अन्धेरे की दुनिया में विलुप्त होते जुगनू

अगर कहें कि जुगनू हाल के हमारे दो-ढाई दशकों के तथाकथित विकास की बलि चढ़ गये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। आप ही बताइये आपने पिछली बार जुगनू कब देखा था? साल 2000 के बाद पैदा हुई पीढ़ी ने तो शायद अपने जीवन में एक बार भी जुगनू न देखा हो। जुगनू कुछ इस तरह से लुप्त होते जा रहे हैं कि वैज्ञानिकों को चिंता है कि कहीं इनकी जगमगाहट अब किताबों में ही कैद होकर न रह जाए। कभी गर्मियों की रात में खेतों, बगीचों या गांवों की पगडंडियों के किनारे टिमटिमाते जुगनू दिखायी देना एक सामान्य बात थी। अंधेरे में अचानक चमकती उनकी छोटी-छोटी रोशनियां ऐसा लगता था जैसे धरती ने आसमान के तारों को अपने पास बुला लिया हो। बच्चे उन्हें पकड़ने के लिए दौड़ते और बड़े कुछ देर रुककर उस प्राकृतिक रोशनी को निहारते थे लेकिन आज शहरों और कस्बों में ही नहीं गांवों में भी यह दृश्य दिखायी पड़ना दुर्लभ हो गया है। 
सवाल है आखिर जुगनू कहां चले गये? दरअसल इसका सीधा सा जवाब यह है कि हमारी तथाकथित विकास यात्रा ने उनके रहने लायक अंधेरा नहीं छोड़ा। हाल में कई ऐसी रिपोर्टें आयी हैं कि इन दिनों रात में इतनी ज्यादा रोशनी होती है, जिसकी आज के 20-30 साल पहले कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आजकल विकास का मतलब है रोशनी से नहाये और जगमगाते शहर। लेकिन शायद हम नहीं जानते या जानकर भी नहीं जानना चाहते कि शहरों की यह जगमगाहट न जाने कितने जीवों के लिए खात्मे का कारण बन गई है। सिर्फ जुगनू जैसे नाजुक कीड़े-मकोड़े ही नहीं बल्कि कई बड़े आकार के पक्षी भी शहरों में बढ़ती रोशनी के कारण अब लुप्त होते जा रहे हैं। जुगनू वास्तव में भृंगों के एक बड़े समूह का हिस्सा हैं। दुनिया में उनकी कई प्रजातियां पायी जाती हैं। जहां तक उनके शरीर से निकलने वाली रोशनी का सवाल है तो यह कोई जादू नहीं बल्कि एक अद्भुत जैव रासायनिक प्रक्रिया का पैमाना है। इनके शरीर में मौजूद ल्यूसीफेरिन नामक पदार्थ, ल्यूसीफेरेज एंजाइम, ऑक्सीजन और अन्य रासायनिक घटकों की प्रतिक्रिया से प्रकाश पैदा होता है। इस प्रक्रिया में किसी तरह की कोई गर्मी नहीं निकलती, इसलिए जुगनू की रोशनी को प्रकृति की ठंडी रोशनी माना जाता है। 
लेकिन इनकी असली कहानी इनकी रोशनी से भी ज्यादा दिलचस्प है। रात के अंधेरे में जुगनू जिस तरह टिमटिमाते हैं, वो केवल एक सुंदर प्राकृतिक दृश्यभर नहीं हैं। कई प्रजातियों में यह उनके संचार और प्रजनन के लिए साथी तलाशने का माध्यम है। गौरतलब है कि नर जुगनू विशेष ढंग से प्रकाश संकेत देता है और मादा अपनी प्रजाति के अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया देती है। कहने का मतलब यह है कि जुगनू की दुनिया में प्रेम और संसर्ग का माध्यम यह रोशनी होती है। मनुष्य ने जब से शहरों से लेकर गांवों तक की रातों को जगमगा दिया है, तब से जुगनुओं की ज़िंदगी को लाले पड़े गये हैं। सड़कों की बत्तियां, इमारतों की रोशनी, रात में जगमगाने वाले विज्ञापन पट, खेतों और औद्योगिक क्षेत्रों में रातभर जलने वाली रोशनी। इन सबके बढ़ते जाल के कारण प्राकृतिक अंधेरा लगभग लुप्त सा हो गया है। कृत्रिम रोशनी जुगनुओं के प्रकाश संकेतों में हस्तक्षेप करती है, जिससे मादा जुगनू को संभोग के लिए अपने साथी की तलाश करना मुश्किल हो जाता है। इस तरह इंसानी विकास ने जुगनुओं की दुनिया के लिए एक बहुत बड़ा संकट खड़ा कर दिया है। जिस रोशनी को मनुष्य सुरक्षा, सुविधा और विकास का प्रतीक मानता है, वही किसी जुगनू के लिए प्रेम की भाषा को शोर में बदल देती है।
जुगनुओं के लिए केवल अंधेरा ही नहीं चाहिए बल्कि उन्हें अपने जीवन चक्र में विस्तार के लिए उपयुक्त वनस्पति, नम मिट्टी, पत्तियों की परत, छोटी झाड़ियां, जलस्रोत और आपेक्षाकृत सुरक्षित प्राकृतिक आवास भी चाहिए होता है। 
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

#अन्धेरे की दुनिया में विलुप्त होते जुगनू