बड़े पर्दे से अलग भी खूब हंसाते थे मुकरी
बॉलीवुड के चर्चित ‘टिंगू’ यानी मुकरी संभवत: एकमात्र ऐसे कलाकार रहे जिनके करियर में भारत के दो सबसे बड़े एक्टर्स की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही। दिलीप कुमार उन्हें फिल्मी दुनिया में लेकर आये और अमिताभ बच्चन के साथ 70 व 80 के दशक में उनकी जोड़ी हमेशा के लिए यादगार बन गई। क्या कोई ऐसा सिनमा प्रेमी है जिसे फिल्म ‘शराबी’ का वह सीन याद नहीं जिसमें अमिताभ बच्चन अपने दफ्तर में आते हैं बड़ी-बड़ी मूंछों वाले नत्थूलाल उर्फ़ मुकरी को अपने पास खड़ा करके कहते हैं, ‘मूंछे हों तो नत्थूलाल जैसी हों...वर्ना न हों।’ मुकरी का छोटा कद और अमिताभ बच्चन का लम्बा कद ... और बन गई लम्बू-छोटू की जोड़ी, जो इतनी ज़बरदस्त हिट हुई कि एक के बाद एक फिल्मों का सिलसिला जुड़ गया- ‘लावारिस’, ‘नसीब’, ‘महान’, ‘अमर अकबर एंथोनी’ ...बहुत लम्बी सूची है। नतीजतन मुकरी भारतीय फिल्मों के यादगार हास्य कलाकार बन गए और नत्थूलाल, टिंगू आदि नामों से आजतक याद किये जा रहे हैं। एक तरह से यह जोड़ी शेख मुख्तार व मुकरी की पुरानी लम्बू-छोटू का नया संस्करण थी, जो ‘उस्ताद पेड्रो’ जैसी हिट फिल्मों से उधार ली गई थी।
जहां तक मुकरी के फिल्मों में प्रवेश करने की बात है तो 1945 के समय में जाना होगा। दिलीप कुमार रमज़ान के पवित्र माह में मुंबई की एक स्थानीय मस्जिद में प्रार्थना करने के लिए गए थे कि वहां के काज़ी (धर्मगुरु) को दिलकश आवाज़ में कुरान की आयात पढ़ते सुना तो बहुत प्रभावित हुए। काज़ी से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो वह उनके स्कूल के सहपाठी मुकरी निकले। इस मुलाकात के दौरान मुकरी ने अपनी आर्थिक तंगी का उल्लेख करते हुए जब यह कहा कि घर का खर्च चलाना तक मुश्किल हो रहा है, तो दिलीप कुमार की आंखें भर आयीं और उन्होंने मदद का आश्वासन दिया। दिलीप कुमार ने मुकरी की सिफारिश बॉम्बे टॉकीज की मालकिन देविका रानी से की, जिन्होंने मुकरी को अपनी पहली फिल्म ‘प्रतिमा’ का निर्देशन कर रहे पी जयराज का सहायक निर्देशक नियुक्त कर दिया। बाद में निर्माता निर्देशक महबूब से कहकर दिलीप कुमार ने मुकरी को अपने साथ फिल्म ‘आन’ में अदाकारी का भी अवसर प्रदान कराया और इस तरह दोनों की जोड़ी व दोस्ती की गाड़ी चल निकली। मुकरी मस्जिद की सादगी से निकलकर फिल्मी दुनिया की चकाचौंध के सदस्य हो गए। बाद में एक साक्षात्कार के दौरान मुकरी ने कहा भी, ‘मैं तो एक मस्जिद में दुआएं करा रहा था, दो वक्त की रोटी जुटा पाना भी मुश्किल था। मैं छोटे बच्चों को कुरान पढ़ाया करता था। मेरा परिवार बड़ा था और आमदनी बहुत जरा सी। ऐसे में युसूफ भाई (दिलीप कुमार) फ़रिश्ता बनकर आए और मैं मस्जिद से निकलकर बॉलीवुड में आ गया।’
इसमें कोई दो राय नहीं हैं कि मुकरी को फिल्मों का पसंदीदा हास्य कलाकार बनाने में दिलीप कुमार व अमिताभ बच्चन की ज़बरदस्त भूमिकाएं हैं, लेकिन इस बात से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि तराशने पर हीरा ही चमकता है, पत्थर नहीं। मुकरी स्वयं भी प्रतिभाशाली थे और यही कारण है कि लगभग 6 दशक व 600 से अधिक फिल्मों का सफर तय कर सके। दिलचस्प बात यह है कि मुकरी फिल्मी पर्दे पर तो अपने हास्य से दर्शकों को गुदगुदाते ही थे, वह असल जीवन में भी हंसमुख व हाजिरज़वाब थे। एक साक्षात्कार में जब उनसे उनकी शादी के बारे में मालूम किया गया तो उनका जवाब था, ‘शादी तो मैं एलज़ाबेथ टेलर (हॉलीवुड की मशहूर अभिनेत्री) से करना चाहता था, लेकिन क्या करूं कद छोटा रह गया।’ इसी तरह फिल्म ‘आन’ की शूटिंग के दौरान महबूब साहब को गधे की ज़रूरत थी, काफी कोशिश के बावजूद भी गधा मिल नहीं पा रहा था। महबूब साहब भड़क गए और बोले, ‘संसार जानवरों से भरा पड़ा है और मुझे एक गधा नहीं मिल रहा है।’ तुरंत ही मुकरी का जवाब आया, ‘है न, मुकरी है।’ मुकरी बहुत अच्छे इंसान थे, कभी पीठ पीछे किसी की बुराई नहीं करना और हमेशा लोगों को हंसाते रहना। उनका अंग्रेजी में हाथ तंग था, लेकिन गलत व्याकरण के साथ, कभी अनजाने में तो कभी जानबूझकर, ताकि लोग हंसें, वह अंग्रेजी बोलते थे। उनके इस अंदाज़ को भी अनेक फिल्मों व सीरियलों में कॉपी किया गया है, विशेषकर ‘भाभी जी घर पर हैं’ में अंगूरी भाभी का किरदार।
मुहम्मद उमर के रूप में मुकरी का जन्म 5 जनवरी 1922 को महाराष्ट्र में ज़िला रायगढ़ के अलीबाग में हुआ था। अपनी दांत रहित मुस्कान, छोटे कद व परफेक्ट हास्य टाइमिंग के ज़रिए उन्होंने लगभग 6 दशक तक दर्शकों को हंसाया और इस दौरान वह 600 से अधिक फिल्मों में दिखाई दिए। 1945 में फिल्म ‘प्रतिमा’ से दिलीप कुमार के साथ अपना अभिनय करियर शुरू करने वाले मुकरी की फिल्मों में हालांकि भूमिकाएं छोटी होती थीं, लेकिन अपनी शानदार प्रतिभा के कारण वह उनसे भी अपना प्रभाव छोड़ जाते थे और यही वजह है कि जब ‘मदर इंडिया’ (1957), ‘कोहिनूर’ (1960), ‘बॉम्बे टू गोवा’ (1972), ‘गोपी’ (1972), ‘अमर अकबर एंथोनी’ (1977), ‘लावारिस’ (1981), ‘शराबी’ (1984) आदि महान फिल्मों का ज़िक्त्र होता है तो मुकरी की भूमिका व अदाकारी को नज़रंदाज़ करना कठिन हो जाता है।
मुकरी की आखिरी फिल्म विवेक वासवानी की ‘सिर आंखों पर’ थी। वह गाल ब्लैडर के संक्रमण से पीड़ित थे, जिसके उपचार के लिए उन्हें 8 अगस्त 2000 को मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया था और अस्पताल में ही चार सितम्बर को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया। वह 78 वर्ष के थे।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर





