महज जलधारा नहीं, जम्मू की सांस्कृतिक आत्मा है तवी नदी

जम्मू शहर की हम कल्पना तवी नदी के बिना नहीं कर सकते। जैसे किसी जीवंत शरीर का हृदय धड़कता है, वैसे ही जम्मू के लिए तवी की निरंतर बहती धारा है। यह नदी महज पानी की धार नहीं बल्कि जम्मू की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और भावनात्मक पहचान का आधार स्तंभ है। स्थानीय डोगरा समाज में तवी को सूर्य पुत्री कहा जाता है यानी एक ऐसी बेटी जिसे सूर्य देव के आंचल से जीवन मिला हो। यही उसकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व का आधार है। 
तवी नदी शिवालिक पर्वतों की गोद से जन्मती है। सुधमाह महादेव के निकट धोडाधड़ क्षेत्र में प्राकृतिक झरनों से इसका उद्गम माना जाता है। 4,220 मीटर की ऊंचाई से उतरकर यह नदी 141 किलोमीटर का सफर तय करके अखनूर के पास चिनाब नदी में मिल जाती है। अपने प्रवाह में यह पहाड़ी पत्थरों, झाड़ियों, घास के मैदानों और घाटियों को चीरते हुए आगे बढ़ती है। तवी नदी का प्रवाह इसे एक युवा नदी के रूप में दर्शाता है। क्योंकि इसका प्रवाह तेज, पथरीला और जल स्वच्छ होता है। गर्मियों में चूंकि हिमालय में बर्फ पिघलती है, इसलिए गर्मियों के मौसम में इसमें पानी बढ़ जाता है, जबकि सर्दियों में नदी शांत और सक्रिय हो जाती है। इन दोनो मौसमों के विपरीत मानसून के आते ही तवी का शक्तिशाली और प्रचंड रूप देखने को मिलता है। तवी का स्थान केवल भूगोल में ही नहीं है। पौराणिक आख्यानों और लोक-साहित्य में भी यह रची बसी है। सूर्य पुत्री तवी की मान्यता डोगरा राजवंश के इतिहास की सांस्कृतिक धुरी है। जम्मू का प्रतिष्ठित बहू-किला इसी नदी के किनारे स्थित है तथा यहीं स्थित बाग-ए-बहू बागीचा और उसके पास की घाटियां तवी को सौंदर्य की देवी का दर्जा देती हैं। प्राचीन मंदिरों, धार्मिक अनुष्ठानों में भी तवी नदी की भूमिका हमेशा रही है। डोगरा राज परिवार के संस्कार-घाट, पूजा-तीर्थ, अर्पण और पितृ श्रद्धा इसी नदी के तट पर सम्पन्न होती है। 
छठ पर्व, मकर संक्रांति, डोगरा मेलों और विशेष पूजा अर्चनाओं का केंद्र तवी नदी के तट ही होते हैं। शिवरात्रि में यहां विशेष उत्सव सम्पन्न होता है। डोगरी लोकगीतों में बार-बार तवी नदी का जिक्र आता है। एक मशहूर पंक्ति है, ‘तवी दे पाणियां वर्गे, सच्चे ने जम्मू दे लोग यानी तवी के पानी की तरह ही जम्मू के लोगों का मन भी निर्मल है। तवी जम्मू की आत्मा है। इसके रिवर फ्रंट, घाटों और हरित पट्टियों के माध्यम से यह नदी एक सांस्कृतिक स्थल के रूप में पुनर्जीवित हो रही है। सिर्फ संस्कृति ही नहीं जम्मू क्षेत्र के पर्यावरण का भी मूल आधार तवी नदी ही है। इसकी घाटी में समृद्ध जैव विविधता पायी जाती है। देवदार, चीड़, शीशम, क्राप, पॉपुलर तथा अनेक औषधीय पेड़ इसके किनारे पनपते हैं और इसको समृद्ध वनस्पति स्थल बनाते हैं। इसी तरह तवी घाटी में हिमालयी लंगूर, पहाड़ी लोमड़ी, जंगली बिल्ली और काला भालू जैसे जीव जन्तु भी पाये जाते हैं। जबकि यहां किंग फिशर, उल्लू, बगुले, पहाड़ी गौरैया जैसे पक्षी इसकी जीव विविधता की गाथा कहते हैं। इसी में ट्राउट, महाशीर और क्राप जैसी मछलियों की भी उपस्थिति इसे खास बनाती है।
तवी का तेज प्रवाह इसका पथरीला तल इसे देश की दूसरी नदियों की अपेक्षा बेहद स्वच्छ रखता है। यह चिनाब की प्रमुख सहायक नदी है और सिंध प्रणाली में जल उपलब्धता बढ़ाने पर अपना योगदान देती है। इसके तलों पर उगने वाली घास और वृक्ष नदी के कटाव को रोकते हैं और जैविक स्थिरता बनाये रखते हैं। सर्दियों में इसकी जलराशि कम और प्रवाह धीमा हो जाता है, जबकि गर्मियों में बर्फ पिघलने के कारण इसकी गति बढ़ जाती है और मानसून में यह अकसर प्रचंड रूप में देखी जाती है। शहर के मध्य से गुजरते समय इसका घुमावदार प्रवाह जम्मू शहर को कई प्राकृतिक वेट यानी छोटे द्वीप की आभा देता है। यह जम्मू शहर के पेय जल की प्रमुख स्रोत है। साथ ही इससे जम्मू, उधमपुर और अखनूर ज़िलों की कृषि भूमि सिंचित होती है। तवी नदी का रिवर फ्रंट आजकल जम्मू के सौंदर्य का केंद्र है। बहू-किला, बाग-ए-बहू और महामाया मंदिर, तवी की वजह से ही इस शहर की आकर्षक धरोहरों में शामिल हैं। लेकिन हर नदी की तरह तवी के भी कुछ संकट हैं जैसे शहर का बहने वाला नाला, कचरा और सीवेज इसे बीमार करता है। अवैध रेत खनन इसे घायल करता है और शहरीकरण का बढ़ता बोझ इसके विस्तार को छीनता है तथा जलस्तर में कमी का प्रमुख कारण बनता है। 
बहरहाल तवी नदी महज एक नदी नहीं बल्कि जम्मू शहर की सांस्कृतिक, भौगोलिक और ऐतिहासिक धरोहर है। इसे इतिहास की धड़कन और संस्कृति की आत्मा कहते हैं। इसका प्रवाह शहर को जीवन देता है और इसकी स्मृतियों का पुल जम्मू शहर की पहचान का प्रमुख आधार है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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