टैरिफ युद्ध : भारत ने परिपक्व और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया

21वीं सदी की वैश्विक व्यवस्था में एक अजीब-सा विरोधाभास उभर कर सामने आया है। एक ओर वैश्वीकरण का सपना, जिसमें सीमाएं सिर्फ  नक्शों तक सीमित हों और बाज़ारों की पहुंच हर कोने तक हो, वहीं दूसरी ओर टैरिफ युद्ध जैसी घटनाएं उसी सपने की नींव में दरार डालने का काम कर रही हैं। वैश्वीकरण का युग बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में जब शुरू हुआ, तो पूरी दुनिया जैसे एक साझा बाज़ार में बदलने लगी थी, परन्तु वर्तमान में दुनिया यह देख रही है कि अमरीका, चीन और भारत जैसी आर्थिक महाशक्तियों के बीच शुरू हुआ ‘टैरिफ युद्ध’केवल दो देशों की बात नहीं रह गया, बल्कि एक वैश्विक मानसिकता को दर्शाने लगा है, जो संरक्षणवाद की ओर लौटना चाहती है।
अब लड़ाई टैंक और तोप से नहीं, अपितु शुल्क और आर्थिक प्रतिबंधों से लड़ी जाने लगी है। यह युद्ध जितना चुपचाप चलता है, उतना ही गहरा असर छोड़ता है, कभी एक किसान के सपने पर, कभी एक मज़दूर की रोज़ी-रोटी पर और कभी एक छोटे व्यापारी की उम्मीदों पर। उदाहरण के लिए जब कोई देश, जैसे अमरीका चीन व भारत से ज़्यादा आयात करता है और बदले में कम निर्यात होता है, तो व्यापार का घाटा बढ़ता है। इसे संतुलित करने के लिए टैरिफ लगाए जाते हैं, लेकिन यह कहानी सिर्फ घाटे की नहीं है। इसमें राजनीतिक दबाव, तकनीकी वर्चस्व और बौद्धिक सम्पदा की लड़ाई भी शामिल है।  अमरीका का आरोप रहा है कि चीन न केवल अपनी मुद्रा को कृत्रिम रूप से सस्ता बनाए हुए है बल्कि वह अमरीकी कंपनियों की तकनीक को भी संरक्षणहीन रूप से अपना रहा है। ऐसे में टैरिफ एक आर्थिक हथियार की तरह इस्तेमाल हुआ, केवल दबाव डालने के लिए, चेताने के लिए।  वहीं, घरेलू राजनीति की भी इसमें भूमिका कम नहीं है। जब किसी देश के भीतर का उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा से जूझ रहा होता है, तो टैरिफ एक तरह से उसे ‘संजीवनी’ देने का उपाय माना जाता है। चुनाव आते हैं, वायदे किए जाते हैं और नीतियां बनती हैं। कहते हैं हर नीति का एक चेहरा दिखता है और एक छिपा रहता है। टैरिफ युद्ध भी कुछ ऐसा ही है। कुछ घरेलू उद्योगों को इसका फायदा ज़रूर मिलता है। जैसे अमरीका में स्टील उद्योग ने राहत की सांस ली जब चीनी स्टील पर शुल्क लगाया गया। सरकारी राजस्व में वृद्धि होती है। टैरिफ से सरकारी खज़ाने में कुछ पैसे आते हैं, परन्तु क्या यह आर्थिक स्थायित्व की कीमत चुका पाते हैं?
महंगे उत्पादों का भार आम आदमी पर ही पड़ता है। खासतौर पर उन पर जो अपनी आय का बड़ा हिस्सा आवश्यक वस्तुओं पर खर्च करते हैं। सबसे महत्वपूर्ण है वैश्विक आपूर्ति  शृंखला (ग्लोबल सप्लाई चेन) पर इसका असर। आज कोई भी वस्तु एक देश में पूरी नहीं बनती। कंप्यूटर चिप्स हों या मोबाइल फोन, कई देशों में इनके पार्ट्स तैयार होते हैं। ऐसे में टैरिफ न केवल लागत बढ़ाते हैं, बल्कि उत्पाद की उपलब्धता को भी प्रभावित करते हैं।
भारत ने इस वैश्विक उठा-पटक के बीच एक परिपक्व और संतुलित दृष्टिकोण अपनाया है। टैरिफ युद्ध में सीधे कूदने के बजाय भारत ने संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी। चाहे विश्व व्यापार संगठन हो या द्विपक्षीय वार्ताएं, भारत ने अपने हितों की रक्षा समझदारी से की है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी नीतियां सिर्फ नारे नहीं बल्कि दीर्घकालिक रणनीति हैं जिसका उद्देश्य घरेलू उत्पादन को प्रोत्साहन देना और विश्व पटल पर एक मज़बूत विनिर्माण शक्ति के रूप में उभरना है। साथ ही, भारत ने आयात पर आवश्यकतानुसार एंटी-डंपिंग शुल्क लगाया। यह व्यापार को अव्यवस्थित करने वालों के लिए एक चेतावनी रही, न कि युद्ध की घोषणा। टैरिफ युद्ध एक अल्पकालिक राजनीतिक समाधान तो हो सकता है, परन्तु यह स्थायी आर्थिक शांति का रास्ता नहीं बन सकता। यह वह युद्ध है, जो देशों को फिर से सीमाओं में कैद कर सकता है। यह समझना ज़रूरी है कि वैश्वीकरण केवल व्यापारिक लाभ का नाम नहीं है, बल्कि यह एक साझा भविष्य की उम्मीद है। जब दुनिया के देश एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं, तब एक देश की आर्थिक लड़खड़ाहट पूरी व्यवस्था को डगमगा सकती है। ऐसे में संवाद, सहयोग और विश्वास ही एकमात्र विकल्प हैं। टैरिफ दीवारें बनाते हैं, परन्तु संवाद व विश्वास सेतु बनाता है। हमें दीवारों की नहीं, सेतुओं की ज़रूरत है। ताकि हम मिलकर एक बेहतर आर्थिक विश्व बना सकें। वैश्वीकरण में इसका असर सभी पर पड़ता है। (युवराज)

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