फिल्मी दुनिया में 50 बरस पूरे करने वाले सुपर स्टार रजनीकांत

रजनीकांत की जितनी तारीफ की जाये उतनी कम है। तमिल फिल्मोद्योग में वह सफलतापूर्वक 50 बरस मुकम्मल कर चुके हैं और अब भी उनका वर्चस्व कायम है, जिसका जश्न मनाना चाहिए, विशेषकर इसलिए भी कि विभिन्न भाषाओं में वह 170 से अधिक फिल्में कर चुके हैं, स्क्रीन पर उनका जलवा व करिश्मा कभी कम नहीं हुआ है और उनकी राजनीति ने भी उनके प्रशंसकों के जीवन को प्रभावित किया है। 
वक्त कितनी तेज़ी से गुज़रता है। पचास साल कल की सी बात लगते हैं। हालांकि 1975 में आयी अपनी पहली फिल्म ‘अपूर्वा रागंगल’ में वह हीरो नहीं थे, लेकिन इससे उनकी इतिहास में यात्रा आरंभ हो गई थी। उन्होंने दूसरों की ज़रूरतों के अनुरूप खुद को ढाल लिया। उनका नाम बदल दिया गया, उन्होंने नई भाषा सीखी और नया व्यक्तित्व ओढ़ा, जिसकी कल्पना फिल्मकार के. बालाचंद्र ने की थी। रजनीकांत ने कल्ट फिगर बनने की यात्रा पांच दशक पहले आरंभ की थी, विद्रोह को वैधता प्रदान करके, प्रतिबंधित इच्छाओं पर बोलने की संभावना उत्पन्न करके, समाज में हाशिये पर पड़े लोगों के लिए बोलकर और अपनी छवि ‘लार्जर देन लाइफ’ बनाकर। उनकी नवीनतम फिल्म ‘कुली’ उनके इन्हीं वर्षों का स्मरण कराती है। बहुत कुछ बदल गया है, लेकिन अब भी बहुत कुछ वैसा ही है। जो चीज़ नहीं बदली है, वह यह है कि अब भी पहले की तरह रजनीकांत नया व्यक्तित्व ओढ़ने की कोशिश कर रहे हैं, वो बनने का प्रयास जो वह हैं नहीं।
कहा जाता है कि सुपरस्टार्स बूढ़े होने से सबसे अधिक डरते हैं। हालांकि हम उनकी दीर्घायु का जश्न मनाते हैं, लेकिन वे उसके मानवीय डर में ही रहते हैं। रजनीकांत की वास्तविक तस्वीर यह है कि उनके सिर पर बाल नहीं हैं और वह हमारे प्यारे अंकल से दिखायी देते हैं। ‘कुली’ में उनके सिर पर भरपूर बाल हैं और वह जवान व्यक्ति की तरह लड़ते हैं, यह अलग बात है कि उनकी आंखें उन्हें धोखा दे रही हैं। वही शक्तिशाली आंखें जिन पर 50 साल पहले बालाचंद्र ने टिप्पणी की थी, अब गहरी उदासी में छुपी हुई हैं, शायद इस दर्द को व्यक्त करते हुए कि सुपर स्टारडम के नाम पर अब भी ऐसी फिल्में करनी पड़ रही हैं। रजनीकांत कभी अपने शरीर से परिभाषित नहीं किये गये। वह सांवले व छोटे कद के हैं, बेंग्लुरु के बस कंडक्टर की तरह, जोकि वह एक्टर बनने से पहले थे। वह मराठी भी बोलते थे और तमिल को अलग अंदाज़ से बोलते थे। वह जो बोलते व जिस बात के लिए खड़े होते, वह ही उनकी ताकत व क्षमता का आधार है। वह साधारण लेकिन शक्तिशाली सत्य के प्रतीक हैं कि जो गरीब व हाशिये पर हैं उनमें नैतिकता अधिक है बजाये रईसों व पॉवर वालों के। 
फुटपाथ पर सब्जी बेचने वाले, दैनिक मजदूर, कुली व ऑटोरिक्शा चालक अधिक नैतिक गुण प्रदर्शित करते हैं बजाय ज़मींदारों, रईस व्यवसायियों या शक्तिशाली नेताओं के। रजनीकांत को इसलिए प्यार किया जाता है क्योंकि वह सामाजिक दृष्टि से स्वीकार्य व्यवहार और व्यक्तिगत तौर पर पिछड़े के बीच के ग्रे व्यक्ति का प्रतीक हैं। वह जब राजनीतिक तौर पर गलत थे, तब भी आकर्षक थे। उनके प्रशंसक उन्हें प्यार करते हैं क्योंकि वह जानते हैं कि रजनीकांत दिल से नैतिक हैं। कुली थीम जो उनकी नई फिल्म में बहुत बेतुके ढंग से प्रस्तुत किया गया, ने ही कामकाजी वर्ग में उनकी पैठ बनायी थी, जिसकी आवाज़ का प्रतिनिधित्व उन्होंने ‘मुल्लुम मलारुम’ (1978, एक ग्रामीण का शहरी इंजीनियर से टकराव), ‘बाशा’ (1995, ऑटो चालक), ‘मुथु’ (1995, ज़मींदार का नौकर) जैसी फिल्मों में किया था। हिट फिल्म ‘काला’ (2018) में वह मलिन बस्ती वालों के लिए लड़ते हैं। युवा रजनीकांत बुजुर्गों, समझदारों, ज़िम्मेदारों, अधिक सामाजिक और उम्मीद जगाने वाले व्यक्ति की तरह अभिनय करते थे।
अब पचास साल बाद रजनीकांत की नैतिकता भी बूढ़ी हो गई है। वह इसे छुपा नहीं पाते हैं, भले ही वह अपने बूढ़े होते शरीर को मेकअप से ढक लें। जब ‘थालापथी’ (1991) में उन्होंने गैंगस्टर की भूमिका निभायी थी, तो अपराधियों के संसार में भी नैतिकता का बोध था। लेकिन ‘कुली’ में रजनीकांत का नैतिकबोध लुप्त हो जाता है, जब वह एक युवा महिला के साथ मिलकर अपराध करते हैं और उसे उचित ठहराते हैं कि महिला को बहनों की मैडीकल शिक्षा की फीस अदा करनी है। यह वह रजनीकांत नहीं हैं, जिन्हें हमने ‘भैरावी’ (1978) या ‘अवल अप्पदिथान’ (1978) जैसी फिल्मों में देखा था, जिनकी वजह समाज में महिलाओं के अधिकारों व भूमिका पर गहन बहस छिड़ गई थी। रजनीकांत ने ‘अरुणाचलम’ (1997), ‘बाशा’ और ‘पदयप्पा’ (1999) जैसी फिल्मों के डायलॉग को सामाजिक नारों में बदल दिया था।
जब तक रजनीकांत पीड़ितों व हाशिये पर पड़े लोगों के लिए बोलते रहेंगे तब तक उनकी भौतिक आयु से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बुढ़ापा हमारे चलने या लड़ने के तरीके से ज़ाहिर नहीं होता है बल्कि हमारी सोच, दूसरों की मदद करने में हमारी ऊर्जा और जो उम्मीद हम उत्पन्न करते हैं उससे प्रकट होता है। रजनीकांत आज भी स्क्रीन पर विस्फोटक हैं, लेकिन कम से कम अपनी पिछली दो फिल्मों (पा व कुली) में वह मानसिक व नैतिक रूप से बूढ़े हो गये हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि वे उन गुणों को खो चुके हैं, जो उन्हें जवान व प्रासंगिक बनाये हुए थे। इसके लिए वह ज़िम्मेदार नहीं हैं। शायद वह हमारी तरह उदासीन हो गये हैं, थक गये हैं।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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