भरोसे का हिसाब
(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)
उनकी आवाज़ बदली गई। ‘रेड्डी साहब... मेरा क्लर्क सही कह रहा है। एक बार रत्ना मैडम को फोन कर लीजिए, उनसे कन्फर्म कर लेते हैं। बस एक कॉल की बात है।’
केबिन का दरवाजा खुला। रेड्डी साहब बाहर निकले। वही सूट, वही चेन, वही घड़ी, लेकिन चाल में अब पहले वाली बात नहीं थी। काउंटर के पास से गुजरते हुए उनकी नज़र एक पल के लिए अजय पर पड़ी। अब उनके पास न गुस्सा रह गया था, न ही घमंड। ऐसी अवस्था तब होती है जब कोई आदमी पहली बार एहसास करता है कि घर के भीतर भी कुछ रिश्ते अनुमति मांगते हैं कि पति होने का मतलब किसी की निजता का मालिक होना नहीं है।
वे बुदबुदाते हुए शाखा से बाहर चले गए।
दोपहर को भीड़ थोड़ी कम हुई। सहयोगी राजेश ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा, ‘यार, तूने आज मैनेजर साहब को भी रोक दिया। डर नहीं लगा?’
अजय ने हल्के मुस्कुराते हुए कहा, ‘डर किस बात का? मैंने कोई गलत नहीं किया।’
‘लेकिन रेड्डी साहब का रुतबा है इस इलाके में।’
‘रुतबा बाहर काम करता है, राजेश। यहां सिस्टम काम करता है। और सिस्टम अंधा होता है न सूट देखता है, न घड़ी, न पहुँच।’
राजेश चुप हो गया।
अगले दिन अजय फिर उसी काउंटर पर था। उसी संयम के साथ। तीन बजे के करीब एक बुजुर्ग दंपत्ति आए। अजय ने बताया कि उनकी एफडी तीन महीने बाद मैच्योर होगी, अभी तोड़ने पर नुकसान होगा। दादाजी की आंखों में नमी आ गई।
‘बेटा, दवाइयों के लिए चाहिए था, पर नुकसान होगा तो रुक जाते हैं।’
अजय ने तुरंत हिसाब लगाया। ‘दादाजी, पूरी एफडी मत तोड़िए। जितने की ज़रूरत है, उतने का लोन ले लीजिए इसी एफडी पर। बचत भी सुरक्षित रहेगी और काम भी हो जाएगा।’
उन बुजुर्गों के चेहरे पर आई राहत किसी बड़े ट्रांजैक्शन से बड़ी थी। जाते-जाते दादी ने अजय को आशीर्वाद भी दिया, ‘जीते रहो बेटा।’
पांच बजने में दस मिनट रह गया था। तभी अजय के पास एक और आखिरी ग्राहक आया। दस लाख का आरटीजीएस करना था, लेकिन आईएफएससीकोड उनके पास नहीं था।
‘यह बैंक का काम है, मेरा नहीं!’ वे चिल्लाए।
अजय ने ठंडे दिमाग से कहा, ‘सर, गलत शाखा में पैसा चला गया तो वापस लाने में महीनों लग जाएंगे। मैं नहीं चाहता कि आपकी मेहनत की कमाई कहीं फंस जाए। बस दो मिनट रुककर कन्फर्म कर लीजिए।’
जब पैसा ट्रांसफर हो गया, तो उनके चेहरे का तनाव कम हुआ। उन्होंने अजय की ओर देखा, शायद कुछ कहना चाहा, पर कह नहीं पाए। अजय समझ गया था क्योंकि अक्सर लोग अपनी गलतियों का बोझ बैंक बाबू के कंधों पर डालना चाहते हैं।
बैंक में हर दिन सिर्फ रुपयों का हिसाब नहीं होता। वहां कभी रिश्तों का, कभी भरोसे का, तो कभी जिम्मेदारी का भी हिसाब होता है। कई बार नियम और पहचान एक-दूसरे के सामने खड़े हो जाते हैं, खासकर तब जब ऊपर से दबाव आ रहा हो। लेकिन उसी क्षण असली कर्मचारी वही होता है जो अपने कर्तव्य से नहीं डिगता, और अपने काम की असली मर्यादा को नहीं भूलता।
उस दिन रेड्डी साहब बैलेंस पूछने आए थे, मगर लौटते समय शायद उन्हें यह भी समझ आ गया कि घर की चारदीवारी के भीतर भी हर चीज अपने-आप नहीं चलती। अनुमति का अपना महत्व होता है। रत्ना मैडम उस पूरे प्रसंग में कहीं थीं भी और नहीं भी क्योंकि किसी ने उनसे कुछ पूछा ही नहीं था, फिर भी उनका खाता सुरक्षित रखा गया। उनकी जानकारी, उनकी निजता, उनकी सहमति सबका सम्मान किया गया। यह बात छोटी लग सकती है, लेकिन कई लोगों के लिए यही सबसे बड़ी बात होती है।
बैंक की असली नींव नोटों के बंडलों में नहीं, भरोसे में होती है। उस भरोसे में जो एक अनजान महिला के मन में यह विश्वास जगाता है कि उसका धन भी सुरक्षित है और उसकी पहचान भी। जो यह कहता है कि यहां नाम नहीं, नियम चलता है। और जब तक काउंटर पर अजय जैसे लोग बैठे हैं, यह भरोसा नहीं टूटेगा।
शाम को शाखा बंद होने के बाद वह बाहर निकला। सड़क पर हल्की नारंगी धूप फैली हुई थी, जैसे दिन धीरे-धीरे अपनी आखिरी सांसें ले रहा हो। हवा में एक अजीब-सी शांति थी। अजय ने एक बार पीछे मुड़कर बैंक की ओर देखा। बाहर से वह सिर्फ एक इमारत लग रही थी, लेकिन उसके भीतर आज भी वही सबसे कीमती चीज बची हुई थी, वह थी लोगों का विश्वास। (समाप्त)
(सुमन सागर)



