कृषि-मामलों पर लोक चर्चा रचनात्मक नहीं


पंजाब में वोट 19 मई को पड़ेंगे। यह लोकसभा चुनावों का अंतिम पड़ाव है। परिणाम 23 मई को घोषित होंगे। इस समय गांवों में प्रचार पूरे ज़ोरों पर है। चाहे पिछले 2014 के चुनावों के मुकाबले यह कुछ ठंडा है। गांवों में चर्चा यह हो रही है कि कौन-सी पार्टी या प्रत्याशी भ्रष्टाचार के शिकार हैं या फिर जाति-धर्म या गऊशालाएं और गुरुद्वारों जैसे विषयों संबंधी चर्चा होती है। किस पार्टी का 2014 में चुनावी घोषणा-पत्र क्या था और उसमें किए वायदे किस सीमा तक पूरे हुए हैं, इस संबंधी चर्चा पिछड़ गई है। भारतीय जनता पार्टी ने स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट में की गई सिफारिशें विशेष तौर पर फसलों के कम से कम सहायक मूल्य (एम.एस.पी.) खर्चे से 50 प्रतिशत अधिक तय किए जाने और किसानों की फसल कम से कम सहायक मूल्य पर खरीदने का वादा किया था। भाजपा की मोदी सरकार ने पिछले वर्ष 50 प्रतिशत अधिक मूल्य देकर फसलों के कम से कम समर्थन मूल्य तय करने की घोषणा तो की परन्तु यह स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट अनुसार नहीं थे। इसमें ठेके या किराये का खर्चा और परिवार के सदस्यों द्वारा की गई मेहनत का कोई मूल्य शामिल नहीं किया गया। अगर यह कीमतें स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट अनुसार निर्धारित की जाती, उससे 38 प्रतिशत कम थी। फिर सभी फसलें तो तय किए कम से कम समर्थन मूल्य पर नहीं बिकीं सिर्फ गेहूं और धान की फसल ही तय किए गए मूल्य पर खरीदी गई। इस पर पर्दा डालने के लिए भाजपा की केन्द्र सरकार ने अपना लक्ष्य किसानों की आय 2022 तक दोगुनी करने का रख लिया। अब तक किए गए प्रयासों को मुख्य रखते हुए यह लक्ष्य पूरा होने की कोई सम्भावना निकट भविष्य में नज़र नहीं आती। मंत्री और  अ़फसरशाही अभी भी इस विषय पर बातें करके किसानों को विश्वास दिलाने का प्रयास कर रहे हैं कि उनकी आय 2022-23 में दोगुनी हो जाएगी। 
विशेषज्ञों का कहना है दोगुनी तो क्या आय के डेढ़ गुणा होने की भी सम्भावना नहीं। मौजूदा स्थिति भी इस की प्रौढ़ता करती है। मोदी सरकार अनाज के प्रबंध में भी असफल रही है। बफर स्टाक की मात्रा ज़रूरत से कहीं अधिक है। निर्धारित सीमा से अप्रैल में बफर स्टॉक काफी बढ़े थे। बफर स्टॉक दोगुने हैं जिसकी ज़रूरत नहीं। इसका फिज़ूल ही सरकार पर बोझ पड़ रहा है। भाजपा की मोदी सरकार यह कहती है कि उन्होंने 2.75 करोड़ जाली राशन कार्ड पकड़ कर रद्द किए हैं, जो ठीक नहीं। अगर ऐसा होता तो जनता वितरण प्रणाली (पी.डी.एस.) के तहत दिए जा रहे अनाज की मात्रा में कमी आनी चाहिए थी, परन्तु यह तो उतनी ही बरकरार है। वर्ष 2019-20 के बजट में 1.84 लाख करोड़ की अनाज पर सब्सिडी दिए जाने का अनुबंध है, जबकि एफ.सी.आई. (भारतीय अनाज निगम) पर 1.86 लाख करोड़ का ऋण पहले ही खड़ा है। अनाज प्रणाली की वही हालत चल रही है जो भाजपा की सत्ता सम्भालने के समय वर्ष 2013-14 में थी। भारतीय अनाज निगम में भी भाजपा के चुनावी घोषणा-पत्र में किए गए वायदे अनुसार कोई कायाकल्प नहीं किया। कृषि क्षेत्र में यह भारतीय जनता पार्टी की कुछ असफलाएं हैं। इसके अलावा दूसरे क्षेत्रों में भी बहुत कुछ है। दूसरी तरफ कांग्रेस के 2019 के चुनावी घोषणा-पत्र में ऋण माफी, 72,000 रुपए प्रति वर्ष छोटी श्रेणी के 20 प्रतिशत किसानों को आय का वादा और फसलों की कम से कम सहायक मूल्य में बढ़ोतरी करना बताया गया है। अगर पार्टी सत्ता में आ जाती है क्या ऐसा सम्भव है? भविष्य में सत्ता में आने वाली पार्टी को आर्थिक पक्ष से क्या करना चाहिए, इस पर चर्चा नदारद है। ऐसा लगता है कि आम लोगों की विचारधारा यह है कि किस पार्टी या प्रत्याशी को कैसे भ्रष्टाचार तथा आचरण पक्ष से दोषी ठहराया जाए? इस तक की लोक-चर्चा सीमित है जो लोकतंत्र को पिछे की तरफ धकेलती है। प्रत्येक पार्टी का चुनाव घोषणा-पत्र यह ज़रूर दर्शाता है कि निचली श्रेणी के लोगों की अलग-अलग पहलुओं से सहायता की जाएगी।