केवल सज़ा बढ़ाने से नहीं रुकेगी पेपर लीक की महामारी
देश में प्रतियोगी परीक्षाएं आज केवल प्रतिभा की ही नहीं बल्कि व्यवस्था की विश्वसनीयता की भी परीक्षा बन गई हैं। पिछले कुछ वर्षों में नीट सहित विभिन्न भर्ती परीक्षाओं और राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं में बार-बार सामने आये पेपर लीक के मामलों ने करोड़ों युवाओं के मन में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि उनकी मेहनत क्या वास्तव में सुरक्षित है? सरकार ने इस चुनौती से निपटने के लिए कानून को और कठोर बनाने का जो रास्ता चुना है, विपक्ष का मानना है कि उस रास्ते से यह महामारी नहीं रुकेगी। क्योंकि इसमें केवल सख्त सजा और भारी जुर्माने की व्यवस्था है, जो माफिया की कमर तोड़ पाएंगे, इस पर शक है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि अतीत के अनुभव बताते हैं कि केवल दंड की कठोरता अपराध रोकने की गारंटी नहीं होती। यदि प्रश्न-पत्र तैयार करने से लेकर उसकी छपाई, परिवहन, डिजिटल सुरक्षा, परीक्षा केंद्रों की निगरानी और परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही तक पूरी व्यवस्था में खामियां बनी रहें, तो अपराधी हर नये कानून का तोड़ निकाल लेते हैं। यही कारण है कि विपक्ष का आरोप है कि सरकार समस्या की जड़ पर प्रहार करने के बजाय केवल उसका दंडात्मक उपचार करने की सोच रही है।
दरअसल असली चुनौती नकल माफिया से भी बड़ी है। वह है परीक्षा प्रणाली में छात्रों, परीक्षार्थियों और उनके परिवारजनों का डगमगाता विश्वास। यदि कानून के साथ संस्थागत जवाबदेही, तकनीकी सुरक्षा और पारदर्शिता को तमाम महत्व नहीं मिलेगा, तो चाहे सजा कितनी ही कठोर हो, पेपर लीक की महामारी पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा। वास्तव में सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधन निवारण) संशोधन विधेयक-2026, इसके पहले 2024 में निर्मित मूल कानून को पूरी तरह से नहीं बदलता। यह नया संशोधन विधेयक सिर्फ पुराने कानून को और अधिक कठोर तथा समयबद्ध बनाने की कोशिशभर करता है। मसलन 2024 में निर्मित कानून में व्यक्तिगत अपराधी की सजा तीन से पांच वर्ष की जेल और 10 लाख रुपये जुर्माना थी। जबकि मौजूदा संशोधन विधेयन ने सजा को पांच से दस वर्ष तक कर दिया गया है और जुर्माने की राशि 50 लाख रुपये तक बढ़ा दी है। जबकि सर्विस प्रोवाइडर यानी किसी कम्पनी या एंजेंसी पर यदि यही आरोप लगता है, तो पहले उसके लिए जुर्माने की अधिकतम राशि 1 करोड़ रुपये थी, जिसे अब बढ़ाकर 5 करोड़ रुपये तक कर दिया गया है।
जबकि कम्पनी के जिम्मेदार अधिकारियों की सजा जहां पहले के कानून में तीन से दस सालों तक की थी और जुर्माना 1 करोड़ रुपये था, वहीं अब 2026 के संशोधन विधेयक में न्यूनतम सजा पांच वर्ष की और जुर्माना 5 करोड़ रुपये तक बढ़ा दिया गया है। जबकि संगठित पेपर लीक माफिया के लिए पहले पांच से दस वर्ष की सजा थी और न्यूनतम जुर्माना 1 करोड़ रुपये था, जबकि अब न्यूनतम सात वर्ष की जेल है और न्यूनतम जुर्माना 10 करोड़ रुपये कर दिया गया है। जहां तक ब्लैक लिस्ट किये जाने की अवधि का सवाल है तो 2024 के कानून में जहां यह अवधि चार वर्ष की थी, वहीं अब इसे बढ़ाकर 8 वर्ष कर दी गई है। अगर जांच व्यवस्था के तरीकों को देखें, तो पहले जहां डीएसपी या एसीपी स्तर के अधिकारी अथवा केंद्रीय एजेंसी इस मामले की जांच कर सकती थी, वहीं अब इस जांच के लिए केंद्र को स्पेशल टॉक्स फोर्स (एसटीएफ) बनाने का अधिकार दिया गया है। अब पेपर लीक मामले के जांच की समय सीमा और अदालत की संरचना पर भी बदलाव किया गया है। पहले जहां जांच की कोई समय सीमा नहीं थी, वहीं अब दो महीने की अवधि में जांच पूरी करनी होगी और जहां तक नये संशोधन विधेयक व पुराने कानून में अदालत की संरचना के फर्क का सवाल है, तो पहले जहां यह जांच सामान्य अदालतों में होती थी, वहीं अब प्रत्येक राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में पेपर लीक मामलों की सुनवाई के लिए स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट नामित किये जाने का प्रावधान है।
इस तरह देखा जाए तो 2024 का कानून जहां मुख्यत: अपराध को परिभाषित कर सजा तय करता था, वहीं 2026 का संशोधन विधेयक जो अभी तक कानून नहीं बना इसमें तीन नई बातें जोड़ता है। पहली, सजा और जुर्माने में भारी बढ़ोत्तरी। दूसरी, समयबद्ध जांच (दो महीने) और फास्ट ट्रैक कोर्ट के जरिये शीघ्र सुनवाई किये जाने की व्यवस्था करता है। तीसरी प्रमुख बात जो इस संशोधन विधेयक को साल 2024 के कानून से आगे ले जाती है, वह है- स्पेशल टॉक्स फोर्स बनाकर जांच को अधिक संगठित करना। लेकिन पुराने कानून और नये संशोधन में रखे गये बदलावों को विपक्ष पेपर लीक जैसी समस्या के समाधान हेतु पर्याप्त नहीं मानता। उसकी प्रमुख अपत्तियों में से यह है कि एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) और अन्य परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही सुनिश्चित हो, परीक्षाओं के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर स्पष्ट दंड तय हो, डिजिटल सुरक्षा के अनिवार्य मानक और संस्थागत सुधारों की साफ-साफ व्यवस्था हो, जो इस संशोधन में नहीं है। इसी वजह से विपक्ष का तर्क है कि यह विधेयक दंडात्मक तो है, लेकिन रोकथाम के उपायों को लेकर अपेक्षाकृत कमजोर है। सवाल है अगर सिर्फ नये कानून में सजा भर बढ़ा देने से पेपर लीक जैसी महामारी नहीं रुकने वाली, तो आखिर ऐसा क्या करना पड़ेगा, जिससे वास्तव में पेपर लीक जैसी समस्या पर ठोस रूप से विराम लगे?
इसके लिए केवल सजा का प्रावधान नहीं बल्कि समूची व्यवस्था को बदलना होगा। उसे नये तरीके से संगठित करना होगा। सबसे पहले परीक्षा एजेंसियों की ठोस और स्पष्ट जिम्मेदारी तय करनी होगी। आज पेपर लीक होने पर अकसर दलाल और बिचैलिये तो पकड़े जाते हैं, लेकिन परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के जिम्मेदार अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही या तो तय नहीं होती या बहुत कम होती है। इसलिए सबसे पहले संशोधन विधेयक में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि इस अपराध के लिए (पेपर लीक) आखिर उस अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत के लिए कितनी सजा ठोस और स्पष्ट रूप से तय की गई है, जो हर हाल में दी जाए। हां, इस बात को भी नहीं भूलना चाहिए कि सिर्फ पेपर बेचने वाले या पेपर लीक करने वाले ही इस व्यवस्था के अकेले विलेन नहीं हैं, जो लोग लाखों लाख रुपये देकर अपने बच्चों को शॉर्टकट के जरिये इस परीक्षा में पास कराना चाहते हैं, ऐसे प्रश्न-पत्र खरीदने वाले मां-बाप या अभिभावकों के लिए भी एक कठोर सजा सुनिश्चित होनी चाहिए। क्योंकि सिर्फ अपराधी वही नहीं हैं, जो पेपर लीक करते हैं बल्कि अपराधी वो भी हैं, जो इन अपराधियों को पेपर लीक करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। कुल मिलाकर अगर वास्तव में पेपर लीक जैसी महामारी को हमेशा-हमेशा के लिए खत्म करना है, तो पारदर्शिता और जन विश्वास की कसौटी पर सरकार को खरा उतरना होगा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



