बाढ़ रोकने की व्यवस्था को मज़बूत करना होगा

होशियारी दिल-ए-नादान बहुत करता है,
रंज कम सहता है, ऐलान बहुत करता है।

इरफान सिद्दीकी का यह शे’अर मौजूदा सरकार पर ही नहीं अपितु समय की ज़्यादातर सरकारों के हाल पर चरितार्थ होता है, क्योंकि प्रत्येक सरकार लोगों के जीवन व सम्पत्ति की सुरक्षा की घोषणाएं तो बहुत करती है, परन्तु काम बहुत कम करती है। यही हाल इस बार भी बाढ़ की रोकथान को लेकर किये गये कार्यों का दिखाई दे रहा है। पंजाब का एक बहुत बड़ा हिस्सा इस समय बाढ़ की ज़द में है। बेशक सरकार की ओर से अब राहत कार्य तेज़ किये गये हैं। 
सेना तथा राष्ट्रीय आपदा जवावी बल (एनडीआरएफ) की मदद भी ली जा रही है। बेशक नुकसान का सही पता तो सर्वेक्षणों के बाद ही चलेगा, परन्तु अनुमान है कि इस बाढ़ में कुल मिलाकर पंजाब के हज़ारों करोड़ रुपये का नुकसान हो गया है, अभी हो भी रहा है, परन्तु जो नुकसान तथा कहर लोगों तथा जानवरों को सहन करना पड़ रहा है, उसकी भरपाई तो कभी भी नहीं हो सकेगी। कुछ महीने पहले ही पंजाब के एक मंत्री ने विधानसभा में कहा था कि पानी हिमाचल से आ जाए या कहीं और से आ जाए, हमने बरसातों का सिस्टम मुख्यमंत्री के नेतृत्व में इस प्रकार बना देना है कि पानी कोई नुकसान नहीं कर सकेगा। वह लोगों का फायदा ही करेगा, परन्तु वास्तविकता हमारे सामने है। यदि पंजाब में आई बाढ़ के इतिहास को देखा जाए तो सबसे भारी नुकसान ईसा से 2500-1700 वर्ष पहले हुआ था, जब सिंधु सभ्यता के पतन में सिंधु नदी में आई बाढ़ का योगदान सामने आता है। ब्रिटिश शासन काल में बाढ़ से बचाने तथा सिंचाई के लिए बनाई नहरी जल प्रणाली ने पंजाब में आई बाढ़ से बचाव में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वतंत्रता के बाद 1955 तथा 1960 के बीच आई बाढ़ ने व्यापक स्तर पर नुकसान किया था। बाद में 1988, 1993 तथा 1995 में भी बाढ़ ने पंजाब का बहुत नुकसान किया। हालांकि छोटे स्तर पर नुकसान प्रत्येक वर्ष ही होता है।
पंजाब में बाढ़ का कारण
पंजाब में डैमों, बांधों, धुस्सी बांधों, नहरों का जाल पंजाब को बाढ़ से बचाने के लिए बेहद मज़बूत है। हम समझते हैं कि यदि अफसरशाही स्तर पर मानव लापरवाही न हो तो पंजाब में बाढ़ आने का खतरा बहुत कम है। यही कारण है कि पंजाब में प्रत्येक वर्ष व्यापक स्तर पर बाढ़ नहीं आती थी। यह भी ठीक है कि प्रत्येक वर्ष इतनी बरसात तथा इतना हिमपात नहीं होता कि पानी के भंडार झीलों तथा डैम खतरे का निशान पार कर जाएं और डैमों को नुकसान के बड़े खतरे से बचाने के लिए भारी मात्रा में पानी छोड़ना पड़े।
परन्तु वास्तविकता यह है कि पहले प्रत्येक वर्ष बाढ़ से बचाव के लिए कुछ कार्य किये जाते थे, जो अब नहीं किये जा रहे। पहले प्रत्येक वर्ष बाढ़ से बचाव के लिए अधिकारियों को रोपड़ में एक सप्ताह का प्रशिक्षण दिया जाता था। भाखड़ा डैम के लोक सम्पर्क अधिकारी रहे पूर्व सांसद तरलोचन सिंह के अनुसार प्रताप सिंह कैरों के शासन के समय से बाढ़ से बचाव का प्रशिक्षण तथा आवश्यक प्रबंधों की देख-रेख उस समय के वित्त सचिव मिस्टर फ्लैचर स्वयं करते थे। अंग्रेज़ों के समय में बने डैमों, बैराजों तथा बाद में बने डैमों तथा नहरों में से गाद निकालने (डी-सिल्ंिटग) की कार्रवाई भी की जाती थी, परन्तु अब शायद यह कार्य कागज़ों में ही होता हो। भाखड़ा डैम की गोबिन्द सागर झील की गहराई 1680 फुट है। अब इसमें कितने फुट गाद है, कोई जानकारी नहीं है। वैसे गाद या सिल्ट की क्या स्थिति होगी, इसका अनुमान माधोपुर हैडवर्क्स (बैराज) पर घटित हुई घटना से ही लगाया जा सकता है। बताया गया है कि माधोपुर हैडवर्क्स के गेट खोलने का प्रयास किया गया तो वह गाद के दबाव के कारण नहीं खोले जा सके, परन्तु पानी के दबाव से इस हैडवर्क्स के गेट टूट गये, जिससे रावी नदी में पानी का स्तर एकाएक बढ़ गया। इस अवसर पर 50 व्यक्तियों की जान भी खतरे में पड़ गई थी, जो शायद सेना की सक्रियता से बच गई। डी-सिल्ंिटग न करने का सबसे अधिक प्रभाव तो यही होता है कि पानी सम्भालने वाली झीलों का तल ऊंचा हो जाता है और उनमें पानी सम्भालने का सामर्थ्य कम हो जाती है। इससे पानी कम होने पर भी पानी खतरे के निशान से ऊपर हो जाता है और वह सुरक्षा के दृष्टिगत छोड़ना ही पड़ता है। 
दूसरी ओर नदियों में से आम लोगों द्वारा रेत निकालने पर पाबंदी चाहे पर्यावरण की रक्षा के नाम पर लगाई गई है, परन्तु वास्तव में इसका प्रभाव विपरीत हो रहा है। इससे कानूनी आड़ में रेत माफिया पनप रहा है, जो स्पष्ट रूप में राजनेताओं, पुलिस की मिलीभगत का परिणाम है। इससे कुछ निर्धारित स्थानों से रेत ज़रूरत से अधिक मात्रा में निकाली जाती है, जिससे नदी के किनारे कुछ स्थानों से खतरनाक सीमा तक कमज़ोर हो जाते हैं, जबकि शेष स्थानों पर लगातार मौजूद रेत नदियों के तल को ऊंचा उठा देती है जिससे थोड़ा पानी भी नदी के किनारों को जल्दी पार कर जाता है। फिर नदियों के किनारों की ज़मीन पर अवैध कब्ज़े भी बाढ़ का कारण बनते हैं। 
इसके अतिरिक्त जब आज के युग में पहले ही पता चल जाता है कि इस बार इतनी बरसात तथा इतना हिमपात होना है, तो डैमों से क्यों नहीं समय रहते थोड़ा-थोड़ा अतिरिक्त पानी छोड़ कर ऊपर से आने वाले पानी के लिए जगह बनाते? क्यों इंतज़ार किया जाता है कि जब पानी खतरे के निशान के निकट पहुंचेगा, तभी भारी मात्रा में पानी एकाएक छोड़ा जायेगा। हालांकि निदा फाज़ली के शब्दों में ़खतरे के निशान चाहे दूर ही होते हैं, परन्तु किनारों पर सैलाब (बाढ़) मचलने तो लग ही पड़ते हैं।
़खतरों के निशानात अभी दूर हैं लेकिन,
सैलाब किनारों पे मचलने तो लगे हैं।
भरपाई में हिस्सा डालें
हालांकि विश्व भर में पानी की मालिकी संबंधी प्रचलित राइपेरियन कानून के अनुसार पानी की मालिकी सिर्फ उस राज्य की ही होती है, जिस राज्य के तटों पर रहते लोगों तथा धरती का नदियों का पानी नुकसान करता है। पंजाब भी स्वतंत्रता से पहले तथा कुछ वर्ष बाद तक भी अपने पानी की रायल्टी बीकानेर तथा अन्य पंजाबी रियासतों से लेता रहा है, परन्तु 1955 के जिस समझौते के तहत अब राजस्थान पंजाब के पानी पर अधिकार जमाता है, कानूनी नुकता-निगाह से वह समझौता पूरी तरह गैर-कानूनी है, क्योंकि इंडियन कांट्रैक्ट कानून की धारा 25 के अनुसार कोई भी समझौता तब तक जायज़ समझौता नहीं होता जब तक उसमें कोई कमी हो। इस समझौते में सबसे बड़ी त्रुटि यह है कि इस समझौते की धारा 5 के तहत पानी के बदले देने वाली कीमत अभी तक निर्धारित नहीं की गई, जो आगामी बैठक में तय होनी थी, परन्तु 1955 से लेकर अभी तक इस संबंध में कोई बैठक ही नहीं बुलाई गई। खैर, राजस्थान ज़बरदस्ती पानी ले ही रहा है तो भी प्राकृतिक न्याय के अनुसार जिस पानी का लाभ राजस्थान तथा हरियाणा उठा रहे हैं, उससे होने वाले नुकसान के भी वे भागीदार होने चाहिएं। इसलिए पंजाब जब तक राइपेरियन कानून लागू नहीं करवा सकता, तब तक बाढ़ से हुए नुकसान की पूर्ति तो उतने ही प्रतिशत के हिसाब से राजस्थान तथा हरियाणा को करने के लिए कहे, जितने प्रतिशत पानी का वे इस्तेमाल कर रहे हैं। वैसे तो अकेला राजस्थान 1955 से लेकर अब तक जितना पानी पंजाब से ले चुका है, उसकी कीमत पानी की आज की कीमत के हिसाब से नहीं अपितु उस समय की कीमत के हिसाब से ही 10 लाख करोड़ रुपये से पार हो चुकी है, जो पंजाब लेने का हकदार है, परन्तु जिया ज़मीर के शब्दों में—कुझ  सानूं ज़ुल्म सहन दी आदत है ते कुझ दरबार विच साडी सुनवाई वी घट्ट हुंदी है।
कुछ ज़ुल्म-ओ-सितम सहने की आदत भी है हमको,
कुछ ये कि दरबार में सुनवाई भी कम है।
करतारपुर साहिब तथा पाकिस्तान में बाढ़
जैसे ही भारत को अपने डैमों की सुरक्षा के दृष्टिगत पानी छोड़ना पड़ा है, उसका प्रभाव भारत के साथ-साथ पाकिस्तान पर पड़ना भी स्वाभाविक है। पाकिस्तान में भी बाढ़ से बचाव के लिए सेना बुला ली गई  है। पाकिस्तानी पंजाब का बड़ा हिस्सा भी बाढ़ की ज़द में है। इस बीच साहिब श्री गुरु नानक देव जी की कर्मभूमि तथा हमारा पवित्र स्थान गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर साहिब में भी कई-कई फुट पानी भर चुका है। उल्लेखनीय है कि जब श्री गुरु नानक साहिब इस दुनिया से ऱुख्सत हुए थे तो हिन्दुओं ने उनकी समाधि बनाई थी और मुसलमानों ने कब्र बनाई थी। इतिहास के अनुसार एक बार बाढ़ इतनी उपजी थी कि इन दोनों को बहा कर ले गई थी और बाद में महाराजा रणजीत सिंह के शासन में यहां गुरुद्वारा साहिब का निर्माण किया गया था। 1980 में भी यहां बाढ़ ने बहुत नुकसान किया था। नि:संदेह अब श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी का प्रकाश ऊपरी मंज़िल पर होने के कारण वह पानी से सुरक्षित हैं, परन्तु यहां कार्यरत सैकड़ों कर्मचारियों, रागियों, ग्रंथियों तथा सेवादारों को नावों तथा हैलीकाप्टरों के माध्यम से बचाया गया है, परन्तु इस समय एक अरदास अवश्य मन की गहराइयों में से निकलती है कि परमात्मा करे कि भारत-पाक में रिश्ते मैत्रीपूर्ण हों, दोनों देशों की सरकारों को सद्-बुद्धि प्राप्त हो कि दोनों देशों की भलाई देस्ती में है। जैसे यूरोप के कभी एक-दूसरे के खून के प्यासे रहे देश यूरोपीय संघ में आज इकट्ठे हैं। काश! भारत तथा पाकिस्तान भी उसी तरह के हमसाये बन सकें और विकास कर सकें। साबिर दत्त के शब्दों में : 
क़ागज़ पे हुए मेरे वतन के कई टुकड़े,
पंजाब की बाहों को कटा देख रहा हूं।

-1044, गुरु नानक स्ट्रीट, समराला रोड, खन्ना-141401
-मो. 92168-60000

#बाढ़ रोकने की व्यवस्था को मज़बूत करना होगा