चीन के साथ संबंध पुन: स्थापित करने में सावधानी ज़रूरी
वर्तमान में विश्व की अस्थिर अर्थव्यवस्था को मद्देनज़र रखते हुए यह आवश्यक व महत्वपूर्ण है कि दो प्रमुख अर्थव्यवस्थाएं भारत व चीन वैश्विक आर्थिक स्थिरता के लिए आपस में मिलकर काम करें, लेकिन यह संबंध एक-दूसरे के हितों व संवेदनाओं पर आधारित होना चाहिए। ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से 31 अगस्त, 2025 को द्विपक्षीय मुलाकात करने से पहले। मोदी शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए चीन के थियेनचीन में हैं। बहरहाल, इससे पहले भारत-जापान वार्षिक सम्मेलन के संयुक्त वक्तव्य में प्रधानमंत्री मोदी व जापान के प्रधानमंत्री शिगेरू इशिबा ने ईस्ट चाइना सी की स्थिति पर गंभीर चिंता व्यक्त की, जहां जापान का बीजिंग के साथ ग़ैर-आबाद सेनकाकू/डियाओयू द्वीप समूह व साउथ चाइना सी क्षेत्रीय विवाद है। गौरतलब है कि अगस्त के शुरू में भारत ने पहली बार फिलीपींस के साथ मिलकर साउथ चाइना सी में पेट्रोलिंग की थी। इससे और जापान के साथ संयुक्त वक्तव्य से यह संकेत मिलता है कि गलवान व लद्दाख की घटनाओं (जिनसे भारत-चीन के संबंध बिगड़ गये थे) के बाद भारत चीन को दो खास संदेश दे रहा है।
एक, ट्रम्प टैरिफ युद्ध की पृष्ठभूमि में भारत चीन से मतभेद कम करने व संबंध सामान्य करने के प्रयासों के बावजूद बीजिंग के आक्रमक व विस्तारवादी रवैये का विरोध करता रहेगा, ताकि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में नियम आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था बनी रहे। यह क्वाड दृष्टिकोण के भी अनुरूप है, जिसके सम्मेलन की मेज़बानी इस साल भारत करेगा। दूसरा यह कि चीन की पिछली हरकतों को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय संबंधों के संदर्भ में साम-दाम-दंड-भेद नीति अपनाते हुए फूंक-फूंककर कदम रख रहा है। यह ज़रूरी भी है, क्योंकि बीजिंग के साथ पुन: संबंध स्थापित करने के लिए दोनों राजनीतिक सावधानी व चतुराई भरे व्यापारिक समझौतों की आवश्यकता है और विदेश नीति का फोकस पूर्णत: दीर्घकालीन में 8 प्रतिशत जीडीपी विकास पर होना चाहिए।
मोदी और जिनपिंग की पिछली मुलाकात अक्तूबर 2024 में हुई थी। मोदी के अनुसार, तब से दोनों देशों के बीच ‘स्थिर व सकारात्मक’ प्रगति हुई है और भारत चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों को रणनीतिक व दीर्घकालीन योजना के साथ आगे बढ़ाना चाहता है आपसी सम्मान, आपसी हित व आपसी संवेदना के आधार पर और अपनी विकास चुनौतियों को संबोधित करने के लिए रणनीतिक संचार को बढ़ाना चाहता है। भारत यह भी चाहता है कि नई दिल्ली व बीजिंग मतभेदों को विवाद न बनने दें। इसमें कोई दो राय नहीं कि अगर भारत व चीन, जो पड़ोसी व दुनिया के दो बड़े देश हैं, में मज़बूत व अच्छे द्विपक्षीय संबंध होंगे, तो इससे बहुध्रुवीय संसार की शांति व समृद्धि पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, लेकिन क्या चीन पर भरोसा किया जा सकता है?
मोदी सात साल बाद चीन गये हैं। उनकी पिछली दो यात्राएं उनके पहले कार्यकाल में यानी 2018 में थीं—पहली जिनपिंग से वुहान में अनौपचारिक वार्ता के लिए और बाद में वह किंगडाओ में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) सम्मेलन के लिए गये थे। उन यात्राओं के बाद से ब्रह्मपुत्र में बहुत पानी बह चुका है। गलवान संकट के दौरान भारत व चीन के संबंध बद से बदतर ही हुए थे। पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर चीनी सेना ने सुनियोजित ढंग से यथा-स्थिति को बदलने का प्रयास किया था, जिसमें सैनिकों की जानें गई थीं। नई दिल्ली इसे माफ कर सकती है, लेकिन भूल नहीं सकती। बहरहाल, इस बीच अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में भी ज़बरदस्त उथल-पुथल हुई है, विशेषकर ट्रम्प की भड़काऊ बातों और भारत के विरुद्ध टैरिफ युद्ध छेड़ने से। जिनपिंग का भी चीन पर पहला सा नियंत्रण नहीं रहा है, ऐसा प्रतीत हो रहा है कि उन्हें चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के भीतर से गंभीर चुनौती मिल रही।
भारत-चीन सीमा पर स्थिति काफी हद तक नियंत्रित हो गई है कि सेनाएं फ्रंटलाइन पोज़ीशन से पीछे हट गई हैं, लेकिन तनाव कम नहीं हुआ है और सेनाएं शांति के समय की लोकेशन पर नहीं लौटी हैं। हां, सीमा प्रबंधन को पेट्रोलिंग समझौतों व बफर ज़ोन बनाकर पुनर्गठित किया गया है। हमारी तरफ बनाये गये बफर ज़ोन की समीक्षकों ने आलोचना की है। यह आलोचना तो होनी ही थी, क्योंकि सीमा के प्रश्न पर दोनों पक्ष समझौता करने के लिए तैयार नहीं हैं। सीमा प्रबंधन से इतना तो सुनिश्चित हुआ है कि सेनाओं में अतीत की तरह हाथापाई नहीं होगी। हाल ही में चीन के विदेश मंत्री वांग यी भारत की यात्रा पर थे। उनकी बातों से ऐसे संकेत मिले थे कि बदलती भू-राजनीति को मद्देनज़र रखते हुए चीन भी भारत के साथ व्यापार, वाणिज्य, सियासत, सेना व सीमा मामलों पर वार्ता करने का इच्छुक है।
लेकिन नई दिल्ली ने बीजिंग को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि अब मूल्यांकन केवल शब्दों पर नहीं बल्कि कार्रवाई के आधार पर होगा। अगर भारत को फिर से रेयर अर्थ मैग्नेट्स, टनल बोरिंग मशीन व विशेष खाद निर्यात नहीं किये गये, तो स्पष्ट हो जायेगा कि चीन की नीयत संबंध बेहतर करने की नहीं है। चीन इन चीज़ों के निर्यात को आसानी से खोल व बंद कर देता है। इसलिए हमारे उद्योगों को इस सिलसिले में सतर्क रहना चाहिए और अन्य सप्लाई मार्ग भी खुले रखने चाहिए। ट्रम्प टैरिफ के बाद मोदी की एससीओ सम्मेलन में मौजूदगी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि उन्हें न सिर्फ रूस, चीन व ईरान के प्रमुखों से मिलने का अवसर मिलेगा बल्कि केंद्रीय एशिया के नेताओं से भी, जिससे भारत केंद्रीय एशिया के देशों से व्यापार व निवेश को तेज़ करके ट्रम्प के टैरिफ की हवा निकाल सकता है।
यह ठीक है कि भारत चीन के साथ पुरानी व्यवस्था व अंतर-सरकारी बैठकों को ट्रैक पर वापस लाने का प्रयास कर रहा है, लेकिन ऐसा ध्यानपूर्वक और जांच-परखकर करना चाहिए। इस मामले में जल्दबाज़ी की ज़रूरत नहीं है और न ही चीन की लुभावनी लफ्फाजी के प्रभाव में आने की आवश्यकता है। इस तथ्य को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि चीन भरोसेमंद दोस्त नहीं है और बीजिंग वैश्विक स्तर पर तो बहुध्रुवीय संसार बनाने पर कार्य कर रहा है, लेकिन एशिया को वह अपने अधीन एकध्रुवीय बनाना चाहता है।
शुरुआत वीज़ा नियमों को आसान करने, पर्यटन को बढ़ावा देने, सीधी उड़ाने आरंभ करने और कैलाश-मानसरोवर यात्रा का विस्तार करने से की जानी चाहिए। फिर जब चीन भारत से उन चीज़ों का आयात करने लगे जिन पर फिलहाल रोक है, तब चीनी एफडीआई को भारत में आने देने पर विचार करना चाहिए। तभी हम व्यापार को हथियार बनने से रोक सकेंगे, जैसा कि वर्तमान में आर्थिक शक्तियां प्रयास कर रही हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर