दलाईलामा का चयन चीन की मनमज़री पर क्यों छोड़ा जाए ?


बौद्ध धर्म गुरु और तिब्बत की निर्वासित सरकार के सर्वेसर्वा आदरणीय दलाईलामा अब 85 वर्ष के हो गए हैं और उन्होंने नए लामा की तलाश भी आरम्भ कर दी है। इस पर चीन ने भारत सरकार से कहा कि वह जो भी दलाईलामा स्थापित करे, वह चीन की इच्छा के अनुसार होना चाहिए। भारत के लोग कहते हैं अजगर के साए में लामा को बेबस नहीं छोड़ा जा सकता। दलाईलामा का चयन एक परम्परा के अनुसार ही होता आया है। दलाईलामा तेनजिंस ग्यात्सो उस परम्परा के चौदहवें धर्म गुरु हैं। दलाईलामा का जन्म 6 जुलाई, 1934 को हुआ था। ताकस्तेर क्षेत्र में ओमान परिवार में जन्में इस बालक को 13वें लामा का अवतार माना जाने लगा। दलाईलामा एक मंगोलियाई पदवी है, जिसका अर्थ है ज्ञान का महासागर। पांच वर्ष की आयु में इस बालक को चौदहवें दलाईलामा के पद पर आसीन कर दिया गया। भारतीय सत्ता तंत्र ने आरम्भिक काल से ही दलाईलामा को बौद्ध सम्प्रदाय का महान अध्यात्मिक गुरु माना और जब चीन ने तिब्बत पर आक्रमण करके कब्ज़ा कर लिया तब दलाईलामा अपने कुछ अनुयायियों सहित भारत में आ गए और धर्मशाला के समीप मैकलोडगंज को अपना कार्य क्षेत्र बना लिया। चीन ने इस पर बहुत एतराज किया तब भारतीय सरकार ने कहा कि दलाईलामा धार्मिक क्षेत्र में ही सक्रिय रहेंगे, राजनीति मैकलोडगंज में बैठकर नहीं करेंगे। चीन ने भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाने का प्रयास शुरू से ही किया है। सन् 1962 का चीनी हमला भी दलाईलामा को शरण देने से खीझ कर किया गया था। भारत की बहुत-सी भूमि पर चीन की विस्तारवादी नीति ने कब्ज़ा कर लिया। आज तक सीमा का निर्धारण नहीं हो सका। चीन ने तिब्बत पर पूर्ण अधिकार करने के साथ-साथ उससे लगती भारतीय धरती पर भी अपनी ललचाई नज़रें गाढ़ी हुई हैं। गाहे-बगाहे सीमा के इस पार चीनी सैनिक आ जाते हैं, जिन्हें भारतीय सेना प्राय: खदेड़ती रहती है। चीन तिब्बत में अपनी मर्जी का बौद्ध धर्म गुरु पंचेन लामा को चीन का आध्यात्मिक लामा बना दिया गया। परन्तु तिब्बत के लोगों ने उसे स्वीकार नहीं किया। यह बात भी चीन को परेशान करती रही। आज से 8-9 वर्ष पूर्व करमापा नामक आध्यात्मिक नेता भारत आ गये, जिसे चीन का परोक्ष समर्थन प्राप्त व्यक्ति माना जाता रहा।  मैरून रंग के चौगे पहने कोई 1000 लोग हाथ में मोमबत्ती और अगरबत्ती लेकर ‘करमापा खिएन्नो’ अर्थात् ‘करमापा तुम सर्वत्र हो’ के जयकारे लगाते सुने गए। यह प्रदर्शन करमापा के समर्थकों ने इसलिए किया ताकि करमापा पर जो चीनी जासूस होने का आरोप लग रहा है, उसे गलत सिद्ध किया जाए। भारत-चीन के संबंधों का असहज तब अध्याय आरम्भ हुआ जब चीन ने अब यह कहा 15वां दलाईलामा उनकी मज़री के मुताबिक बनाया जाए। भारत ने ऐसा मानने से इन्कार कर दिया क्योंकि भारत एक सर्व-धर्म सम्भाव वाला देश है। वह किसी के भी धार्मिक मान्यताओं में दखल देना नहीं चाहता।भगवान बौद्ध का जन्म और ज्ञान प्राप्ति का क्षेत्र भारत है और यहीं से बुद्ध धर्म का प्रकाश चीन, जापान, श्रीलंका और तिब्बत जैसे देशों में पहुंचा। हम मानते हैं कि 14वें दलाईलामा वैसे नहीं जैसे आज से 40-50 वर्ष पूर्व हुआ करते थे। केवल आध्यात्मिकता ही उनका क्षेत्र रहे ऐसा आज के दौर में माना नहीं जा सकता। आज पल-पल ऐसी घटनाएं घट रही हैं, जिसे आध्यात्म भी अछूता नहीं रह सकता और दुनिया भी सिकुड़ती जा रही है। इसलिए हम यह नहीं कहते कि मात्र मार्गदर्शन करने से अनुयायियों का भला हो सकता है। चीनी तानाशाह भी इस बात को अच्छी तरह समझते होंगे कि दलाईलामा आज पूरे संसार में जाने भी जाते हैं, पहचाने भी जाते हैं। चीन को आस्था पर दबाव की राजनीति से गुरेज करना चाहिए। चीनी हाकमों को समझना चाहिए हम सभी इन्सान हैं और हमारी धर्म के प्रति निष्ठा और विश्वास भी भिन्न-भिन्न हो सकता है। कोई बौद्ध है या नहीं, परन्तु तिब्बत के लोगों की आस्था ‘लामाओं’ में बहुत गहरी है। उससे छेड़छाड़ किसी को भी अच्छी नहीं लगेगी। लिहाज़ा तिब्बती धार्मिक मान्यताओं को छेड़ने से चीन को भी कुछ हासिल नहीं होगा, इससे चीन के प्रति तिब्बत के लोगों का अविश्वास बढ़ेगा।