चालाक व ढाेंगी जलीय बिच्छू
जलीय बिच्छू एक विचित्र जीव है। यह विश्व के अधिकांश भागों में पाया जाता है। अंग्रेजी में इसे वाटर स्क्रापियन कहते हैं। जलीय बिच्छू वास्तव में पानी का कीट है। इसके आगे के पैरों का एक जोड़ा जमीन पर पाए जाने वाले बिच्छू से काफी मिलता-जुलता है, अत: इसे जलीय बिच्छू कहते हैं। जलीय बिच्छू ताजे पानी में पाया जाता है। यह तालाबों और झीलों के किनारे सड़ती हुई पत्तियों के नीचे रहना अधिक पसंद करता है। जलीय बिच्छू की 150 से अधिक प्रजातियां हैं, जिनकी शारीरिक संरचना, आदतों एवं व्यवहार आदि में पर्याप्त विविधता होती है।
जलीय बिच्छू की शारीरिक संरचना बड़ी विचित्र होती है। इसका शरीर तिलचट्टे के समान चपटा और अंडाकार होता है तथा इसकी लंबाई 2.5 सेंटीमीटर से लेकर 4 सेंटीमीटर तक होती है, किन्तु कभी-कभी 5 सेंटीमीटर लंबे जलीय बिच्छू भी देखने को मिल जाते हैं। जलीय बिच्छू के शरीर का रंग हल्के कत्थई से लेकर गहरे कत्थई तक होता है एवं इसके ऊपर की ओर हल्के रंग के छोटे-छोटे धब्बे से होते हैं। जलीय बिच्छू का शरीर मुरझाई हुई छोटी सी पत्ती की तरह लगता है। इसकी शारीरिक संरचना और शरीर के रंग आदि इस प्रकार के होते हैं कि यह अपने आसपास के परिवेश से पूरी तरह घुल-मिल जाता है एवं दूर से दिखाई नहीं देता है। जलीय बिच्छू के शरीर के मुख्य रूप से तीन भाग होते हैं-सिर, मध्यभाग और पूंछ। इसके शरीर में सबसे आगे की ओर इसका सिर होता है। इसी भाग में इसकी आंखें, मुंह तथा कुछ अंग होते हैं।
जलीय बिच्छू के शरीर के मध्य भाग में ही दोनों किनारों पर सांस लेने वाले 10 जोड़े अंग होते हैं जो देखने में छोटे-छोटे छिद्र जैसे मालूम पड़ते हैं। इन सभी छिद्रों की अलग-अलग विशेषताएं होती हैं एवं अलग-अलग कार्य होते हैं। इसके श्वसन छिद्रों के पहले तीन जोड़े छिद्र हमेशा बंद रहते हैं। इनके कार्यों के संबंध में अभी तक कोई प्रभाणिक जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी हैं। इसके श्वसन छिद्रों के चौथे, पांचवें और नौवें जोड़े कभी उपयोग में नहीं लाए जाते अत: ये निष्क्रिय से होते जा रहे हैं। जलीय बिच्छू अपने श्वसन छिद्रों के छठे, सातवें और आठवें जोड़ों का उपयोग अपना शारीरिक संतुलन बनाए रखने के लिए करता है। इन्हीं की सहायता से यह पानी में अपनी स्थिति मालूम करता है कि यह पानी के भीतर ऊपर की ओर जा रहा है या नीचे की ओर, दाहिने जा रहा या बाईं ओर। इन सबकी जानकारी इसे अपने श्वसन छिद्रों के छठे, सातवें और आठवें जोड़ों से ही प्राप्त होती है। इसके साथ ही ये श्वसन छिद्र इसे पानी के दबाव की भी जानकारी देते हैं। जलीय बिच्छू के श्वसन छिद्रों का दसवां जोड़ा सांस लेने के काम आता है।
जलीय बिच्छू एक मांसाहारी जीव है। यह एक अच्छा शिकारी है एवं बड़े रोचक ढंग से शिकार करता है। इसका प्रमुख भोजन ताजे पानी में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के छोटे-छोटे जीव हैं। इनके साथ ही यह छोटी-छोटी मछलियों का भी शिकार करता है। जलीय बिच्छू निशाचर है। यह दिन के समय झीलों और तालाबों के किनारे की सड़ी-गली पत्तियों के ढेर के मध्य शांत पड़ा रहता है और रात को शिकार की खोज में निकलता है, किंतु कभी-कभी इसे दिन के समय भी शिकार करते हुए देखा गया है। जलीय बिच्छू दो प्रकार से शिकार करता है। जलीय बिच्छू के शरीर में बहुत अधिक कॉमाफ्लास होता है अर्थात् इसकी शारीरिक संरचना इस प्रकार की होती है कि यह आसपास के परिवेश से पूरी तरह घुल मिल जाता है। इस प्रकार सड़ी-गली पत्तियों के मध्य पड़े हुए जलीय बिच्छू को पानी के दूसरे जीव देख नहीं पाते और इसके निकट आ जाते हैं। जलीय बिच्छू ऐसे ही अवसर की तलाश में रहता है। यह अपने निकट आने वाले असावधान जीवों पर अचानक आक्त्रमण करता है और उन्हें अपने पैरों के दूसरे और तीसरे जोड़े से जकड़ लेता है। इस आक्रमण से इसका शिकार कुछ क्षण के लिए अपने होश खो बैठता है, किंतु उसके संभलने के पहले ही यह अपने आगे के पैरों के चिमटों से उसे पकड़ लेता है और मार डालता है। यह जब अपने आसपास शिकार नहीं मिलता है तो यह सड़ी-गली पत्तियों के मध्य से निकलकर शिकार की तलाश करता है। यह शिकार मिल जाने पर तुरंत उस पर आक्रमण नहीं करता बल्कि कुछ दूरी तक उसका पीछा करता है फिर अचानक झपट कर उसे अपने आगे के चिमटों से दबोच लेता है। जलीय बिच्छू एक साहसी और कुशल शिकारी है। यह अपने से बड़े आकार तक के जीवों पर बड़ी निडरता से आक्रमण करता है और उन्हें अपना आहार बनाता है। जलीय बिच्छू का समागम और प्रजनन अन्य कीटों के समान होता है। इनमें नर और मादा अलग-अलग होते हैं तथा समागम काल में दोनों की शारीरिक संरचना में ऐसे परिवर्तन होते हैं, जिनकी सहायता से इन्हें सरलता से पहचाना जा सकता है। समागम काल में नर जलीय बिच्छू मादा की खोज करता है और समागम की इच्छुक मादा के मिल जाने पर उसके निकट आ जाता है। अब कुछ समय तक दोनों साथ रहते हैं एवं तरह-तरह की प्रणय लीलाएं करते हैं। इसके बाद दोनों का समागम होता है। मादा जलीय बिच्छू समागम के बाद झील अथवा नदी के किनारे सड़ी-गली पत्तियों के मध्य किसी नम स्थान पर अंडे देती है। इसके अंडे परिपक्व होने पर फूटते हैं और इनसे छोटे-छोटे लारवे निकलते हैं। जलीय बिच्छू के लारवे पानी में ही रहते हैं। ये बहुत छोटे-छोटे जीव खाते हैं और अपना विकास करते हैं तथा कुछ समय बाद वयस्कों की तरह जीवन आरंभ कर देते हैं।
जलीय बिच्छू बड़ा चालाक और ढोंगी होता है। यह शत्रु के निकट होने पर अथवा किसी भी प्रकार के खतरे का आभास पाते ही यह मृत जीवों के समान निश्चल हो जाता है, जिससे इसका शत्रु यह कार्य अपने शरीर के मध्य भाग में पाए जाने वाले श्वसन छिद्रों जैसे अंगों की सहायता से करता है। इसके श्वसन छिद्र बड़े संवेदनशील होते हैं अत: इनसे इसे खतरा निकट होने की जानकारी बहुत जल्दी हो जाती है। जलीय बिच्छू पानी के जिस पौधे पर बैठे हो, उस पौधे को यदि कसकर मरोड़ा जाए तो ये मृतप्राय से हो जाते हैं और इस प्रकार नीचे गिरते हैं, मानो बहुत पुरानी पत्तियां हों। इन्हें यदि हाथ में भी लिया जाए तो मृत जीवों की तरह निष्क्त्रिम हो जाते हैं और बिल्कुल हिलते-डुलते नहीं हैं।
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