नए भाजपा अध्यक्ष की चुनौतियां


जे.पी. नड्डा को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष चुना गया है। इससे पहले एक वर्ष वह कार्यकारी अध्यक्ष के तौर पर अमित शाह के साथ कार्य करते रहे हैं। भाजपा का यह सैद्धांतिक पक्ष रहा है कि एक व्यक्ति दो पदों पर कार्य नहीं कर सकता। इसी लिए ही गृह मंत्री बनने के बाद नड्डा को कार्यकारी अध्यक्ष घोषित कर दिया गया था। इस समय भाजपा में दो व्यक्ति नरेन्द्र मोदी और अमित शाह ही प्रभावशाली माने जाते हैं। अमित शाह इस पद पर लगभग 6 वर्ष रहे, परन्तु उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान पार्टी को बुलंदियों पर पहुंचा दिया। भाजपा ने मोदी के नेतृत्व में 2014 में लोकसभा चुनाव जीतने के बाद 2019 में भी यह चुनाव जीत कर एक तरह से करिश्मा कर दिखाया है। चाहे लोकसभा के चुनाव तो पार्टी दोबारा जीत गई थी परन्तु उसके बाद हुए कई राज्यों के चुनावों में इसको उतना समर्थन नहीं मिला, जितनी इसको उम्मीद थी।महाराष्ट्र चुनावों में चाहे यह सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, परन्तु बहुमत न होने के कारण शिवसेना द्वारा राजनीतिक गठबंधन तोड़ने के कारण यह सरकार बनाने में सफल नहीं हुई थी। हरियाणा में भी इसको बहुमत प्राप्त नहीं हुआ था। चाहे जननायक जनता पार्टी के सहयोग से मनोहर लाल खट्टर की सरकार दोबारा बन गई थी, परन्तु झारखंड में जहां पहले इसकी सरकार थी अब के चुनावों में इसको हार का मुंह देखना पड़ा। मोदी और शाह के नेतृत्व में इस पार्टी ने केन्द्र में अपनी दूसरी पारी बहुत ही हौसले और विश्वास से शुरू की है। तीन तलाक कानून पास करवाना और जम्मू-कश्मीर की धारा 370 को खत्म करना सरकार के ऊंचे हौसले वाले कार्य कहे जा सकते हैं। इनसे भाजपा ने अन्य पार्टियों को एक तरह से हाशिये पर धकेल दिया था। इतने ही साहस वाला कार्य नागरिकता संशोधन कानून को पास करवाना था। परन्तु इससे पैदा हुए विवाद के कारण सरकार ने आज अवश्य बचाव की नीति अपनाई प्रतीत होती है, क्योंकि देश भर में विपक्षी पार्टियों के साथ छात्र वर्ग तथा अन्य बहुत सारी संस्थाएं इस कानून के खिलाफ नित्य-दिन धरने प्रदर्शन कर रही हैं। अब दिल्ली में चुनाव होने जा रहे हैं। इन चुनावों में भी भाजपा केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी के साथ कड़े मुकाबले में है। यहां अपनी जगह बनाने के लिए उसको बड़ी मेहनत करनी पड़ेगी। जे.पी. नड्डा का लम्बा राजनीतिक जीवन है। चाहे वह पटना में पैदा हुए परन्तु उन्होंने अपना अधिकतर राजनीतिक जीवन हिमाचल प्रदेश में बिताया और यहीं उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत की और यहां से ही वह तीन  बार विधानसभा के लिए चुने गए और अलग-अलग विभागों के मंत्री भी रहे। बाद में राज्यसभा में जाने के कारण वह राष्ट्रीय राजनीति में अधिक सक्रिय हो गए। श्री नड्डा की राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के साथ निकटता रही है। अपने जीवन में वह अनेक बार विवादों के केन्द्र में भी रहे हैं, परन्तु उनका साफ-स्वच्छ छवि वाले व्यक्ति होने का प्रभाव बना रहा है।  भाजपा पार्टी की अध्यक्षता अटल बिहारी वाजपेयी तथा लाल कृष्ण अडवानी जैसे व्यक्तियों के हाथों में रही है। अडवानी ने इस पार्टी को डेढ़ दशक तक बड़ा प्रोत्साहन दिये रखा। अमित शाह ने इसको और बुलंदियों पर पहुंचाया है। आज यह देश की एक बड़ी शक्तिशाली पार्टी के तौर पर उभर कर सामने आई है। नड्डा के समक्ष इस समय बड़ी चुनौतियां हैं। नागरिकता संशोधन कानून के कारण सड़कों पर पार्टी के बढ़ रहे विरोध से कैसे निपटना है? जिन राज्यों में पार्टी का प्रभाव कम हुआ है, उनको किस ढंग से सम्बोधित होना है? निकट आए दिल्ली राज्य के चुनाव और उसके बाद बिहार के चुनावों तथा वर्ष 2021 में पश्चिम बंगाल के होने वाले चुनावों में पार्टी को कैसे आगे बढ़ाना है? यह सब नए भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा के लिए बड़ी चुनौतियां होंगी। इनसे ही नड्डा के प्रभाव और लोकप्रियता की पहचान हो सकेगी। 

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द