लघु कथा-खुद्दार

निश्चित समय  तीन नंबर  प्लेटफार्म  पर पेसेंजर गाडी आई तो उस पर मैं सवार हो गया तो देखा, एक आवारा सा दिखने वाला युवक लोगों के बैठने के स्थान को साफ करता और उसके बदले एक-एक यात्री के पास जा कर दीनता पूर्वक हाथ फैलाता जा रहा था। इस क्रम में कोई कुछ दे देता तो कोई उसे दुत्कार देता, इसी तरह वह मेरे पास भी पहुंचा। 
गाडी छूटने को कुछ समय बचा ही था कि मुझे एकाएक स्मरण हो आया कि मैंने रेलवे बुक स्टाल से रेलवे का ‘टाईम-टेबल’ बुक खरीदी ही नहीं। जिसकी आवश्यकता थी। सामान अजनबी यात्री के जिम्मे कर जा भी नहीं सकता था। और जहां की यात्रा थी, वह कस्बाई स्टेशन था। जहां उसके मिलने की संभावना नहीं थी। फिर डूबते को तिनके का सहारा। दृश्य वह युवक दिखा। मैंने उसे पास बुला कर पुछा- ‘भाई, मेरा एक काम कर दोगे...?’ उसने कहा- ‘जी बाबूजी कहिये तो सही...!’ मैंने उसके हाथ में एक सौ रुपए का एक नोट देकर कहा- ‘दौड़ कर जाओ बाबू, वह दिखाई देने वाले बुक स्टाल से एक ‘रेलवे टाईम टेबल’ की किताब ले आओ ...तो तुम्हें पैसे दूंगा..!’ 
इतना सुनना था कि वह मेरे हाथ से सौ का नोट ले कर, बड़ी फूर्ती से गाड़ी से उतर दौड़ पड़ा। उसके जाते ही मेरे बगल के सीट पर बैठे मुसाफिर ने कहा- ‘आप भी कैसे-कैसे लोगों पर यकीन कर लेते हैं। ये साले चोर होते हैं, देखिएगा वह अब आने से रहा...!’ अब गाडी धीरे-धीरे रेंगने लगी थी। मुझे  सह-यात्री की बात तब सही लगने लगी, जब गाड़ी पूरे वेग से चल पड़ी। तब मुझे लगा कि उस युवक पर इतना विश्वास नहीं करना चाहिए था लेकिन यह देख मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा जब वह युवक तेजी के साथ, लगभग हापते हुए आया और सौ रुपए का नोट वापस करते बोला- ‘बाबूजी, किताब नहीं मिला, यह लीजिए आपके सौ रुपए...!’ 
अपना सौ का नोट लेकर मैंने उसके हाथ में दस रुपए का एक नोट रखना चाहा तो उसने लेने से मना कर दिया और बोला- ‘बाबू जी एन मैंने आपकी बैठने की जगह साफ की और नहीं आपका दिया हुआ काम कर पायाण्तो पैसे किस बात के दे रहे हैं। मैं गरीब ज़रूर हूँ बाबू जी, लेकिन मुफ्त खोर नहीं, गाड़ी-गाड़ी घूम कर सफाई का काम कर, हाथ फैलाता हूँ। मेरे नसीब से जो मिलता भी दानदाताओं से मिलता है, उसी से संतुष्ट होता हूँ। जो दे उसका भला और जो न दे उसका भी भला मान कर, अपने परिवार का पालन पोषण करता हूँ!’ कहते-कहते वह मेरी आंखों से ओझल हो गया। मेरे बाजू के सहयात्री बगले झांक रहे थे।

-मो. 9234679973

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