लावारिस कुत्तों के मामले में जनता को नहीं मिली राहत
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2024 में 37 लाख लोगों (हिंदुस्तान के बेटे बेटियों) को सशक्त भारत के अशक्त नागरिकों को कुत्तों ने काटा। बहुत से मर गए। संख्या बताने को सरकार तैयार नहीं। रैबीज़ के इंजेक्शन कितने लोगों को सरकार ने लगाए और कितने लोगों ने सहायता मांग कर या अपनी कमाई से लिए। संख्या नहीं जानते, पर यह सच है।
पिछले पंद्रह वर्ष से हर चुनाव में जो भी संसद के उम्मीदवार बनकर गलियों-बाज़ारों में घूमते थे, उनसे यही प्रार्थना करते रहे कि हमें कुत्तों से छुटकारा दिला सकते हो तो वोट लीजिए। किसी भी उम्मीदवार में इतनी हिम्मत नहीं रहती कि वह उस समय सच बोल जाए। यही भरोसा दिलाया जाता है कि जनता को राहत मिलेगी। सच यह भी है कि सभी लोग अपने संसद के उम्मीदवारों से यह मांग करते ही नहीं। हम अंतरिक्ष तक पहुंच गए, पर हम और हमारे जैसे आम आदमी कूड़े, मच्छरों, टूटी सड़कों और बच्चों की बेकारी तक की बात करने में ही रह जाते हैं।
अचानक कुत्ता संकट भारत के सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। संसद में नहीं पहुंचा, जहां हमारे चुने हुए और मनोनीत एक हज़ार से ज्यादा बड़े बड़े अधिकतर अमीर माननीय निर्वाचित होकर जाते हैं। बात सीधी है घायल की गति घायल जानता है। घायल जानता है और जनप्रतिनिधि तो शब्दों के तीर से एक-दूसरे को घायल करते हैं, इससे ज्यादा नहीं। मोटे वेतन भत्ते लेकर संसद की कार्यवाही रोकते हैं। एक पार्टी के नहीं, जो भी विपक्ष में होते हैं, वे सभी वर्षों से यही करते रहे हैं, परन्तु अब सबसे बड़ी चिंता यह है कि दस दिनों में सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों की समस्या का निपटारा कर दिया। तीन जजों की पीठ बनी और आठवें दिन निर्णय आ गया। जनता को क्या मिला? भारतीय न्यायालय के इतिहास में संभवत: यह पहला फैसला है जो दस दिन में मिल गया, अन्यथा लोग निर्णय की प्रतीक्षा करते करते भगवान की अदालत में पहुंच जाते हैं। शायद उन बेचारों को पता ही नहीं उनके लिए क्या किया गया, लेकिन कुत्ता प्रेमी खुशी में मोमबत्तियां जलाकर दिल्ली की सड़कों पर खुशी मनाते देखे गए, परन्तु जिस राहत की आशा सुप्रीम कोर्ट से थी, क्या वह मिली? ऐसा प्रतीत नहीं होता। वही पुराना राग सरकार कुत्तों की नसबंदी करेगी। नसबंदी करके कुछ दिन उनकी सेवा होगी और फिर उन्हीं बदकिस्मत लोगों के इलाकों में ये कुत्ते छोड़ दिए जाएंगे, जहां इन्हें भौंकने, काटने और गंदगी फैलाने की पूरी छूट होगी। संभवत: सुप्रीम कोर्ट तक यह पंजाब का ही संदेश नहीं गया होगा कि 2025 के छह महीनों में सवा लाख से ज्यादा लोग कुत्तों द्वारा काटे गए। दूसरी बात यह कही, जिसे आम आदमी कहता है कि यह हमारे हित में है। वास्तव में यह कुछ भी नहीं है। एक ऐसा गुब्बारा है जो उड़ने से पहले फट जाएगा। यह कहा गया है कि कुत्तों को सार्वजनिक स्थानों पर खाना नहीं डाला जाएगा। क्या यह राहत है? कुत्तों के लिए प्रशासन तय करेगा कि इन्हें भोजन कहां दिया जाएगा। अब समस्या यह है कि कुत्ता प्रेमी तो संभवत: खाना लेकर प्रशासन द्वारा निश्चित स्थान पर पहुंच जाएंगे, परन्तु कुत्तों को कैसे वह स्थान दिखाया जाएगा जहां उनके लिए खाना रखा है।
एक बात ज़रूर सही कही गई कि अगर कोई व्यक्ति कुत्तों को सार्वजनिक स्थान पर खाना खिलाता है तो उसे रोकने वाले को तथाकथित कुत्ता प्रेमी या एनजीओ रोक नहीं सकेंगे। अगर वह उनके काम में रुकावट डालेंगे तो कानूनी कार्रवाई उन पर की जाएगी। भारी जुर्माना भी देना पड़ेगा और उन्हें जेल भी हो सकती है।
उम्मीद थी कि जो हज़ारों लोग लावारिस कुत्तों ने खा लिए, मौत के मुंह में पहुंचा दिए, उनके परिवारों के लिए कोई आर्थिक राहत देने का निर्देश भी सुप्रीम कोर्ट केंद्र सरकार या प्रदेश सरकारों को देगा कि उन्हें राहत राशि दी जाए। इस निर्णय में उनके लिए कुछ नहीं है। घायलों के लिए भी नहीं। कहीं यह नहीं कहा गया कि घायलों का पूरा इलाज सरकार करेगी और जितने दिन कोई भी व्यक्ति कुत्ते के काटने के बाद अपनी रोटी-रोज़ी कमाने के लिए जाने की स्थिति में नहीं है तो उसका सारा खर्च सरकार उठाएगी।
पिछले दिनों ही पटियाला में सभी कांप उठे जब एक कुत्ता नवजन्मे बच्चे का सिर मुंह में लेकर घूम रहा था। उसके शेष शरीर को नोंच-नोंच कर खा लिया गया था। वह बच्चा पहले ही मृत था। यह बात महत्वपूर्ण नहीं, परन्तु आदमखोर कुत्ते सड़क पर घूमते हैं, यह चिंता की बात हैं। देश के कानूनविदों, न्यायविदों, देश के शासकों से यह प्रार्थना है कि जो कुछ सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से नहीं मिल पाया उस पर विचार किया जाए। जल्दी कोई कमेटी बनाई जाए और जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने कुत्तों का निर्णय दस दिन में कर दिया, सरकार भी करके दिखाए।