पवित्र स्थलों पर चढ़ावा और व्यवस्था

अयोध्या राम मंदिर की चढ़ावा चोरी ने आम-जन की आस्था पर तो चोट पहुंचाई है कुछ दीर्घ सवाल भी खड़े किए हैं। भगवान के नाम पर श्रद्धा रखने वाले लाखों लोग इन पवित्र धार्मिक स्थलों पर मन की शांति के लिए जाते हैं तो अपनी-अपनी हैसियत और श्रद्धा अनुसार दान पात्रों में कुछ राशि भी डाल कर आते हैं। हमें बचपन से ही सिखाया गया है कि अपनी धर्म मान्यताओं के अनुसार ईश्वर के समक्ष मंदिर, गुरुद्वारा, मस्जिद या चर्च में जाकर नतमस्तक होना। सभी का भला चाहने की कामना करना। दु:ख निवारण की इच्छा रखना और सतकर्म करने की प्रेरणा देते रहने की प्रार्थना करना।
लाखों लोग साल में एक बार ज़रूर दूर कहीं तीर्थ भ्रमण करने के लिए जाते हैं। इस तरह धार्मिक तीर्थ स्थल अब अर्थ-व्यवस्था में ऊंचा स्तर रखते हैं। भारत आज 148 करोड़ जनसंख्या का देश है। आने-जाने के साधन भी पहले जैसे दुर्गम नहीं रहे। लाखों करोड़ों लोग अपनी-अपनी आस्था के केन्द्र तक जाने में ज्यादा हिचक महसूस नहीं करते। तदनुसार चढ़ावे के रूप में धन काफी प्रचुर मात्रा में दान पेटियों को सम्पन्न कर रहा है, जिससे सम्पत्तियों में भरपूर इज़ाफा हुआ है। दर्शनार्थियों की संख्या में भारी इज़ाफा होने से धार्मिक पर्यटन के नाम पर बड़ी तिजारत शुरू हो गई। व्यापारी वर्ग मुनाफा कमाने के लिए कुछ भी करने को तैयार रहता है। धार्मिक यात्राएं करवाने वाले कितने ही व्यापारी तिजारत करने निकल पड़े। जिसका लाभ धार्मिक संस्थाओं को भी पहुंचा है-आप हैरान होंगे कि दुनिया भर (भारत नहीं पूरी दुनिया) का तीसरा सबसे अमीर संस्थान तिरुपति बाला जी है। इसका धन भंडार सौ देशों की जी.डी.पी. से भी बड़ा बताया जाता है। इसकी आमदनी का ऑडिट और राज्य विधानमंडल में बजट पेश किया जाता है। उच्चतम न्यायालय की समिति इसकी रिपोर्ट करती है। इसकी एक तिजौरी बंद रहती है और उसका कभी भी सार्वजनिक रूप से ऑडिट नहीं हुआ। हरिद्वार में चढ़ावे को लेकर कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए गए हैं। वहां भवाना देवी मंदिर में दान-चढ़ावे को पारदर्शी बनाने के लिए जुलाई, 2026 में बड़ा फैसला लिया गया। मंदिर के गर्भ गृह और आरती में बैठने वाले सभी पुजारियों के लिए बिना जेब वाला विशेष कुर्ता और धोती अनिवार्य कर दिया गया है। सात सदस्यों की निगरानी कमेटी का गठन किया गया है। गड़बड़ी पाए जाने पर एफ.आई.आर. की कानूनी कार्रवाई का प्रावधान रखा गया है। दान देने वालों को कहा जा रहा है कि रसीद ज़रूर लें।
जगन्नाथ मंदिर अद्भुत आस्था का केन्द्र माना गया है। इसके नाम पर 24 ज़िलों में साठ हज़ार एकड़ ज़मीन है। जिसका कितना किराया है, या कितनी आमदनी है, बहुत कम लोगों को पता होगा। दिल्ली के हनुमान मंदिर में मंगलवार को इतनी लम्बी लाइन होती है कि भक्तजन को अपना मोबाइल या जेब सम्भालनी मुश्किल होती है। दान की रसीद मिलती तो है परन्तु उसकी कोई कार्बन कॉपी नहीं रखी जाती। 
कुछ तीर्थ स्थलों की यात्रा काफी दुर्गम है। फिर भी श्रद्धा रखने वाले अनेक मुश्किलें उठाकर अपनी यात्रा पूरी करते हैं। महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब अनेकानेक धार्मिक स्थलों के पास चढ़ावे के रूप में आए धन की कोई कमी ही नहीं तो वह धन दूर-दराज़ के क्षेत्रों से आने वाले, भारी मुश्किलें उठाने वाले श्रद्धा रखने वालों की सुविधा के लिए क्यों नहीं खर्च किया जाता? धर्म का काम है जन-जन को राहत देना। 

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