आकर्षक इमारतों की ऐतिहासिक नगरी है फतेहपुर सीकरी

अतीत की गौरवगाथा व स्वर्णिम इतिहास को अपने आंचल में समेटे पर्यटकों का स्वर्ग कहा जाने वाला भारत अपने अजेय दुर्गो, ऐतिहासिक स्मारकों, स्थापत्य कला, भव्य प्रसादों एवं हवेलियों व कलात्मक मंदिरों के लिए विश्वविख्यात है जिन्हें निहारने के लिए लाखों की संख्या में देश विदेश के पर्यटक आते है। यहां कला वैभव एवं शौर्य की जीती जागती ऐतिहासिक इमारते हैं जिन्होंने अपने समक्ष न जाने कितने साम्राज्यों को बसते और उजड़ते देखा है। 
राज गया, रजवाड़े गये और बस पीछे छोड़ गए पत्थरों के सीने पर कलाकारों की छैनी-हथौड़ी से उकेरी गई रियासती काल की दास्तान, जो केवल मात्र इमारते भर नहीं बल्कि इनमें एक संपूर्ण काल का इतिहास झलकता है। 
उत्तर प्रदेश के आगरा ज़िले में भी एक ऐसा ही प्रमुख पर्यटक स्थल है फतेहपुर सीकरी जो अपनी आकर्षक इमारतों तथा कलाकृतियों के लिए प्रसिद्ध है जिसमें मुगलकालीन इमारतों की भव्यता आज भी आकर्षण का केन्द्र है। फतेहपुरी सीकरी हिन्दू एवं फारसी स्थापत्य कला को संजोए ऐतिहासिक इमारतों का शहर है। 
बुलंद दरवाजा 
 मुगल बादशाह अकबर ने अपने गुजरात विजय की याद में विश्व के सबसे बड़े प्रवेश द्वार का निर्माण कराया था जिसे बुलंद दरवाजा के नाम से जानते हैं। बुलंद दरवाजा फतेहपुरी सीकरी की सबसे बड़ी इमारत है। इस इमारत की ऊंचाई लगभग 280 फुट है। इस इमारत के दरवाजे पर अरबी अक्षरों में कुरान की आयतों को उकेरा गया है। इसी के अंदर जामा मस्जिद भी स्थित है। जामा मस्जिद और दरगाह के पास घने पेड़ों की छाया में संगमरमर के पत्थरों से निर्मित एक छोटा-सा तालाब भी है। इस मस्जिद के अंदर एक ऐसा पत्थर लगा है जिसे थपथपाने से नगाड़े से निकलने वाली ध्वनि के समान आवाज सुनाई देती है। 
शेख सलीम चिश्ती की दरगाह 
 यह मशहूर दरगाह बुलंद दरवाजा के अंदर ही स्थित है। इस दरगाह में जाने के लिए बुलंद दरवाजे की 52 सीढ़ियों को पार करना पड़ता है। इस दरगाह का निर्माण सन् 1581 ई. में हुआ था। शेख सलीम चिश्ती की दरगाह को सफेद संगमरमर के पत्थरों से बनाया गया हैं। इसके मुख्य द्वार पर गुजराती शैली से निर्मित चार खम्भे हैं। काले एवं पीले रंग के मौजैक संगमरमर पत्थरों से निर्मित अष्टकोणी कुर्सी वाले अर्द्ध गोलाकार गुम्बद वाले कक्ष में शेख सलीम चिश्ती की समाधि स्थित है। इस समाधि को बेशकीमती सीप सींग चंदन के अद्भुत शिल्प द्वारा सजाया गया है। 
दीवान-ए-खास 
 यह इमारत मुगल बादशाह अकबर का शाही कक्ष था। इसका निर्माण फारसी वास्तु कला के अनुसार बहुत ही विशाल और उस पर बेहद खूबसूरत नक्काशीद्वार पत्थरों से किया गया है। इस इमारत को इस तरह से बनाया गया है कि बाहर से देखने पर यह केवल एक मंजिला इमारत दिखाई देती है लेकिन वास्तव में अंदर से यह दो मंजिला इमारत है।
दीवान-ए-आम 
यह एक ऐसी इमारत है जहां शासक अपनी जनता से मिलकर उनकी फरियाद सुनता था। इस इमारत का निर्माण पहले लकड़ी से किया गया था लेकिन बाद में शाहजहां ने इसका निर्माण संगमरमर के पत्थरों से कराया। इन पत्थरों पर फूलों की बहुत ही खूबसूरत नक्काशी की गई है।      
पंचमहल 
 यह एक पांच मंजिली इमारत है जो 176 खम्भों पर बनी हुई है। इसके खंभों पर बना प्रत्येक मंजिल के कमरे अपने नीचे वाली मंजिल पर बने कमरे से आकार में छोटे हैं। इस इमारत की सबसे खास बात यह है कि इसे हर खम्भे को अलग-अलग तरह की कलाकृतियों से सुसज्जित किया गया हैं इस इमारत के निर्माण में अकबर ने अपनी हिन्दू बेगम की भावनाओं का विशेष ख्याल रखा था। इस महल में कहीं-कहीं पर मन्दिर के घंटों तथा भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं के भी चित्रों को उकेरा गया है। 
राजमहल 
 इस महल की सजावट तुर्की के दो शिल्पियों द्वारा की गई थी। इन दोनों शिल्पियों ने समुद्र की लहरों की कलाकृति से इस महल को सुसज्जित किया था। इस महल की दीवारों पर पशु पक्षियों की बहुत ही सुंदर तथा कलात्मक चित्रों को उकेरा गया है। इसी इमारत में मुगल शासक अकबर का शयन कक्ष तथा विश्राम गृह था। यहां पर अनूप ताल नाम का एक तालाब भी है। ऐसा कहा जाता है कि इसी तालाब के पास बैठकर तानसेन संगीत के दीपक राग अलापा करते थे। (उर्वशी) 

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