तत्काल टिकट लेना भूल गई
चाटुकार लोगों की दुनिया में कोई कमी नहीं है। कुछ लोग दूसरों की हां-में-हां मिलने में ही अपने को धन्य समझते हैं। इससे और कुछ हो ना हो। उनके साथ अपना भी महिमंडन हो जाता है। ऐसे लोग प्रभाव का मुकुट अपने सिर पर पहनकर चलते हैं। उनके मुकुट को देखकर साथ के लोग भी अपने को मुकुट पहना समझ लेते हैं। इसको ऐसे समझना चाहिये कि अगर सामने वाले के सिर में तेल पड़ा है। तो लोग ये मानकर चलते हैं कि उनके माथे में भी तेल है। उनकी शान में कसीदे पढ़ना एक तरह से उनकी आदत पड़ चुकी होती है। कभी-कभी ऐसे लोग भी आलोचकों की रडार पर आ जाते हैं। और आलोचकों द्वारा लताड़ दिए जाते हैं। खैर, ये तो प्रभाव के मुकुट से प्रभावित लोगों की बात हो रही है। लेकिन यहां गुरु को पकड़ना बहुत ज़रूरी है। क्योंकि गुरु के प्रभाव में ही चेला आंय-बांय बकता है। इसीलिए गुरु पर वार करना बेहद ज़रूरी है।
उनकी जो गुरु थीं उनको फेंकने की आदत थी। एक दिन मिल गईं कहीं। बातचीत का सिलसिला चल निकला था। पूछा गुरुजी टिकट हो गई। गुरुजी बोलीं हम लोग तत्काल टिकट ही लेते हैं। मानों वे कह रहीं हों कि जब-जब वो जो टिकट लेतीं हैं। तब तब वो तत्काल ही टिकट लेतीं हैं। ये बात कांटे में फंसी मछली की तरह मेरे अंतस में चुभी। मैं तड़पकर रह गया। सालों इस समय का इंतजार किया। तब जाकर ये समय आया है। जब सोना खरीदने की मनाही हुई है। गोल्ड क्राइसिस में दुनिया फंसी है। तब सोने पर बात करने का ये मुफीद समय है।
ये सही समय था। उन पर चोट करने का। मैंनें फोन मिलाया। जानकारी चाही। कुशल क्षेम पूछा। पूछना था दरअसल सोने के बारे में। इसीलिए फोन किया। पूछा और सुनाओ गुरुजी क्या हाल चाल है। बोलीं ठीक है। उनको बताया कि सोना सवा लाख का दस ग्राम अभी चल रहा है। सोना के बारे में आपका क्या ख्याल है।
आप तो सब चीज तत्काल खरीदतीं हैं। रील्स पर कमेंट पातीं हैं चार। जिस तरह की साड़ी पहनतीं हैं। उसी तरह का कुछ पीला पहनिए। आप जैसे लोगों के लिए मेटल का सेट पहनना अच्छा नहीं लगता है। आप दो-डेढ-सौ ग्राम का सोने का एक बढ़िया हार बनवा लीजिए। पहले तो उन्होंने कहा आपके मुंह में घी शक्कर। फिर उन्हें अपनी स्थिति का ज्ञान हुआ। बोलीं अभी-अभी तो पचास लाख रूपये का घर बनाया है। सारा पैसा उसी में खर्च हो गया है। मैंने वीणा का तार को और जोर से खींचा। ताकि चोट जबरजस्त पड़े। उन्होंने बात का छोर मोड़़ दिया।
इस बार उन्होंने दलील दी। नहीं साड़ी की मैचिंग चीजों में रील्स बनाने में मेटल का हार बढ़िया रहता है। मैंने कहा मेटल आपके सुकुमार गर्दन की शोभा खराब किए दे रहा है। रील्स की ऐसी-तैसी कर दे रहा है। बोलीं नहीं मेरे पचास हजार व्यूज आते हैं। मैंने दुखती रग पर हाथ रखा। कहा कि गुरुजी व्यूज चाहे कितने हों। कमेंट पांच-दस ही आते हैं। मैंने सोना के बाबत दुबारा बात की। वे बोलीं मुझे सोने के गहने अच्छे नहीं लगते हैं। उनकी बाबत ये बताना बेहद ज़रूरी है कि वो हमेशा कपड़ों और आर्टिफिशयल गहनों से लंदी-फंदी रहती हैं। पहनने का जितना शौक उनको है। उससे ज्यादा दिखावे का शौक है। उनका सारा दिन दिखावे में बीतता है। और वो ये कह रहीं हैं कि उनको सोना पहनने का शौक ही नहीं है!
लो ये तो बहुत बड़ी बात हो गई कि अंगूर न मिले तो अंगूर खट्टे हैं। मैनें फिर छेड़ा। जो आदमी तत्काल टिकट खरीद सकता है। वो सोना जैसी मामूली चीज भी तत्काल खरीद सकता है। बोलीं नहीं हम लोग इतना बड़ा आदमी नहीं हैं। बस यही तो सुनना था आपके मुंह से। सालों से इस बात को सुनने के लिए मेरे कान तरस गए थे। उस समय उनके मुंह से ये बातें सुनकर कितनी तसल्ली हुई मैं बता नहीं सकता। जो बात-बात में फेंकता है। वो रिरिया रही थी। वो अचानक से मीडिल क्लास का आदमी हुई जाती थीं। बल्कि उससे भी नीचे गरीब आदमी! अब ऊंट पहाड़ के नीचे आया था।
फोन पर आवाज की लाचारी सुनी जा सकती थी। काश कि ये बात आमने-सामने हुई होती। तब उनका चेहरा देखने लायक होता। ऑडियो कॉल पर बात हो रही थी। लिहाजा उनका बेचारगी भरा चेहरा न देख सका। इस बात का अफसोस जीवन भर रहेगा।
-मेघदूत मार्केट फुसरो, बोकारो झारखंड
पिन 829144



