एस.एच.ओ. साहब की लीपापोती 

पहले वो सबको ऐरा- गैरा- नत्थू- खैरा समझते थे। सबके ऊपर उनका डंडा चला करता था। वो थे और उनका डंडा था। वैसे तो उनको अपने बाप पर भी भरोसा नहीं था। जितना उनको अपने डंडे पर भरोसा था। वो सदा डंडे से ही बात करते थे। डंडे की जोर पर वो सब कुछ नियंत्रित कर सकते थे। उनका जो डंडा था वो किसी जादूगर की छड़ी की तरह था। जिसके प्रभाव से सब लोग इधर-उधर घूम जाते थे। 
 डंडा का ऐसा जोर था कि लोग उनके आगे कुछ ना बोलते थे। डंडा ही न्याय था डंडा ही संविधान था। एक तरह से वो दबंग किस्म के आदमी थे। उनकी दबंगई कुछ ऐसी थी कि सब लोग उनसे पनाह मांगते थे। वो जिसको-तिसको उठाकर हाजत में बंद कर देते थे। उनको लोग यमराज की पदवी से नवाजते थे। सुना है इस बार वो काले कोट से भिड़ गए हैं। और उनपर डंडा चल गया है। अब डंडा तो डंडा है। वो भी व्यवस्था का डंडा। व्यवस्था का डंडा जब चलता  है तो अच्छे-अच्छों के दुकान-मकान बिक जाते हैं। ये एस.एच.ओ. साहब के डंडे का ही कमाल था कि उन्होंने इसी डंडे की जोर आजमाईश पर सैकड़ों-करोड़ों की संपत्ति बना ली  थी लेकिन वो भिड़ गए काले कोट से। उनको नहीं पता है कि जो-जो आदमी व्यवस्था से भिड़ा है। उसकी चड्ढी तक बिक गई है। एस.एच.ओ. साहब किस खेत की मूली हैं लेकिन वो मोटी चमड़ी के थे। व्यवस्था को अपनी जेब में रखते थे।  कानून, साहब, जज, वकील-कोर्ट कचहरी सबको जेब में लेकर चलते थे। 
ये उनका अपने ऊपर आत्मविश्वास ही था कि उन्होंने इस बार ‘आ बैल मुझे मार वाली कहावत को चरितार्थ कर दिखाया था’। 
भला हो इस मोबाइल का कि थाने में ही उनका वीडियो बना लिया गया था।  और इसी मोबाइल ने उनके अंधेर-मचाने की कला को कैमरे में कैद कर लिया था। आज के जमाने में लोग गोली-बंदूक से डरें न डरें लेकिन कैमरे से ज़रूर डरते हैं लेकिन एस.एच.ओ. साहब न डरे। कैमरै पर खूब हाथ-पैर चलाया। और वो रातों-रात लाईम लाइट में आ चुके हैं। 
सुना है वरीय अधिकारी उनके किए पर लीपा-पोती करने में लगे हुए हैं। और एस.एच.ओ. साहब को नीति की बातें और पुलिस-पब्लिक-रिलेशन कि बातों को पढ़ाने की बात कर हैं। दरअसल वो एस.एच.ओ. साहब की कारगुजारियों पर लीपा पोती करने में लगे हैं।

-मेघदूत मार्केट फुसरो,बोकारो झारखंड, 
पिन 829144 

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