कैसे हुआ च्यूइंगम का आविष्कार
च्यूइंगम का नाम सुनते ही बच्चे हो या बड़े सभी के मुंह में पानी भर आता है। यह बच्चों, बड़ों में इतना लोकप्रिय है कि हर कोई इसके स्वाद से भलीभांति परिचित है। शायद ही कोई व्यक्ति होगा जो इसके स्वाद से परिचित न हो। सारे संसार के लोग च्यइंगम को चबाते हैं। यही कारण है कि इसकी मांग दिन पर दिन बढ़ती ही जा रही है। च्यूइंगम सभी देशों में बनाया जाता है लेकिन क्या आप जानते हैं कि च्यूइंगम का निर्माण सबसे पहले किस देश में कब और क्यों हुआ? च्यूइंगम के निर्माण की कहानी काफी रोचक और दिलचस्प है।
च्यूइंगम को सारे संसार में लोकप्रिय बनाने का श्रेय दक्षिण अमरीका को जाता है। दक्षिण अमरीका के कुछ लोग उत्तरी अमरीका के न्यूजर्सी के प्रख्यात उद्योगपति थामस एडमर्स से मिले। ये अपने साथ सापोडिला नामक वृक्ष से निकाले गये एक लसलसा पदार्थ लेकर आये थे। वे चाहते थे कि इसका उपयोग रबर बनाने में किया जाए। थामस के सामने इन लोगों ने इस पदार्थ को चबाना शुरू किया तो वे चबाते ही जा रहे थे। यह चीज खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थी। थामस के पूछने पर पता चला कि यह वही सापोडिला नामक वृक्ष से निकाला गया लसलसा पदार्थ है। एडमस ने स्वयं उस पदार्थ को अपने मुंह में ले लिया। उन्हें यह पदार्थ इतना पसंद आया कि उन्होंने सापोडिला वृक्ष के दूध से रबर बनाने के बजाय ‘एडमस न्यूयार्क गम’ बनाकर बेचना शुरू कर दिया और इस प्रकार च्यूइंगम चल निकला। इस प्रकार 1869 ई. में च्यूइंगम तैयार किया गया। च्यूइंगम की बढ़ती मांग और इसकी लोकप्रियता से न्यूजर्सी में एक फैक्ट्री स्थापित की। च्यूइंगम की बिक्री की आय से एडमस ने दूसरी फैक्ट्री शिकागो में स्थापित की।
उत्तरी अमरीका के प्रख्यात दंत चिकित्सक विलियम रिंगले ने दांतों का कच्चा सांचा बनाने के प्रयास में सापोडिला वृक्ष के गाढ़े दूध का इस्तेमाल किया। उन्होंने उस लसलसे पदार्थ को दांतों के बीच रखकर दबाया। इस प्रयोग के दौरान जब उन्होंने इस लसलसे पदार्थ को बार-बार दांतों के बीच दबाया तो उन्हें बड़ा मजा आया। इसका स्वाद उन्हें इतना अच्छा लगा कि उन्होंने डॉक्टरी का पेशा छोड़कर च्यूइंगम बनाने की फैक्ट्री खोल दी। अपनी फैक्ट्री में बने च्यूइंगम को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से वे टेलीफोन डाइरेक्टरी में लिखे पते पर लोगों के पास नमूने में च्यूइंगम भेजने लगे। इस प्रकार उनके द्वारा बनाये गये च्यूइंगम धड़ल्ले से बाजार में छा गये।
पहले च्यूइंगम में आज जैसी सुगंध नहीं होती थी। इतना ज़रूर था कि उस समय के च्यूइंगम मिठाई से अधिक मीठी होती थी। फिर बाद में डॉक्टर बीमैन ने इसमें ‘पेपसीन’ का उपयोग किया, जो पेट के लिए काफी लाभदायक था। उनके इस आविष्कार से च्यूइंगम की उपयोगिता और अधिक बढ़ गयी। आम जनमानस में च्यूइंगम काफी लोकप्रिय हो गया।
पहले और आज के च्यूइंगम में काफी अंतर आ गया है। आज च्यूइंगम को बनाने के लिए एक विशेष प्रकार के पौधे ‘गुडा सिपैक’ के रस को प्लास्टिक के रूप में उपयोग किया जाता है। ‘गुडा सिपैक’ के रस में कोई सुगंधित पदार्थ तथा एक-दो अन्य पदार्थों को निश्चित अनुपात में मिलाकर पकाया जाता है और फिर जम जाने के बाद छड़ीनुमा बनाकर निश्चित आकार एवं स्वरूप में (जैसे-गोल, चौकोर, तिकोन आदि)। मशीनों के द्वारा काटा जाता है। मशीनों की सहायता से इसकी पैकिंग इस प्रकार के कागजों से की जाती है कि इसमें हवा का प्रवेश न हो सके। इससे लाभ यह होता है कि च्यूइंगम की ताजगी और स्वाद बरकरार रहता है।
इस प्रकार च्यूइंगम का आविष्कार हुआ और इसके स्वाद और सुगंध में बदलाव भी आता रहा। आज सारे संसार के लोग बड़े चाव से च्यूइंगम को चबाते हैं। इससे उनके मुंह और जबड़े का व्यायाम हो जाता है।
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