जंगलों की कटाई के कारण शहरों की ओर आते हाथी
4 सितम्बर राष्ट्रीय वन्यजीव दिवस पर विशेष
इंसान और हाथियों के बीच दोस्ती के किस्से सदियों पुराने हैं। भारत में तो कई बड़े निर्माणों के पीछे भी हाथी और इंसान की दोस्ती का कारण माना जाता है। लेकिन हाल के सालों में देखा जाए तो अपने यहां इंसानों और हाथियों के बीच बार-बार मुठभेड़ें हो रही हैं। पिछले दो सालों में एक दर्जन से ज्यादा हाथी और चार दर्जन से ज्यादा इंसान इस मुठभेड़ का शिकार हो चुके हैं। हालांकि कई दूसरे वन्यजीव भी इन दिनों इंसानों से खफा हैं और जब तब मौका मिलने पर हमला भी बोल देते हैं लेकिन हाथियों जितना तो शायद कोई दूसरा जानवर गुस्से में नहीं है। पिछले दिनों ओडिशा के क्योंझर ज़िले में एक घर में हाथी घुस गया और वहां मौजूद 70 वर्षीय वृद्धा शारदा खिलारा को पटककर मार दिया। वन विभाग ने इस पर चिंता जतायी और ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए ठोस कदम और जागरूकता अभियान चलाये जाने की बात कही। लेकिन ये बातें हो ही रहीं थीं कि केरल में मल्लपुरम में 64 वर्षीय महिला तेलानी को भी अचानक एक गुस्साया हाथी ने ठोककर मार डाला। यहां भी वन कर्मियों ने इसके लिए गांवों वालों की गलती निकालने की कोशिश की तो, गांव वाले उन पर राशन पानी लेकर चढ़ पड़े और इस दुर्घटना का कारण वन अधिकारियों की लापरवाही माना।
लेकिन लगातार हाथियों के बढ़ते गुस्से और इंसानों के साथ उनकी होती मुठभेड़ों के बाद ही इन पर कमी लाने का कोई कारगर उपाय सफल होता नहीं दिखता। क्योंकि पिछले दिनों ही कर्नाटक के कोडागू में हाथियों ने कई एकड़ की केले और नारियल की फसलें तबाह कर दीं। असम, पश्चिम बंगाल, ओडिशा के कई इलाकों में पिछले कुछ महीनों में एक दर्जन से ज्यादा हाथियों और इंसानों के बीच गुस्से से भरी मुठभेड़ की घटनाएं हुईं। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी पिछले साल ऐसी कई घटनाओं में तीन से ज्यादा लोग मारे गये थे और पांच हाथी अलग-अलग तरीकों से असमय मौत का शिकार हुए। माना जाता है इसके पीछे इंसानों का गुस्सा था।
लब्बोलुआब यह कि पिछले कुछ सालों में इंसानों और हाथियों के बीच लगातार तनाव क्यों बढ़ रहा है। अगर वन्यजीव विशेषज्ञों, खास करके हाथियों की आवासीय परिस्थितियों को जानने वाले लोगों की मानें तो इसका सबसे बड़ा कारण हाथियों के आवास की बढ़ती समस्या है। मानव वन्यजीव संघर्ष यूं तो भारत में कई जीवों के साथ हुए हैं, लेकिन हाथियों के साथ यह समस्या सबसे ज्यादा है। हाथियों और इंसानों के बीच बढ़ते तनाव के प्रमुख कारण में जहां आवास की समस्या है, वहीं भोजन भी एक बड़ी समस्या है। हाथियों के लिए हिंदुस्तान में उनके आवासीय क्षेत्रों में भोजन की कमी लगातार बढ़ रही है। जबकि हाल के सालों में हाथियों की संख्या में भी बढ़ोत्तरी हुई है। लेकिन भारत में 2015 से 2020 के बीच 6,68,400 हेक्टेयर वन क्षेत्र कम हो गये हैं। ये कमी ज्यादातर उन क्षेत्रों में आयी है, जहां हाथियों की घनी बसाहट है। ..तो सिकुड़ते जंगलों के कारण अपने भोजन की तलाश में हाथी इन दिनों जंगलों से निकलकर इंसानी बस्तियों की ओर धावा बोल रहे हैं और खड़ी कृषि फसलों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। हालांकि सरकारी आंकड़ों की पुष्टि नहीं होती, मगर कई वैश्विक संगठनों का मानना है कि इन दिनों पूरे एशिया क्षेत्र में हाथियों के द्वारा हर साल 600 से ज्यादा लोग मारे जाते हैं और 450 से ज्यादा हाथी अपनी जान गंवाते हैं।
यहां एशिया का मतलब भारत, श्रीलंका और थाईलैंड विशेष रूप से हैं। सबसे ज्यादा हाथी भारत में है। इसके बाद श्रीलंका और थाईलैंड में हैं। सिकुड़ते जंगलों के कारण हाथी अपने कुदरती आवास से बाहर निकलकर खेतों, सड़कों, रेल लाइनों से होते हुए इंसानी बस्तियों तक घुस आते हैं और भोजन और पानी की तलाश करते हुए लोगों के घरों में घुस जाते हैं। हाथियों के अलावा तेंदुए, बंदर जैसे जंगली जानवर भी बड़ी संख्या में हाल के सालों में इंसानी बस्तियों में रह-रहकर धावा बोलते रहे हैं। यूपी, मध्य प्रदेश, बिहार, जैसे राज्यों में जहां पहले हाथियों से नुकसान की खबरें बहुत कम आया करती थीं, वहीं हाल के सालों में लगातार इंसान और हाथियों तथा बंदरों के बीच मुठभेड़ की घटनाएं हो रही हैं। भोजन की कमी के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन भी इस समस्या का एक बड़ा कारण है, जिसकी वजह से गर्मियां बेहद गर्म हो जाती हैं। पानी की समस्या, विकट समस्या बन जाती है। वहीं बारिश के दिनों में इन दिनों ऐसी भयंकर बारिश होती है कि इनके अपने पारंपरिक आवास जलभराव वाले क्षेत्र में आ जाते हैं, जिससे विशेषकर हाथियों को फिर से इंसानी बस्तियों की तरफ धावा बोलना पड़ता है।
सवाल है आखिर इस समस्या का समाधान क्या है? क्या बार-बार हाथियों और इंसानों के बीच होने वाली यह मुठभेड़ हमेशा यूं ही होती रहेगी? विशेषज्ञ कहते हैं, इसमें बड़ी समस्या प्लानिंग और अवसंरचना की है। देश में वन्यजीवों के लिए कई वाइल्डलाइफ सेंचुरी और अभ्यारण्य तो बना दिये गये हैं, लेकिन वाइल्डलाइफ कारीडोर को वैज्ञानिक ढंग से व्यवस्थित नहीं किया गया या शायद हाल के दशकों में इंसान के इस्तेमाल वाली बढ़ी जमीन और सड़कों के सघन जाल व उनके पहले से कहीं ज्यादा उपयोग के कारण इंसान ने वन्यजीवों के प्राकृतिक आवास में अपना हस्तक्षेप 60 और 70 के दशकों के मुकाबले कई गुना बढ़ा दिया है। इस तरह अगर कुछ उपाय किये जाएं तो विशेषज्ञों का मानना है कि इंसानों और वन्यजीवों के बीच टकराव कम होंगे।