंबई सरीखी आईआईटी ने प्लास्टिक से ईंधन बनाने की तरकीब निकाली, आईआईटी दिल्ली में शोध कर रही एक छात्रा ने प्लास्टिक का इस्तेमाल बाजार में मिल रहे डीजल जैसा डीजल बनाने के लिए किया। बाजार में बिक रहे डीजल में 60:40 के अनुपात में मिलाकर जेनरेटर वगैरह इसका इस्तेमाल में किया जा सकता है।  एक किलो प्लास्टिक से 750 मिली डीजल बनेगा जिसकी कीमत 60 रुपये लीटर से थोड़ी ज्यादा होगी। आईआईटी रुड़की ने प्लास्टिक से ईंट तथा टाइल बनाने में सफलता पाई, कचरा हो चुका प्लास्टिक को पिघलाकर और बाल गेहूं, धान या मक्के की भूसी, जूट और नारियल के छिलकों को मिला करके उन्होंने यह बनाया है। प्लास्टिक से सड़कें देश में भी बनाई गयीं। ये पर्यावरण के लिये बेहतर है और बेहद सस्ती भी। प्लास्टिक पर रोक की बात करने के बजाय हम आगे की सोचें। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर