गज़ल-महबूबा की हां उसकी मंज़ूरी है

महबूबा की हां उसकी मंज़ूरी है।
और उसका इनकार उसकी मजबूरी है।
हम भी परस न पाये मीठी थी चूरी,
रूठे लफ़्ज़ तो रह गई नज़्म अधूरी है।
तुम ़गज़ल का मतलाअ हो मैं हूं म़कताअ,
तन्हा रहना दोनों की मजबूरी है।
दिलकश होता है हर रंग मुहब्बत का,
दिल है उस पे इश्क का रंग ज़रूरी है।
देती है मुस्कान संजीदा हो के जो,
यह तो अपने अश्कों की मज़दूरी है।
देश की रक्षा करें मिज़ाइल और तोपें,
इनके साथ ़कलम का साथ ज़रूरी है।

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