अकाली दल के लिए पंजाब की मांगें उठाने का उपयुक्त अवसर


चाहे इस समय देश की राष्ट्रीय राजनीति में भाजपा की तूती बोल रही है, परन्तु भाजपा की समर्थक क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा के धीरे-धीरे उन क्षेत्रों में छोटे भाई से बड़े भाई की भूमिका में आने से परेशान और सतर्क हो गई हैं। इस समय एक तरफ तो महाराष्ट्र में शिव सेना ने भाजपा से नाता तोड़ लिया है, दूसरी तरफ झारखंड में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन जिसका नेतृत्व भाजपा करती है ‘खखड़ियां करेले’ होता नज़र आ रहा है। यहां भाजपा की सहायक आजसू (ऑल इंडिया झारखंड स्टूडैंट यूनियन) ही भाजपा को आंखे नहीं दिखा रही, अपितु उसकी दो प्रमुख सहयोगी पार्टियां लोक जन शक्ति पार्टी जिसके प्रमुख चिराग पासवान हैं और जनता दल (यू) जो बिहार के मुख्यमंत्री नितीश कुमार की पार्टी है, भी अपने तौर पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर चुकी हैं। राजनीति में ऐसे अवसर कभी-कभार ही आते हैं जब कोई समय का फायदा उठा कर हालात के अनुसार कदम उठा कर अपनी लम्बे समय से लटकती मांगें मनवा सकता है। वैसे तो अकाली दल ने इससे भी कई अच्छे अवसर गंवाये हैं। परन्तु ये अवसर अकाली दल के लिए खास महत्त्व रखता है। चाहे अभी अकाली दल शिरोमणि कमेटी, दिल्ली कमेटी जैसे महत्त्वपूर्ण सिख संस्थानों पर काबिज़ है और धरातल पर भी वह पंजाब की मुख्य विरोधी पार्टी के तौर पर पुन: उभर आया है, परन्तु अभी भी एक तरफ नया अकाली दल बनने की ‘सरगोशियां’ और दूसरी तरफ 30 के लगभग अकाली नेताओं के भाजपा के सम्पर्क में होने और भाजपा द्वारा अकेले चुनाव लड़ने की अफवाहों ने अकाली दल के लिए खतरे की घंटियां तो बजाई ही हुई हैं। इस समय जब भाजपा की कई साथी पार्टियां नाराज़ हैं और दूसरी तरफ देश के सबसे बड़े अल्प-संख्यक मुसलमान भी खुश नज़र नहीं आते और देश के अन्य राजनीतिक दृश्य भी ऐसे हैं कि भाजपा और केन्द्र सरकार सिखों तथा पंजाबियों को नाराज़ करने का खतरा नहीं उठा सकती, तो यह अवसर अकाली दल बादल के लिए स्वर्णिम अवसर है कि वह पंजाब और सिखों की मांगों को उभार कर अपना अस्तित्व बचा सकता है और एक बार फिर पंजाबियों और सिखों के हितों के लिए लड़ने वाली पार्टी के तौर पर सामने आ सकता है। यदि इन परिस्थितियों में अकाली दल बादल भाजपा के साथ रहने के लिए केन्द्र सरकार से सिखों और पंजाब की कुछ प्रमुख मांगें मानने के लिए किसी निश्चित समय की शर्त लगा दे, कि यदि ये-ये मांगें इतने समय में नहीं मानी गई तो अकाली दल भाजपा से नाता तोड़ने के लिए मजबूर होगा, तो यह अकाली दल के लिए ‘दोनों हाथों में लड्डू’ वाली स्थिति होगी। क्योंकि पहली बात तो यह है कि इस समय आर.एस.एस. और भाजपा का एजेंडा सिखों को नाराज़ करने का नहीं है, अपितु वह तो सिखों के प्रति सहानुभूति वाला चेहरा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, जिस कारण विदेशी सिखों की काली सूची दो नाम छोड़ कर खत्म की गई है। सज़ा पूरी कर चुके आठ सिखों की रिहाई के आदेश दिये गये हैं। श्री गुरु नानक देव जी के 550वें प्रकाश पर्व के अवसर पर ही जितना अच्छा कार्यक्रम केन्द्र सरकार ने आयोजित किया, उसके मुकाबले हमारी अपनी संस्थाएं सिर्फ जलसों-जुलूसों और नगर कीर्तनों पर अपने-अपने पंडालों में ही उलझी रहीं। सबसे बड़ी बात पाकिस्तान के साथ युद्ध जैसे हालात के बावजूद करतारपुर गलियारे को मुक्म्मल करवाया गया, चाहे हम उसमें श्रद्धालुओं के जाने के लिए डाली गई तकनीकी रुकावटों को उचित नहीं समझते। परन्तु फिर भी भारत सरकार सिखों के प्रति अपना उदार चेहरा तो दिखाने की कोशिश कर ही रही है। इस समय जब मुसलमान नाराज़ समझे जा रहे हैं कोई सरकार देश के एक अन्य प्रमुख अल्प-संख्यक को नाराज़ करके समूचे तौर पर अल्प-संख्यकों की विरोधी होने का आरोप स्वयं पर नहीं ले सकती। दूसरी बात यदि अपनी कई सहयोगी पार्टियों की नाराज़गी से ही भाजपा अकाली दल को भी नाराज़ कर लेती है, तो उसके नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जन-तांत्रिक गठबंधन (एन.डी.ए.) का अस्तित्व ही ़खतरे में पड़ जाएगा। इन परिस्थितियों में यदि अकाली दल पंजाब की कुछ प्रमुख मांगें मनवाने में सफल रहता, तो उसकी भी हालत पंजाब में सिखों में सुधरेगी। परन्तु यदि उसको इस समय भाजपा का साथ और केन्द्र का एक मंत्री पद छोड़ना भी पड़ता है तो भी अकाली दल एक बार फिर यह सन्देश देने में सफल हो जाएगा कि अकाली दल ने अभी पंजाब और सिखों की मांगें नहीं छोड़ी। 
कौन-सी मांगें उठाई जा सकती हैं?
इस समय सिखों की प्रमुख मांगों में गुरुद्वारा ज्ञान गोदड़ी, गुरुद्वारा डांगमार तथा कुछ अन्य सिख ऐतिहासिक गुरुद्वारों और स्थानों को सिख कौम को सौंपने की मांग, गुजरात के सिख किसानों के अलावा देश के अन्य हिस्सों जैसे मेघालय आदि में सिखों के साथ धक्के के मामले, पंजाब की मांगों में सबसे प्रमुख मांग चंडीगढ़ पंजाब को सौंपने की भी मांग हो सकती है। पंजाब के पानी और हैड वर्क्सों का कंट्रोल का मामला, पंजाबी भाषी क्षेत्र लेने तो शायद अब सम्भव ही नहीं रहे होंगे, क्योंकि वहां के लोग ही पंजाबी को अपनी भाषा नहीं कहते, परन्तु पड़ोसी राज्यों में पंजाबी को दूसरी भाषा का दर्जा देने की मांग आज भी मनवाई जा सकती है। इसके अलावा सबसे बड़ी और आसानी से मनवाई जा सकने वाली मांग ‘ऑल इंडिया गुरुद्वारा एक्ट’ की है। जिसको चाहे किनारे भी स्वयं अकाली दल बादल ने ही लगाया था, परन्तु इस समय सिख कौम के लिए ‘हिन्दू राष्ट्र’ की आवाज़ों की चुनौती से निपटने में सक्षम होने के लिए यह मांग मनवानी आवश्यक है। 
करतारपुर गलियारा और कम यात्री
साहिब श्री गुरु नानक देव जी की कर्म भूमि जहां उन्होंने ज़िन्दगी के अंतिम समय तक लगभग दो दशक श्रम किया और बांट कर खाया, के दर्शनों के लिए पहले चार दिनों में मात्र 1463 श्रद्धालुओं का जा सकना निराशाजनक है। हम समझते हैं कि इसमें सबसे बड़ी रुकावट श्रद्धालुओं द्वारा ऑन लाइन पर कई दिन पहले करवाया जाने वाला रजिस्ट्रेशन है। जब श्रद्धालुओं के लिए करतारपुर साहिब जाने के लिए पासपोर्ट ज़रूरी है, तो पहले ऑन लाइन रजिस्ट्रेशन तथा पुलिस जांच का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। क्या जब कोई व्यक्ति वीज़ा लेकर पाकिस्तान जाता है, तो उसको किसी आगामी पुलिस जांच से गुज़रना पड़ता है, बिल्कुल नहीं। फिर इन श्रद्धालुओं को क्यों? जिन्होंने सुबह जाकर शाम को ही लौट आना है। क्या भारत सरकार को पासपोर्ट बनाने के समय की गई पुलिस जांच पर विश्वास नहीं? 

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