पंजाब के महान सपूत की याद


श्री इंद्र कुमार गुजराल एक प्रिय एवं चुम्बकीय व्यक्तित्व थे। कोई भी व्यक्ति उनसे मिलने के बाद देर तक उन्हें भुला नहीं सकता था। जहां वह एक बड़े बुद्धिजीवी थे, राजनीतिज्ञ थे तथा हर प्रकार की राजनीति के रंग उन्होंने देखे थे, वहीं उनके व्यक्तित्व की मासूमियत उनकी चुम्बकीय शक्ति थी। आज हम गुजराल साहिब के 100वें जन्म दिवस पर उन्हें याद कर रहे हैं। आज भी दिल्ली की राष्ट्रीय राजनीति में उन्हें एक शऱीफ एवं समझदार राजनीतिज्ञ के रूप में जाना जाता है। इसके अतिरिक्त आज भी पंजाबियों के दिलो-दिमाग में उनकी स्मृति ताज़ा है। विभाजन से पहले जेहलम (पाकिस्तान) में जन्मे एवं लाहौर में पढ़े श्री इन्द्र कुमार गुजराल के जीवन का एक बड़ा भाग अविभाजित पंजाब में व्यतीत हुआ। देश के विभाजन के बाद वह दिल्ली चले गये। वहां उन्होंने प्रत्येक पक्ष से कड़ा परिश्रम किया। उन्होंने अपने कार्यों से समाज में सम्मानीय स्थान बनाया। इसी भावना से वह राजनीति में आए। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के वह निकट साथी एवं विश्वासपात्र बने रहे। उन्हें महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों का कार्यभार भी सौंपा गया। प्रत्येक मंत्रालय में उन्होंने अपना प्रभाव छोड़ा। आपात्काल के दौरान चिरकाल से संचित अपने विश्वासों एवं अपनी उदारवादी सोच के दृष्टिगत वह श्रीमती इंदिरा गांधी से दूर हो गये। इंदिरा गांधी ने उन्हें दिल्ली से राजदूत बना कर सोवियत यूनियन में भेजा ताकि वह देश की राजनीति से अलग हो जाएं, परन्तु सोवियत यूनियन में भी उन्होंने अपनी सूझबूझ एवं दूर-दृष्टि के साथ अतीव अच्छा प्रभाव बनाया। बाद में वह नये बने जनता दल में शामिल हो गये। जब 1989 में संयुक्त मोर्चा की सरकार बनी तो उन्हें विदेश मंत्री बनाया गया। इस मंत्रालय को उन्होंने बड़ी सूझबूझ के साथ चलाया, जिसका प्रभाव उस समय प्रत्यक्ष रूप में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देखा जा सकता था। तब इराक ने कुवैत पर आक्रमण कर दिया था। खाड़ी युद्ध शुरू हो गया था। श्री गुजराल अपनी सूझबूझ के साथ वहां से तमाम भारतीयों को सुरक्षित ढंग से निकालने में सफल हुए थे। चाहे उन्हें इस मोर्चे पर अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ा था, परन्तु उन्होंने उदारवादी विदेश नीति को नहीं छोड़ा। चाहे उन्हें   वर्ष भर के समय के लिए राष्ट्रीय मोर्चा के दूसरे कार्यकाल में प्रधानमंत्री बनने का अवसर मिला, परन्तु थोड़े समय में ही अपनी अनेक सीमाओं के बावजूद उन्होंने इस पद को एक नई उच्चता प्रदान की। उस समय उन पर परमाणु हथियारों एवं परीक्षणों पर रोक लगाने वाली संधि सी.टी.बी.टी. पर हस्ताक्षर करने का भी दबाव बना, परन्तु उन्होंने स्पष्ट रूप में इस समझौते पर इसलिए हस्ताक्षर करने से इन्कार कर दिया क्योंकि यह समझौता असंतुलित था। यह कुछ देशों को एक ओर परमाणु हथियार रख कर शक्तिशाली बनाये रखने की वकालत करता था तथा दूसरी ओर अन्य देशों को ऐसे हथियार एवं परीक्षण बंद करने के लिए विवश करता था। उनके स्पष्ट इन्कार करने के बाद ही आगामी सरकार ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किये थे। विदेश मंत्री रहते हुए भी तथा प्रधानमंत्री बनने पर भी वह अपने पड़ोसी देशों के साथ प्रत्येक स्थिति में मैत्रीपूर्ण संबंध बनाने के लिए सक्रिय रहे। उनका विश्वास था कि ऐसी मैत्री एवं सहयोग ही दक्षिण एशिया के इस क्षेत्र को दरपेश अनेकानेक मुश्किलों में से निकाल सकता है। आज भी इस संबंध में उनके ‘गुजराल डॉक्ट्राइन’ के नाम से जाने जाते संकल्प को स्मरण किया जाता है। वह भारत को सदैव अपने पड़ोसियों का बड़ा भाई कहते थे तथा उनके साथ बड़े भाइयों की भांति मैत्रीपूर्ण व्यवहार करने के इच्छुक थे। श्री गुजराल एक प्रतिबद्ध व्यक्तित्व थे। उनकी परवरिश एवं प्राथमिक शिक्षा भी इसी भावना के साथ हुई थी। उनके माता-पिता स्वतंत्रता सेनानी थे। उन्होंने महात्मा गांधी की ओर से शुरू किये गये आन्दोलन में अपना भरपूर योगदान डाला। श्री गुजराल भी उनके नक्शे-कदम पर चलते हुए 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रहे तथा उस समय उन्होंने जेल भी भोगी। देश के प्रति उनका यह जज़्बा अंतिम समय तक उनके अंग-संग रहा। अपने जीवन के अंतिम दशक में वह पाकिस्तान के साथ सद्भावना बनाये रखने के इच्छुक थे।अपने जीवन के लम्बे समय के साथी श्री कुलदीप नैय्यर को वह 15 अगस्त को दोनों देशों की सीमा पर मोमबत्तियां जलाने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। अंतिम समय तक पंजाब उनके दिल में बसा रहा। यहां के राजनीतिज्ञों के साथ उनके गहन संबंध बने रहे। जब उन्होंने वर्ष 1998 में जालन्धर से लोकसभा का चुनाव लड़ा था, तो जिस प्रकार पंजाबियों ने उन्हें प्यार दिया था तथा जिस शान के साथ उन्हें यहां से विजयी बना कर भेजा गया था, उसकी स्मृति उनके मन में सदैव बनी रही। उच्च पदों पर रहते हुए तथा प्रधानमंत्री बनने पर भी उन्होंने सदैव पंजाबियों को अपने दिल में स्थान दिया।  पंजाब के विकास के लिए वह सदैव चिंतित रहते थे। उनके प्रधानमंत्री बनने पर जब अपनी मांगों की लम्बी सूची लेकर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री स. प्रकाश सिंह बादल उन्हें मिलने के लिए गये तो उन्होंने इस सूची पर सामान्य नज़र डालते हुए सभी मांगों को स्वीकार कर लिया, जिनमें उस समय पंजाब के सिर पर चढ़े 8500 करोड़ रुपए के ऋण को माफ करना भी शामिल था। अपने जीवन के अंत तक वह अपनी इस धरती के साथ भावुकतापूर्ण ढंग से जुड़े रहे। आज उनके 100वें जन्मदिन पर हम उन्हें दिल के सम्पूर्ण स्नेह एवं गहन भावुकता के साथ अपनी श्रद्धा के पुष्प अर्पित करते हैं। नि:सन्देह, पंजाब के इस महान सपूत की याद आगामी लम्बी अवधि तक हमारे मन में बनी रहेगी। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द