रजिस्टर्ड डाक प्रणाली को अलविदा
निक-सुक के पाठकों के लिए यह सामाचार नया हो सकता है कि पहली सितम्बर, 2025 से भारतीय डाक की रजिस्टर्ड डाक सेवा औपचारिक तौर पर बंद की जा रही है। कोई समय था कि डाकिया सिर्फ संदेश ही नहीं पहुंचाता था, अपितु घर के सदस्यों की तरह होता था। लोग उसकी आवाज़, उसकी साइकिल की घंटी की आवाज़ तथा उसके थैले में कैद लिफाफे का उत्सुकता से इंतज़ार करते थे।
वर्तमान में तकनीकी विकास से जुड़े सोशल मीडिया, मोबाइल फोन तथा इंटरनैट ने परम्परागत डाक सेवा को समाप्त कर दिया है। गांवों के किसान तथा श्रमिक हल चलाते हों या साइकिल सवार हों, मोबाइल उनकी जेब में होता है। यह तथा ऐसी अन्य सेवाओं ने मनुष्य को मनुष्य से इतना दूर कर दिया है कि एक घर में रहते माता-पिता अपने बच्चों के साथ बात करने के लिए इलैक्ट्रानिक उपकरणों का सहारा लेते हैं। इसने हमारी भावनाओं तथा साझ को ठेस पहुंचाई है।
यह भी सच है कि मेरी पीढ़ी के लोगों को यह विकास पच नहीं रहा, परन्तु यह बात भी किसी को भूली हुई नहीं कि तेज़ी से बदलती परिस्थितियों के अनुसार चलने के लिए इनका स्वागत करना बनता है। हमें चाहिए कि हम नवीनता को खुशी से स्वीकार करें और प्राचीन काल को खुशी-खुशी विदा करें।
यदि नई तकनीक के लाभ की पुष्टि करनी है तो बता सकता हूं कि उपरोक्त जानकारी चंडीगढ़ में रहते लेखक के पास हिसार की युवती प्रियंका सौरभ के माध्यम से पहुंची है। महीनों या हफ्तों में नहीं, कुछ घंटों की यात्रा करके। ज़िन्दाबाद!
उदय प्रताप सिंह का फिल्म जगत
मुझे फिल्मी दुनिया में दिलचस्पी नहीं। फिल्में भी कभी-कभार देखता हूं। 2-3 बार इंटरवल होते घर लौटता रहा हूं। कभी सोचा ही नहीं था कि हमारे परिवार का उदय प्रताप सिंह संधू अमरीकन यूनिवर्सिटी की पढ़ाई छोड़ कर वापिस अपने देश लौट कर फिल्मों के संवाद लिखने लगेगा। ‘किस्सा पंजाब’ तथा तीन अन्य फिल्मों के संवाद लिखने के बाद उन्होंने बड़ी उपलब्धि हासिल की और ‘दिल दीआं गल्लां’ की कहानी लिख कर स्वयं ही इसके संवाद लिखने में व्यस्त हो गए।
मैंने उनकी फिल्म ‘शायर’ देखी है। कारण यह कि उसमें मेरे पैतृक गांव के देबी मक्सूसपुरी ने भाग लिया था। फिल्म अच्छी थी, परन्तु मैंने कभी नहीं सोचा था कि एक दिन इसके उचित निर्देशन के कारण उन्हें फिल्म फेयर अवार्ड से सम्मानित किया जाएगा। यह उदय प्रताप की आठवीं फिल्म है। स्वागत है और मुबारकवाद।
सांस्कृतिक ताना-बाना जानने की ज़रूरत
1956 में पंजाबी संस्कृति के शाहजहां के रूप में जाने जाते महिन्दर सिंह रंधावा ने ‘पंजाब’ नामक पुस्तक तैयार करनी थी। उन्होंने मुख्यमंत्री, प्रताप सिंह कैरों से सहायता मांगी तो पंजाब के भाषा विभाग का पूरा स्टाफ पटियाला से चल कर रंधावा के दिल्ली वाले कार्यालय में उपस्थित हो गया। कौन-सा कांड किस लेखक से लिखवाना है, इसका विवरण वह तैयार करके लाए थे। जब पंजाब के रीति-रिवाज़ वाले कांड की बात चली तो उन्होंने हाथ खड़े कर दिए। रंधावा ने यह कांड लिखने की ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी और मुझे अपने ननिहाल तथा दादका परिवार से पहचान का आदेश देकर यह भी कहा कि मुझे हरियाणा, हिमाचल तथा पंजाब (उस समय पंजाबी सूबे को फल नहीं लगा था) का दौरा करना पड़े तो ज़रूरी खर्च भारतीय कृषि अनुसंधान काऊंसिल देगी।
एम.एस. रंधावा कौंसिल के प्रमुख थे और मैं इनके पंजाबी प्रकाशन का प्रभारी। पुस्तक के शेष कांड लिखने के लिए मुल्क राज आनंद तथा डॉ. गंडा सिंह जैसे एक दर्जन महारथियों के नाम भी स्वीकार किए गए। मैंने रीति-रिवाज़ वाला कांड लिखने के लिए दौरे भी किए, सैकडों डिस्ट्रिक्स गैजिटियर तथा पुस्तकें भी पढ़ीं और अनेक माताओं तथा बुज़ुर्गों से पूछताछ भी की, जिन्हें ठीक बूर पड़ा और मेरे लिखे कांड की खूब प्रशंसा की गईर्।