खूब उल्लू बनाया
लखनऊ-प्रयागराज हाईवे पर एक ढाबे में टैक्सी ड्राइवर आकाश चाय-नाश्ता कर रहा था। तभी अचानक लगभग चौबीस साल की तेज कदमों से दौड़ती हुई एक लड़की आरोही हाथ में सूटकेस लिए उसके पास आ कर बोली ‘चलिए, लखनऊ जाना है?’
‘ठीक है, बैठ जाइए। बाकी यात्री भी आ जाएं तो चलेंगे।’ आकाश ने चाय पीते हुए कहा।
थोड़ी देर बाद आरोही फिर बोली, ‘जल्दी कीजिए नए मुझे लखनऊ बहुत जल्दी पहुंचना है। गाड़ी स्टार्ट कीजिए।’
आकाश ने कहा, ‘मैडम, बाकी तीन सवारियों का किराया कौन देगा? आपके के अकेले के किराए से तो पेट्रोल का खर्च भी नहीं निकलेगा। मेरा नुकसान हो जाएगा।’
‘ठीक है, मैं सबका किराया दे दूंगी। बस, आप जल्दी चलिए।’
आरोही के इस लालच भरे प्रस्ताव और उसकी सुंदरता देख कर आकाश का मन डोल गया। अकेली लड़की के साथ लांग ड्राइव का आनंद लेने की चाह में आकाश जल्दी से ड्राइविंग सीट पर बैठ गया। उसके बैठते ही आरोही भी अकेली ही उसकी टैक्सी में बैठ गई। फिर तो गाड़ी लखनऊ की ओर दौड़ पड़ी।
दस मिनट दोनों खामोश रहे। इसके बाद आकाश से रहा नहीं गया। उसने कहा, ‘मैडम, इतनी जल्दी क्या थी? कोई ज़रूरी काम है क्या?’
आरोही ने हल्की थकी आवाज में कहा, ‘मेरे मम्मी-पापा मेरी शादी बगल वाले गांव के एक लड़के से करने पर अड़े हुए हैं। उस लड़के में न कोई दम है, न ही वह कोई खास सुंदर ही है। पढ़ा भी आठवीं तक ही है। खेतों में काम करता है। मैं उससे शादी नहीं करना चाहती। इसलिए घर छोड़ कर लखनऊ जा रही हूं।’
आरोही की बात सुन कर आकाश मन-ही-मन खुश हुआ कि इतनी सुंदर लड़की अभी तक अविवाहित है। उसने पूछा, ‘लखनऊ में किस के घर जाएंगी?’ अभी तो वहां मेरा कोई नहीं है। पर पहुंच कर कोई न कोई व्यवस्था कर ही लूंगी।’ आरोही ने कहा।
‘आप का नाम क्या है?’ आकाश ने परिचय बढ़ाने की गरज से पूछा।
‘मेरा नाम आरोही है। अब मुझे मैडम मत कहिएगा। मुझे सीधा मेरा नाम ले कर आरोही कहिएगा और आप का नाम क्या है?’
‘मेरा नाम आकाश है। मैं एमए तक पढ़ा हूं।’ आकाश ने गर्व से कहा।
‘अरे वाह, आकाश जी एमए तक पढ़ाई करके भी आप टैक्सी चलाते हैं? टैक्सी चला कर कितनी कमाई कर लेते हैं?’
आकाश खुश होकर बोला, ‘यह काम तो मैं शौकिया करता हूं। मुझे लंबी ड्राइव पर जाना, बुजुर्ग और बीमार यात्रियों की मदद करना अच्छा लगता है। इससे नौकरी से भी दोगुनी कमाई हो जाती है।’
‘वाह, दोगनी कमाई।’ आरोही प्रभावित हो उठी।
‘आप भी मुझे बस आकाश कह सकती हैं।’ आकाश ने कहा।
आरोही ने सहजता से पूछा, ‘अच्छी कमाई है तो आप का रहन-सहन भी अच्छा होगा। आप के बच्चे कितने हैं?’
आकाश मुसकरा कर बोला, ‘अभी मेरी शादी ही नहीं हुई है तो बच्चे कहां से होंगे। मम्मी-पापा के साथ निशातगंज के फ्लैट में रहता हूं।’
दोनों को पता चल चुका था कि वे अविवाहित हैं। टैक्सी हाईवे पर तेजी से दौड़ रही थी। रायबरेली के साई नदी पर बने पुल पर पहुंचते ही आरोही ने कहा ‘चलो, यहां किसी रेस्टोरेंट में चाय-नाश्ता कर लेते हैं?’
आकाश मन-ही-मन फूला नहीं समाया। सिविल लाइंस के एक बढिया रेस्टोरेंट ढाबे के सामने उसने टैक्सी रोक दी। आरोही ने गर्म समोसे और चाय का आर्डर दिया।
वह समोसे की प्लेट उठा कर आकाश को देने लगी तो उसका हाथ आकाश के हाथ से छू गया। आकाश का चेहरा लाल हो गया और धड़कन तेज हो गई। आरोही भी शरमा गई।
जब बिल आया तो वह मोबाइल निकाल कर पैसे देने लगी तो आकाश ने तुरंत जेब से पैसे निकाल देते हुए कहा, ‘आप रहने दीजिए, मैं पेमेंट किए देता हूं।’
‘थैंक यू।’
आरोही के इस एक शब्द ने आकाश के दिल की घंटियां बजा दीं। लखनऊ की ओर गाड़ी फिर दौड़ने लगी। पीछे की सीट पर बैठी आरोही ने कहा, ‘आकाश, मैं आगे बैठ सकती हूं क्या?’
‘हां-हां, क्यों नहीं।’
आकाश ने गाड़ी रोक दी तो वह आगे की सीट पर आकर बैठ गई। अब आरोही बीच-बीच में जानबूझ कर गियर पर हाथ रख देती, ताकि आकाश के हाथ से उसका स्पर्श हो जाए। आकाश तो सपनों की दुनिया में पहुंच चुका था, हनीमून, गोवा, शिमला, कल्पनाओं की दुनिया में वह उड़ रहा था। रात हो चुकी थी। टैक्सी जब लखनऊ के गोमतीनग चौराहे पर पहुंची तो आरोही ने आकाश से उतारने को कहा। टैक्सी से उतर कर आरोही ने कहा, ‘यहां कहीं एटीएम होगा?’
‘क्यों?’ आकाश ने पूछा।
‘बाकी तीन सवारियों का भी तो किराया देना होगा न?’
आकाश प्रेम से बोला, ‘मैंने आप से कब पैसे मांगे हैं? अब यह घर की बात है। आप बस अपना मोबाइल नंबर दे दीजिए। जब कभी मौका मिलेगा, मिलते रहेंगे।’
आरोही ने प्यार से कहा, ‘सच में किराया नहीं लोगे?’
फिर एक कागज पर अपना नंबर लिख कर आकाश को थमा कर गोमतीनगर की ओर चली गई। आकाश प्रेमभरी नज़रों से उसे जाते हुए ताकता रहा। तभी उसकी नजर सीट पर पड़े एक लिफाफे पर पड़ी। वह फुसफुसाया, ‘अरे’ इसे तो आरोही भूल गई।’
उसने तुरंत आरोही द्वारा दिया नंबर मिलाया, ‘हेलो, आरोही?’
सामने से आवाज आई, ‘तेजालाल बोल रहा हूं, कौन?
‘आरोही से बात कराइए।’
‘गलत नंबर है! यहां कोई आरोहीवारोही नहीं है।’
आकाश चौंका। उसने दो मिनट बाद फिर नंबर मिलाया, ‘आरोही...’
‘कहा नए गलत नंबर है। दोबारा फोन किया तो कान उमेठ दूंगा।’ तेजालाल तमतमा गया।
आकाश डर गया। उसने लिफाफा खोला। अंदर एक चिट्ठी थी, ‘गरम समोसे-चाय और लखनऊ तक लिफ्ट मजेदार रही। इसके लिए धन्यवाद। खूब उल्लू बनाया नघ्ष्
आकाश पत्थर बन कर खड़ा रहा।
-जेड.436एए सेक्टर.12,
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मो. 8368681336



