दो-दो प्रदेशों की सरहद लांघता एक काव्य संग्रह


समीक्षा हेतु पुस्तक : माट्टी की आवाज़ (हरियाणवी कविताओं का संग्रह), कवि : राम कुमार आत्रेय, लेखक का पता : 864-ए/12, आज़ाद नगर, कुरुक्षेत्र-136119, हरियाणा, प्रकाशक : गीतिका प्रकाशन, 16, साहित्य विहार, बिजनौर (उ.प्र.), मूल्य : 250 रुपए।
कविता अपने आप में रसों से सराबोर होती है। काव्य किसी भी भाषा में रचा गया हो, अपनी माटी की सुगन्ध महसूस कराता है। संभवत: इसीलिए आत्रेय जी ने हरियाणवी भाषा में लिखी गई कविताओं के इस संग्रह को ‘माट्टी की आवाज़’ शीर्षक दिया है। माटी बोलती भी है। माटी अपने लोगों को बुलाती है, यानि आवाज़ देती है। तभी तो माटी की आवाज़ सुनकर, इसका कज़र् चुकाने के लिए लोग भागे चले आते हैं। प्रत्येक भाषा की मिठास अपने एक मुआशरे के लिए जानी-पहचानी होती है। इसी पहचान को स्थापित करने के लिए राम कुमार आत्रेय ने इन कविताओं की रचना की है।
भाषाएं कोई भी हों, एक-दूसरे के शब्द/स्वर को स्वीकार करके ही आगे बढ़ती हैं। हरियाणा और पंजाब की धरती में सदैव से एक समानता रही है, जिसे आत्रेय जी ने संग्रह की अनेक कविताओं में बनाए रखा है। ‘बैलगाड्डी का पहिया’ कविता में कवि लिखता है—मेरे पोते देख के इस पहिये नै/पूछै सै मनै/अक बैलगाड्डी किसी होवे थी। इन पंक्तियों का स्वर हरियाणवी होने के बावजूद, इसके शब्द अक, बैलगाड्डी पंजाबियत के शब्दों अखे, बैलगाड़ी का भ्रम देते हैं। (पृष्ठ 43) इसी प्रकार ‘गुलाबो भाभी’ का शीर्षक ही पंजाबियत के रंग को गुलाल की तरह उड़ाता है। (पृष्ठ 63) 
कुल मिलाकर आत्रेय जी ने अपने इस संग्रह के शब्द-सार को दो-दो प्रदेशों की आबो-हवा से सराबोर करके एक नये पथ का सृजन किया है। इस संग्रह का दोनों प्रदेशों में स्वागत होगा।