प्रधानमंत्री की चीन यात्रा का संदेश
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जापान की अपनी दो दिवसीय सफल यात्रा के बाद चीन पहुंच गए हैं। जहां तियानजिन शहर में शंघाई सहयोग संगठन की 25वीं बैठक हो रही है। इस संगठन की स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी, जिसमें 10 देश शामिल हैं। चीन, भारत और रूस के अतिरिक्त पाकिस्तान, ईरान, कज़ाकिस्तान, किर्गिस्तान, तज़ाकिस्तान, उज़बेकिस्तान और बेलारूस इसके सदस्य हैं। प्रधानमंत्री मोदी 7 वर्ष बाद चीन गए हैं। वैसे अब तक वह इससे पहले 5 बार चीन के दौरे कर चुके हैं। चीन से भारत के संबंध पिछले 7 दशकों से बनते बिगड़ते रहे हैं। कभी दोनों देश भाई-भाई होने की बात करते हुए पंचशील के सिद्धांत पर चलने को प्राथमिकता देते रहे परन्तु वर्ष 1962 में सीमांत मामले को लेकर चीन ने भारत पर हमला कर दिया था और इसके ज्यादातर क्षेत्रफल पर कब्ज़ा कर लिया था। चीन द्वारा ब्रिटिश काल में भारत और चीन के बीच सीमाओं संबंधी खींची गई मैकमोहन लाइन को लगातार मानने से इन्कार किया जाता रहा है। भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी वह अपनी इस बात पर अडिग रहा है। यहां तक वह भारत के अरुणाचल प्रदेश पर भी अपना अधिकार जता रहा है।
1962 में चीन के हमले के बाद दोनों देशों के संबंध कभी भी सुखद नहीं रहे। चाहे हालात के दृष्टिगत इनके आपस में समझौते भी होते रहे ओर आपसी व्यापार भी होता रहा परन्तु अनेक यत्नों के बावजूद भी दोनों देशों का सीमांत मामला हल नहीं हो सका। जून 2020 में गलवान घाटी में दोनों देशों के सैनिकों में हुई हिंसक झड़पों के बाद यह संबंध और भी बिगड़ गए थे। चाहे समय-समय ज़रूरत के अनुसार दोनों देश अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कई महत्त्वपूर्ण संगठनों के साथ जुड़े रहे हैं। चीन ने पहलगाम की हिंसक घटना के बाद भारत की ओर से पाकिस्तान के विरुद्ध किए गए ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के समय पाकिस्तान के साथ प्रत्येक पक्ष से खड़े होने को प्राथमिकता दी थी, जिससे दोनों देशों के संबंध एक बार फिर बिगड़ गए थे, परन्तु फिर भी अलग-अलग संगठनों के स्तर पर दोनों देशों के सम्पर्क बने रहे हैं। भारत महत्त्वपूर्ण ‘ब्रिक्स’ संगठन का भी सदस्य है, जिसमें ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका संस्थापक और मुख्य सदस्य हैं। आगामी वर्ष इस संगठन का वार्षिक सम्मेलन भारत में होने जा रहा है। इसी ही तरह शंघाई सहयोग संगठन जिसकी स्थापना वर्ष 2001 में हुई थी, के सम्मेलनों में भी ये दोनों देश बराबर के भागीदार हैं। विगत वर्ष रूस के कज़ान शहर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भेंटवार्ता हुई थी, जिसके बाद दोनों देशों के संबंधों में बहुत सुधार हुआ था। इसके बाद भारत के विदेश और रक्षा मंत्रियों ने चीन के कई दौरे किए थे और इनके समकक्ष कई प्रमुख चीनी मंत्री भारत भी आए थे।
अब प्रधानमंत्री मोदी की चीन की दो दिवसीय यात्रा को कई पक्षों से देखा और महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा विश्व भर में टैरिफ युद्ध शुरू कर देने से अनेक बड़े देशों के लिए एक बड़ी चुनौती पैदा हो गई है। इन देशों में भारत, रूस और चीन भी आते हैं। ऐसे समय में श्री मोदी की चीन में हो रहे इस समारोह में भाग लेने का महत्त्व ज़रूर बढ़ जाता है। यदि भारत, रूस और चीन एक संयुक्त मंच पर आ खड़े होते हैं तो अमरीका के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती पैदा हो जाएगी, जिससे देश-विदेश में ट्रम्प प्रशासन आलोचना का केन्द्र भी बन जाएगा। भारत के प्रधानमंत्री की यह यात्रा एक तरह से अमरीका को दिया गया एक बड़ा संदेश ही समझी जानी चाहिए।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द