मौसम में गर्मी भारी है
इस मौसम की बलिहारी है।
मौसम में गर्मी भारी है।।
है ताप लिए विकराल चली,
ये पवन करे बेहाल बली।
क्यों क्रोधित सूर्य हुए दिखते,
धरती को लगता गई छली।।
अब कौन बचा हितकारी है।
मौसम में गर्मी भारी है।।
तपती धरती का रूप देख।
अब दूर क्षितिज पर मेघ-रेख।
मन में जगती है आस खास।
कानों में गूंजें मधुर लेख।।
फिर भी फैली लाचारी है।
मौसम में गर्मी भारी है।।
नदियां-नाले सूखे सारे।
हैं प्राण निकल लगते हारे।
ज्वाला सी लिपटी पवन चले।
लगते हैं त्राहि-त्राहि नारे।।
होती जीवन की ख्वारी है।
मौसम में गर्मी भारी है।।
प्यासी चिड़िया है भटक रही।
पशुओं को गर्मी खटक रही।
अब कुम्लाहे सब फूल कली,
पीड़ा इन सबकी कौन कही।
खुद पीड़ित सब नर-नारी है।
मौसम में गर्मी भारी है।।
जलती धरती की सुनो पुकार।
मेघों ने सोचा कर विचार।
धरती का संकट दूर करें।
होने दें वर्षा की फुहार।
अब वर्षा-ऋतु की बारी है।
मौसम में गर्मी भारी है।।
है कुद्ध गगन में सूर्य खड़ा।
जब पावक बरसाने हुआ अड़ा।
अनुराग जगा तब मेघों का।
तब सृजन ध्वंस से हुआ बड़ा।।
ये प्रेम सदा जयकारी है।।
मौसम में गर्मी भारी है।।
-राज किशोर वाजपेयी
-मो. 9425003616

