महाविषधारी होते हैं
आप सांप से अवश्य परिचित होंगे। दुनियां में ऐसा कौन है जो सांप से परिचित नहीं है। सांप के बारे में डर मनुष्य जानता है कि उसके काट लेने से आदमी की मौत हो जाती है। मगर आपको जानकर आश्चर्य होगा कि पूरी दुनियां में सांपों की लगभग नौ हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। अकेले भारत में सांपों की तीन सौ प्रजातियां हैं। सांपों की खासियत यह होती है कि वह बूढ़ा होने तक भी उसकी लंबाई बढ़ती रहती है यानी उसके शरीर की वृद्धि होती रहती है।
सांप बालू या रेत पर नहीं चल सकता, दीवार पर नहीं चढ़ सकता। दीवार यदि खुरदरी हो तो उस पर आसानी से चढ़ जाता है। सांपाें के शरीर में हड्डियां नहीं होती बल्कि इनकी पसली लचीली और मछलियों की तरह कांटे होते हैं। अपने कांटे और इन्हीं पसलियों की सहायता से सांप सरक सरक कर चलता है।
सांपों को अधिक शीत या जाड़ा बर्दाश्त नहीं होता। सर्दियों के दिनों में अपना वैर भाव भुलाकर किसी बिल में ठिठुर कर दुबके पड़े रहते हैं। जब तक सर्दियों की ऋतु रहती है तब तक बिल से बाहर नहीं निकलते। इस अवधि तक उसे भूखे प्यासे रहना पड़ता है। गर्मी की ऋतु आने तक उसकी खाल कुछ मोटी हो जाती है यानी मैल जम जाता है जिसे केंचुली कहते हैं। गर्मी की ऋतु आने पर सांप बिल से निकल कर किसी खुरदरी वस्तु, खरपतवार या खुरदरे वृक्ष से अपना मुंह रगड़ता है। इससे केंचुली खुरदरी वस्तु में फंस जाती है। फिर सांप आगे की ओर धीरे-धीरे सरकता जाता है और उसकी केंचुली उसके उल्टी दिशा में उतरती जाती है। केंचुली उतारने के तीन दिन पहले और तीन दिन बाद तक सांप अंधे रहते हैं। हरकत करने पर भागता नहीं है।
सांपों के बारे में किंवदंती प्रचलित है कि यदि सांप धोखे से छछूंदर को चूहा समझ कर पकड़ लेने पर जब उसे पता चलता है कि वह तो चूहा नहीं, छछूंदर है तो छछूंदर को छोड़ देने पर सांप अंधे हो जाते हैं, यदि निगल जाता है तो मर जाते हैं। इसलिए शायद कहा गया है ‘भई गति सांप छछुंदर केरी।’ सांप का प्रजननकाल मार्च से अप्रैल तक होता है। रस्सी की तरह आपस में लिपट कर प्रजनन करता है।
अप्रैल के अंतिम सप्ताह तक मादा सांप आठ से दस तक सफेद अंडे देती है। इसके अंडे मटर के दाने के समान गोल होते हैं। कुछ दिन बाद अंडों से बच्चे निकल आते हैं। बच्चे निकल कर उलझी हुई रस्सियों की भांति आपस में उलझ जाते हैं। ये सारे बच्चे एक ही स्थान पर पड़े रहते हैं। मादा सांप इनकी देखभाल करती है। बच्चों के कुछ बड़े होने पर सांपिन अपने कुछ बच्चों को स्वयं खा जाती है। खाने की प्रक्रिया शुरू होने पर बच्चे वहां से भाग निकलते हैं। सांप हालांकि एक ही स्थान पर स्थाई रूप से बसने वाला प्राणी नहीं है।
सांप हमेशा इतने साफ रहते हैं कि जैसे उनकी त्वचा पालिश की गई हो। उनकी त्वचा पर किसी तरह के रोएं या पंख नहीं होते कि उसमें धूल या मैल जमा हो सके। मनुष्यों की तरह सांपों की त्वचा पर छिद्र नहीं होते और न ही पसीने की ग्रंथियां, इसलिए उनकी त्वचा से किसी तरह का शारीरिक द्रव भी नहीं निकलता है। (उर्वशी)




