युवाओं में कम होती सहनशीलता और नैतिकता गंभीर चुनौती

देश एवं समाज का भविष्य उसकी युवा पीढ़ी होती है। यदि युवा सशक्त, जागरूक और ज़िम्मेदार हों, तो किसी भी राष्ट्र को प्रगति और समृद्धि को कोई नहीं रोक सकता। यदि यही ऊर्जा गलत दिशा में चली जाए तो वही युवा समाज और राष्ट्र के लिए चुनौती भी बन जाते हैं। दुर्भाग्य से आज हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं, जहां विज्ञान और तकनीक ने भले ही अभूतपूर्व तरक्ती कर ली हो, लेकिन सहनशीलता और नैतिकता धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ती जा रही है। इसका सबसे प्रत्यक्ष और चिंताजनक असर युवाओं के भीतर पनप रही हिंसक प्रवृत्ति में दिखाई देता है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसी कई घटनाएं हुई हैं जिन्होंने हमें झकझोर कर दिया है। कभी किसी स्कूल में छात्र के टिफिन बॉक्स से चाकू निकलता है, कभी छोटी-सी कहासुनी पर जानलेवा हमला हो जाता है, तो कभी शिक्षकों तक को बेरहमी से मौत के घाट उतार दिया जाता है। हाल ही में हरियाणा में एक युवा शिक्षक की हत्या की घटना ने समाज को गहन सोच में डाल दिया। ये घटनाएं केवल आपराधिक समाचार नहीं हैं, बल्कि इस बात का संकेत हैं कि हमारी युवा पीढ़ी एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है।
आज का युवा डिजिटल दुनिया से घिरा हुआ है। स्मार्ट फोन और इंटरनेट उनकी दिनचर्या का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ऑनलाइन गेम्स, जिनमें मारपीट और हिंसा को रोमांचक और मनोरंजक बनाकर प्रस्तुत किया जाता है, ने युवाओं के मनोविज्ञान पर गहरा असर डाल है। युवाओं में बढ़ती हिंसा का एक बड़ा कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हिंसक व अश्लील सामग्री है। सरकार ने समय-समय पर इस दिशा में कदम उठाए हैं। ऐसे मोबाइल गेम्स और ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया गया है, जिनमें अत्यधिक हिंसा, नशे या असामाजिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जाता था। हाल ही में कुछ ऑनलाइन गेम्स को इस आधार पर प्रतिबंधित किया गया कि वे बच्चों और किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर विपरीत असर डाल रहे थे और उनमें आत्मघाती प्रवृत्तियों को उकसाने वाली सामग्री मौजूद थी। हालांकिए केवल प्रतिबंध ही स्थायी समाधान नहीं है। सरकार को डिजिटल प्लेटफार्म्स के लिए कड़े निर्देश और प्रभावी मॉनिटरिंग सिस्टम तैयार करना होगा, ताकि युवाओं को सुरक्षित और सकारात्मक सामग्री ही उपलब्ध हो सके। साइबर नियामक ढांचे को मज़बूत करने के साथ-साथ डिजिटल साक्षरता पर भी ध्यान देना होगा, ताकि माता-पिता और बच्चे यह समझ सकें कि कौन-सी सामग्री सुरक्षित है और कौन-सी हानिकारक। कई बार बच्चे और किशोर इन खेलों के पात्रों से इतना जुड़ जाते हैं कि वास्तविक जीवन में भी उसी तरह का व्यवहार करने लगते हैं। जब आभासी हिंसा आदत बन जाती है, तो संवेदनशीलता और करुणा धीरे-धीरे खत्म होने लगती है। इसके अलावा इंटरनेट पर बिना किसी नियंत्रण के अश्लील और हिंसक सामग्री की उपलब्धता ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। यह कहना गलत नहीं होगा कि डिजिटल युग ने जहां ज्ञान और अवसरों की दुनिया खोली है, वहीं उसने हिंसा और नैतिक पतन का रास्ता भी आसान कर दिया है।
युवाओं एवं बच्चों के हिंसक व्यवहार का एक बड़ा कारण पारिवारिक वातावरण की कमी भी है। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में माता-पिता अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते। कामकाजी जीवन की व्यस्तता और भौतिक सुख-सुविधाओं की होड़ में बच्चों की भावनात्मक ज़रूरतें पीछे छूट जाती हैं। बच्चे जब अपने माता-पिता से भावनात्मक रूप से दूर होते हैं, तो वे सही-गलत का फर्क समझाने वाले मार्गदर्शक से वंचित हो जाते हैं। कभी ऐसा समय था जाब पारिवारिक वातावरण बच्चों को नैतिकता, धैर्य और सहनशीलता सिखाता था। संयुक्त परिवार व्यवस्था में बच्चे अपने दादा-दादी और बड़ों से जीवन के मूल्य सीखते थे, लेकिन अब जब परिवार छोटे और व्यस्त होते जा रहे हैं, तो बच्चे अपने अकेलेपन और असुरक्षा से जूझते हुए गलत संगत या गलत राह पर चल पड़ते हैं। यही अकेलापन कई बार उन्हें हिंसा का सहारा लेने के लिए प्रेरित करता है।
आज का समाज सफलता को सबसे बड़ी कसौटी मान बैठा है। हर माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा स्कूल, कॉलेज, नौकरी या व्यवसाय में सबसे आगे निकले। प्रतियोगिता की यह दौड़ युवाओं पर अस्वाभाविक दबाव डाल रही है। नतीजा यह होता है कि युवा अधीर हो जाते हैं। उन्हें तुरंत परिणाम चाहिए, वे शॉर्टकट अपनाने लगते हैं और असफल होने पर निराशा से भर जाते हैं। यह निराशा धीरे-धीरे आक्रामकता और हिंसक प्रवृत्तियों का रूप धारण कर लेती है। यह स्थिति हमें सोचने पर मज़बूर करती है कि क्या हम अपने बच्चों को केवल सफल बनाना चाहते हैं या उन्हें संवेदनशील और ज़िम्मेदार इन्सान भी बनाना चाहते हैं।
यह मानना गलत होगा कि केवल कानून और व्यवस्था से इस समस्या का समाधान हो सकता है। पुलिस और अदालतें अपराध रोक सकती हैं, लेकिन अपराध की जड़ें वहीं पनपती हैं जहां परिवार, समाज और शिक्षा कमज़ोर पड़ जाते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि समाज के हर वर्ग को मिलकर इस चुनौती का सामना करना होगा। माता-पिता को चाहिए कि वे अपने बच्चों से संवाद करें, उनके मित्र बनें और उनके ऑनलाइन व्यवहार पर नज़र रखें। बच्चों को सिखाना होगा कि डिजिटल दुनिया में हर चीज पर आंख बंद करके भरोसा नहीं किया जा सकता। शिक्षा संस्थानों की भी बड़ी ज़िम्मेदारी है। स्कूल और कॉलेज केवल पढ़ाई का केंद्र नहीं होने चाहिए, बल्कि वहां नैतिक शिक्षा, जीवन कौशल और मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना चाहिए। विद्यार्थियों को खेल, कला और साहित्य जैसी रचनात्मक गतिविधियों में जोड़ा जाना चाहिए, ताकि उनकी ऊर्जा सकारात्मक दिशा में लगे। समय की मांग है कि युवाओं के भीतर छिपी ऊर्जा को सही दिशा दी जाए और उन्हें यह विश्वास दिलाया जाए कि सच्ची शक्ति हिंसा में नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और मानवता में है। तभी एक सुरक्षित, सशक्त और उज्ज्वल भविष्य का निर्माण किया जा सकेगा।
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