किसानों की ऐसी दुर्दशा क्यों ?


किसानों की राजनीति बरसों से हो रही है। किसानों की राजनीति करने वाले तो और भी ताकतवर होते जा रहे हैं, परन्तु किसान आज भी उसी हाशिये पर खड़ा है। आत्महत्या की खबरें रोज आती हैं। क्यों हमारे किसान आत्महत्या जैसा बड़ा कदम उठाने को मजबूर होते हैं? किसानों के लिए यूं तो योजनाएं बहुत हैं परन्तु ईमानदारी से उचित प्रबंधन के अभाव में ये योजनाएं कारगर सिद्ध नहीं हो पातीं और किसान उसी स्थिति में हैं। उत्पादन कम हो तो भी महंगाई और ज्यादा हो तो भी उपभोक्ताओं की जेबें कटती ही हैं, क्योंकि सरकारी अनदेखी के चलते जब किसानों को मुनाफा नहीं मिलता तो किसान उसे सड़क पर फैंक देता है या खेतों में ही सड़ने को छोड़ देता है। अपनी लाचारी, विवशता और आक्रोश दिखाने का यही एक रास्ता है। सीमित संसाधनों के अभाव में किसान अपनी फसल को कूड़े के ढेर में देखने को मजबूर हो जाता है, क्योंकि उसके पास बड़े व्यापारियों की तरह फसलों को लम्बे समय तक रखने की कोई सुचारू व्यवस्था तो है नहीं। अगर होती तो वह भी उचित समय आने पर उचित कीमत पर बेचकर अपनी मेहनत का उचित लाभ ले सकता है। लेकिन उसके नसीब में शायद बेचारगी और लाचारी ही है। प्रकृति भी अजीब खेल खेलती है। कभी ओलावृष्टि, कभी सूखा तो कभी बाढ़ किसान की महीनों की मेहनत को अपने तेज़ बहाव में बहा ले जाती है और वह एक किनारे खड़ा होकर मूकदर्शक बन बस देखने को विवश है। जिस तरह गेहूं, धान, गन्ने आदि की फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य सरकार द्वारा तय किया जाता है, उसी तर्ज पर सब्ज़ियों और बाकी फसलों के लिए कोई व्यवस्था नहीं हो सकती क्या? जिसके तहत किसान को विषम परिस्थितियों में भी उचित मूल्य मिल सके। कृषि आधारित इस देश में किसान की इस कदर दुर्दशा देश को ही शर्मसार करती है। ये विडम्बना नहीं तो और क्या है कि हम सबको अन्न मुहैय्या कराने वाला किसान स्वयं भूखा है।