विलुप्त होने की कगार पर है घड़ियाल 

घड़ियाल क्रोकोडिलिया गण का जीव है। इस गण के अंतर्गत चार प्रमुख प्राणी आते हैं- एलीगेटर, कैमान, मगर और घड़ियाल। इनमें से घड़ियाल एकमात्र ऐसा जीव हैं, जो भारतीय उपमहाद्वीप के अतिरिक्त कहीं भी नहीं पाया जाता। यह भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और बर्मा की प्रमुख नदियों तथा झीलों में ही देखने को मिलता है। भारत में यह गंगा, महानदी, चम्बल, सिंधु, ब्रह्मपुत्र तथा इरावती नदी और इसकी सहायक नदियों तथा चिल्का झील में पाया जाता है।  जीव वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इसका इतिहास और सामाजिक जीवन मगर के समान होना चाहिए। घड़ियाल की शारीरिक संरचना मगर के समान ही होती है, किन्तु अपने लंबे थूथुन के कारण यह अलग से पहचाना जा सकता है। सामान्यतया घड़ियाल की लंबाई चार मीटर से छ: मीटर तक होती है। इसके शरीर का रंग जैतूनी हरा होता है एवं इस पर गहरे रंग के निशान होते हैं। घड़ियाल के शरीर के ऊपरी भाग पर कठोर शल्कों का आवरण होता है। इसका थूथुन लंबा और पतला होता है। इसकी लंबाई मस्तक की चौड़ाई की लगभग छ: गुनी होती है। नर घड़ियाल के थूथुन के सिरे पर एक घड़ा सा होता है। इसी घड़े के कारण इसे घड़ियाल कहा जाता है। नर और मादा घड़ियाल की संरचना एक जैसी होती है, किन्तु मादा के थूथुन पर घड़ा नहीं होता। घड़ियाल के थूथुन के अंत में नथुने होते हैं एव नर घड़ियाल की नाक कुछ फूली हुई होती है। इसे यह नथुने बंद कर लेने के बाद गुब्बारे की तरह फुलाकर घड़े जैसा कर लेता है। 
घड़ियाल के मुंह में ऊपर के जबड़ों में दोनों तरफ 29-29 दांत एवं नीचे के जबड़े में 26-26 दांत होते हैं। इसके सभी दांत लगभग एक जैसे और समान आकार के होते हैं। घड़ियाल के दांत इस प्रकार के होते हैं कि दोनों जबड़ों के बंद कर लेने पर इस प्रकार मिल जाते हैं कि इसके मुंह में फंसी हुई छोटी सी मछली भी बाहर नहीं निकल सकती। घड़ियाल के आगे के पैरों में पांच-पांच उंगलियां और पीछे के पैरों में चार-चार उंगलियां होती हैं एवं उंगलियों में तेज नाखून होते हैं। घड़ियाल के पिछले पैरों की उंगलियों के मध्य मजबूत झिल्ली होती है, जो तैरने में इसे विशेष सहायता देती है। घड़ियाल का प्रमुख भोजन मछली है। इसके साथ ही यह मगर के समान छोटे-छोटे स्तनपायी जीवों, जलीय पक्षियों तथा कछुओं आदि का भी शिकार करता है। सामान्यतया घड़ियाल मानव से डरता है, किन्तु कभी-कभी यह मानव पर आक्रमण भी कर देता है।
घड़ियाल के शिकार करने का ढंग, मगर से पूरी तरह से भिन्न है। घड़ियाल शिकार की तलाश में पानी के भीतर अपनी आंखें और नथुने बाहर किये हुए तैरता रहता है और जैसे ही शिकार के निकट पहुंचता है, अपनी आंखों को बंद करके सिर पानी के भीतर कर लेता है। अब केवल इसके नथुने ही पानी के बाहर रह जाते हैं। इस तरह शिकार इसे देख नहीं पाता और यह उसके और निकट पहुंच जाता है। अचानक इसके जबड़े पानी के भीतर खुलते हैं और शिकार को दबोच लेते हैं। घड़ियाल के पेट से अनेक बार स्त्रियों के आभूषण निकले हैं। इससे लोगों की यह धारणा बन गयी है कि घड़ियाल आदमखोर होता है। वास्तव में यह धारणा भ्रमपूर्ण है। घड़ियाल मानव से डरता है, लेकिन यह मानव की सड़ी-गली लाशें अवश्य खाता है।
समागम काल में नर घड़ियाल मादा को आकर्षित करने के लिये इसी घड़े से एक विशेष प्रकार की लययुक्त ध्वनि निकालता है। इस आवाज को सुनकर मादा नर के निकट पहुंच जाती है। मगर के समान घड़ियाल भी पानी के भीतर समागम करता है। समागम के पश्चात् मादा घड़ियाल पानी के बाहर, रेत में गड्ढ़ा बनाकर 40 से 60 तक अंडे देती है और उन्हें रेत से ढंक देती है। इसके अंडों की लंबाई लगभग 9 सेंटीमीटर तथा चौड़ाई 6 सेंटीमीटर होती है। अंडों से बच्चे निकलते हैं। जन्म के समय इनका रंग धूसर हरा और लंबाई 35 से 40 सेंटीमीटर के मध्य होती है। 
बच्चों को, जन्म के तुरंत बाद मादा पानी में ले जाती है और पालन-पोषण के साथ ही इनकी सुरक्षा का कार्य करती है। मादा घड़ियाल हमेशा रेत के गड्ढ़े में अंडे देती है। अंडों से बच्चे निकलने के बाद, मादा इन्हें गड्ढ़े से बाहर विशेष सहयोग देती है। वह उन्हें अपने पंजों से सहारा देकर गड्ढ़े से बाहर निकालती है और एक-एक करके सभी को पानी में ले जाती है। 

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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