धराली से रामबन भूस्खलन से कांपता हिमालय

धराली से लेकर वैष्णो देवी, रियासी से लेकर रामबन और मंडी से लेकर शिमला तक, इस साल हर कहीं आसमान से प्रकृति का कोप बरस रहा है। 30 अगस्त को जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले के बदर गांव में लैंडस्लाइड होने से आधा दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत हो गई, रामबन के राजगढ़ में बादल फटने से 4 लोगों की मौत हो गई। 29 अगस्त की रात हिमाचल प्रदेश में मंडी के गोहर में भी बादल फटा था, नांडी पंचायत में नसेंणी नाला में कई गाड़ियां बह गई, शिमला के जतोग कैंट में लैंडस्लाइड हुई। 29 अगस्त को ही उत्तराखंड के चमोली, रुद्रप्रयाग, टिहरी और बागेश्वर में भी बादल फटने की घटनाएं हुई। पंजाब के अमृतसर, पठानकोट सहित 8 ज़िलों में बाढ़ के हालात बने हैं। 250 से ज्यादा गांवों में 5 से 15 फीट तक पानी भरा हुआ है। बाढ़ में अब तक कई लोगों की मौत हो चुकी है। उत्तर प्रदेश के 18 ज़िले बाढ़ की चपेट में है, राज्य में अब तक 750 से भी ज्यादा मकान बारिश-बाढ़ में ढ़ह चुके हैं, वाराणसी में सभी 84 घाटों का आपसी संपर्क टूट गया है। महाराष्ट्र के लातूर और नांदेड़ में कम से कम 50 सड़कें-पुल डूब गए हैं। 26 अगस्त को वैष्णो देवी यात्रा मार्ग पर लैंडस्लाइड में 34 लोगों की मौत होने के दर्दनाक हादसे के बाद से वैष्णो देवी यात्रा रुकी हुई है।
ये त्रासदियां कोई अचानक घटी अनहोनी नहीं हैं बल्कि ये ऐसी चेतावनियां हैं, जिन्हें वर्षों से बार-बार नजरअंदाज किया जाता रहा है। पहाड़ों में ‘विकास’ के नाम पर हो रहे अनियंत्रित प्रयोग और प्रशासन की उदासीनता ने इस आपदा को जन्म दिया है। धराली और थराली की घटना के बाद माता वैष्णो देवी यात्रा मार्ग पर इंद्रप्रस्थ भोजनालय के पास हुए भूस्खलन ने 34 श्रद्धालुओं की जिंदगी छीन ली। रोज़ाना हज़ारों की संख्या में श्रद्धालु इस मार्ग से गुजरते हैं लेकिन पहाड़ी ढ़लानों पर बढ़ते दबाव और अनियंत्रित निर्माण कार्य ने यहां भी सुरक्षा को खोखला कर दिया है। श्रद्धालुओं की मौत के बाद भी प्रशासनिक घोषणाओं और राहत पैकेजों से आगे कोई ठोस कदम दिखाई नहीं देता। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि उत्तराखंड और हिमाचल ही नहीं, पूरा हिमालयी भूगोल अब एक असहनीय दबाव से गुजर रहा है। हिमाचल प्रदेश की स्थिति तो इस वर्ष बेहद भयावह है। जून में मानसून की शुरुआत के बाद से मंडी, कांगड़ा, कुल्लू, चंबा, शिमला और सिरमौर ज़िलों में बादल फटने की घटनाओं ने सैंकड़ों लोगों की जिंदगी छीन ली है।
देश के विभिन्न इलाकों में प्रलयकारी वर्षा अब तक न जाने कितनी ही जिंदगियां लील चुकी है। ये दर्दनाक घटनाएं स्पष्ट तौर पर यह साबित कर रही हैं कि हिमालयी क्षेत्र अब प्राकृतिक आपदाओं का स्थायी केंद्र बन चुका है। मकान बह रहे हैं, पुल टूट रहे हैं, सड़कें ध्वस्त हो रही हैं और परिवार उजड़ रहे हैं। ब्यास, पार्वती और सतलुज जैसी नदियां विकराल रूप धारण कर चुकी हैं। कहीं पूरा गांव बह रहा है, कहीं पूरी सड़क नदी में समा रही है। पर्यटक लापता हो रहे हैं, सैंकड़ों घर ध्वस्त हो चुके हैं और स्थानीय लोग अपनी जड़ों से उखड़ने को मजबूर हैं। हर दूसरे दिन बादल फटने की नई खबर सुनने को मिल रही है। यह स्थिति किसी एक राज्य या एक घाटी की समस्या नहीं है बल्कि हिमालयी क्षेत्र की साझा पीड़ा है।
इस सिलसिलेवार त्रासदी की गूंज केवल पर्वतीय राज्यों तक ही सीमित नहीं रह गई है। पंजाब में बाढ़ ने 250 से अधिक गांवों को डुबो दिया है और कई लोगों की मौत हो चुकी है। खेतों में खड़ी फसलें नष्ट हो गई हैं, हजारों परिवार बेघर हो गए हैं और लोगों की आजीविका के साधन छिन गए हैं। ये घटनाएं संकेत देती हैं कि जलवायु परिवर्तन और अनियंत्रित विकास का असर अब मैदानों तक फैल चुका है। सवाल यह है कि क्या इन सबको केवल ‘प्राकृतिक आपदाएं’ कहकर टाल दिया जाए या फिर सच्चाई का सामना किया जाए? सच यह है कि इन त्रासदियों के पीछे हमारी ही गलतियां छिपी हैं। हिमालय की नाजुक भूगर्भीय संरचना पर अंधाधुंध सड़कें, सुरंगें, होटल और बांध बनाए गए। नदियों के किनारे बेतहाशा अतिक्रमण हुआ। वनों की अंधाधुंध कटाई और सामूहिक पर्यटन के दबाव ने पहाड़ों की सहनशीलता को तोड़ दिया है। वैज्ञानिक और पर्यावरणविद वर्षों से चेता रहे हैं कि यदि इस क्षेत्र में भारी निर्माण और प्राकृतिक संतुलन की अनदेखी जारी रही तो हिमालय आपदाओं का केंद्र बन जाएगा। दुर्भाग्य यह है कि इन चेतावनियों को लगातार दरकिनार किया गया और परिणाम अब हमारे सामने है।
धराली से लेकर वैष्णो देवी, रियासी से लेकर रामबन और मंडी से लेकर शिमला तक, हर घटना इस बात का प्रमाण है कि पहाड़ों को जीतने की कोशिश अब हमारे ही अस्तित्व पर भारी पड़ रही है। यह केवल स्थानीय लोगों की समस्या नहीं है बल्कि राष्ट्रीय स्तर की चुनौती है। हिमालय भारत की जल-जीवन प्रणाली की रीढ़ है और यदि यही टूट गया तो उत्तर भारत के बड़े हिस्से में विनाशकारी बाढ़, जल संकट और कृषि संकट का सिलसिला शुरू हो जाएगा। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार और असम जैसे प्रदेश भी सीधे प्रभावित होंगे। अब समय आ गया है कि राहत पैकेज और प्रशासनिक घोषणाओं से आगे बढ़कर ठोस नीति बनाई जाए। विकास के मॉडल को पूरी तरह से पुनर्परिभाषित करना होगा। भूगर्भीय अध्ययन, जल प्रवाह विश्लेषण, ग्लेशियर गतिशीलता मॉडल और पर्यावरणीय मंजूरी जैसे कठोर मूल्यांकन के बिना किसी भी परियोजना की शुरुआत नहीं होनी चाहिए। स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में शामिल करना होगा क्योंकि वही प्रकृति के बदलते स्वरूप के प्रत्यक्ष साक्षी हैं।
‘विकास’ और ‘विनाश’ के बीच एक बेहद पतली रेखा है और आज की सबसे बड़ी ज़रूरत यही है कि हम उस महीन रेखा को पहचानें। धराली का मलबा, वैष्णो देवी के आंसू, रियासी का ध्वंस, रामबन की मौतें और हिमाचल के उजड़े गांव हमें बार-बार यही संदेश दे रहे हैं कि प्रकृति को चुनौती देने की हमारी महत्वाकांक्षा अब सीधे अस्तित्व पर वार कर रही है। ये केवल भौगोलिक त्रासदियां नहीं बल्कि हमारी नीतियों, लालच और अविवेक की परिणति हैं। यदि इन चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया तो धराली, वैष्णो देवी, रियासी, रामबन और हिमाचल के गांव केवल भौगोलिक नाम नहीं रहेंगे बल्कि वे त्रासदी के पर्याय बन जाएंगे। प्रकृति कोई संसाधन मात्र नहीं है, जिसे निचोड़ा जा सके बल्कि वह चेतना है, सह-अस्तित्व की शपथ है और जब यह चेतना आहत होती है, क्रोधित होती है तो तमाम आधुनिक तकनीकें, सबसे बड़ी घोषणाएं और आपदा प्रबंधन योजनाएं भी बेअसर हो जाती हैं। राहत पैकेज कभी जीवन की कीमत नहीं चुका सकते और न ही ढ़ह चुके पहाड़ों का दर्द मिटा सकते हैं। इसलिए हमें हिमालय को प्रयोगशाला नहीं बल्कि संतुलित जीवन का आधार मानना होगा। यही एकमात्र रास्ता है, जिससे हम इन आपदाओं के सिलसिले को थाम सकते हैं अन्यथा आने वाली पीड़ियां इन जगहों को मानचित्र पर नहीं, इतिहास की त्रासदी के पन्नों में खोजेंगी।

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