बच्चों में सुन्दर लेखन की आदत डालें

लिखना भी एक कला है लेकिन बच्चों को लिखना सिखाना तो यह ओर भी बड़ी कला है। बच्चों को लिखना सिखाने के लिए माता-पिता, अध्यापक तथा घर के अन्य बड़े सदस्यों का सहयोग बहुत ही आवश्यक है। बहुत से माता-पिता को यह समस्या होती है कि बच्चों को लिखना कैसे सिखाया जाए? जिस प्रकार बच्चों को पढ़ाने के लिए लगातार अभ्यास कराना पड़ता है, उसी प्रकार लिखने का भी निरंतर प्रयास कराना आवश्यक है। पढ़ने की तुलना में लिखना ज्यादा कठिन है। ऐसा देखा गया है कि जो जल्दी पढ़ना सीख जाते है वे लिखना देर से सीखते हैं। कुछ बच्चों को पढ़ना-लिखना साथ-साथ सिखाया जाता है। बच्चों को लिखना सिखाने के लिए माता-पिता, अध्यापक तथा घर के अन्य बड़े सदस्यों का सहयोग बहुत ही आवश्यक है। 
यदि बच्चे ने मेहनत करके लिखा है तो बड़ों को चाहिए कि वह उसे देखें तथा उन्हें पढ़ कर सुनाने के लिए कहें। सामान्यत: बच्चे वही लिखते हैं जो सरल पाते हैं। बच्चे लिखने-पढ़ने में जल्दबाजी नहीं करते। कुछ बच्चे लिखना पढ़ना एक साथ सीख जाता हैं। प्रारम्भ में बच्चाें को लिखने की शिक्षा माता-पिता तथा घर के अन्य बड़े सदस्यों द्वारा घर पर ही दी जाती है। बाद में जब बच्चा स्कूल जाने लगता है तो यह जिम्मेदारी शिक्षकों पर आ जाती है लेकिन स्कूल जाना प्रारम्भ करने के बाद भी माता-पिता की जिम्मेदारी बनी ही रहती है कि बच्चा स्पष्ट व सुंदर लिखे।  प्रारंभिक कक्षाओं में यह देखा गया है कि बच्चों से लिखवा कर पढ़वाने की प्रवृत्ति नहीं होती। शिक्षकों का कहना है कि बच्चों को सर्वप्रथम छपे हुए अलग-अलग वर्णमाला पढ़ाना सिखाना चाहिए, जिससे अक्षरों को पढ़ने व पहचानने की क्षमता जागृत हो। आमतौर पर वे बहेद एकाग्र होकर कसकर पैंसिल पकड़ कर लिखते हैं इससे उनकी आंखों पर जोर पड़ने की संभावना होती है परिणामस्वरूप शीघ्र ही उसे चश्मा पहनना पड़ता है। माता-पिता को बच्चों की इस आदत पर नियंत्रण प्रारंभ से ही रखना चाहिए। लिखना पढ़ना एक-दूसरे का पूरक माना जाता है। दोनों में बहुत गहरा संबंध होता है। प्रारंभिक कक्षाओं के बाद की अवस्था में बच्चों की लिखावट में काफी सुधार आ जाता है। इस समय तक माता-पिता भी एकाग्र होकर बच्चों के लिखने पर ध्यान देते हैं। 
आज की पीढ़ी में देख गया है कि बच्चे काफी कम उम्र में लिखने-पढ़ने के प्रति रूचि दिखाने लगते हैं। विशेषकर दूरदर्शन, रेडियों आदि के प्रभाव से जल्द समझदार हो जाते हैं। उनमें बड़ों को देख कर लिखने की इच्छा जागती है। वे अपना, अपने मित्रों तथा माता-पिता का नाम लिखने का प्रयास करते हैं। माता-पिता या बड़ों को चाहिए कि वे ऐसे मौके का पूरा फायदा उठाएं, बच्चों में सही व सुन्दर लिखने को प्रोत्साहित करें।  बच्चे को जो लिखवाया जा रहा है उसे जोर-जोर से बोलना चाहिए ताकि वह शब्द बच्चा अच्छी तरह से सुने। बच्चे जैसा सुनेगे वैसा लिखेंगे। अगर बच्चा अशुद्ध और अस्पष्ट लिख रहा है तो उसे डांटने फटकारने के बजाये प्यार से बताना चाहिए। यदि उसे डांटा-फटकारा गया तो उसमें हीन भावना आ जाएगी और वह यही समझेगा कि मैं सुन्दर और शुद्ध लिख ही नहीं सकता। बच्चे से ऐसी चीजें लिखवाएं जिससे उसमें रूचि पैदा हो, जैसे फिल्मों के नाम या कोई ऐसी फिल्म की कहानी जो उसने देखी है। आजकल बच्चे के लिए शिक्षाप्रद फिल्में भी आती रहती हैं। 
बहुत से बच्चों की बुद्धि सृजनशील होती है तो ऐसे बच्चों को कहना चाहिए कि जो कुछ भी उसके मन में है वह लिखे। बहुत से माता-पिता लिखावट की सुंदरता को महत्व नहीं देते है। बच्चा जैसा लिख रहा है, ठीक है। यह लिखावट के प्रति लापरवाह हो जाते हैं और इससे बच्चे की लिखावट पर बुरा असर पड़ता है।

(सुमन सागर)
 

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