संजीता चानू को मिली डोपिंग के दंश से मुक्ति


राष्ट्रमंडल खेलों में दो बार की स्वर्ण पदक विजेता भारतीय भारोत्तोलक खुमुकचम संजीता चानू पिछले करीब 8-9 महीनों से डोपिंग मामले में लंबे प्रतिबंध के कारण मानसिक पीड़ा से जूझ रही थी किन्तु वर्ष 2019 उनके लिए बहुत बड़ी राहत लेकर आया है, जब उन पर लगा डोपिंग का दाग पूरी तरह धुल गया है और यह स्पष्ट हो गया है कि संजीता को इतने माह तक उस गलती की सज़ा मिली, जो उन्होंने कभी की ही नहीं। अंतर्राष्ट्रीय भारोत्तोलन महासंघ (आईडब्ल्यूएफ) ने संजीता पर लगाए गए प्रतिबंध को 22 जनवरी से हटा दिया है और इस पर अंतिम निर्णय भी शीघ्र आ जाएगा। संजीता के मूत्र का सैंपल अमेरिका में हुई विश्व चैम्पियनशिप से पहले 17 नवम्बर 2017 को लिया गया था और इस नमूने की जांच के आधार पर उन्हें ‘एनाबॉलिक स्टेरॉयड टेस्टोस्टेरोन’ के सेवन का दोषी मानकर डोप टैस्ट में फेल घोषित करते हुए उन पर 15 मई 2018 को अस्थायी प्रतिबंध लगा दिया गया था। 2014 में राष्ट्रमंडल खेलों में स्वर्ण पदक जीतने के बाद संजीता ने 6 अप्रैल 2018 को गोल्डकोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में महिलाओं के 53 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक जीता था किन्तु आईडब्ल्यूएफ द्वारा उन्हें डोपिंग मामले में दोषी मानने के बाद उनका स्वर्णिम कैरियर दांव पर लग गया था। अपने माथे पर डोपिंग का दाग लगने के बावजूद संजीता ने हार नहीं मानी और आईडब्ल्यूएफ की जांच पर सवाल खड़े किए। उसी का नतीजा रहा कि गत वर्ष जून माह के पहले सप्ताह में मणिपुर के मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने उनके डोपिंग विवाद में केन्द्रीय खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ से हस्तक्षेप करने की अपील करते हुए कहा कि संभव है कि भारोत्तोलक संजीता के नमूने की पहचान में गलती हुई हो। उसी के बाद यह मामला प्रधानमंत्री कार्यालय पहुंचा, जिसने खेल मंत्रालय को इस मामले को देखने को निर्देंश दिया, जिसके बाद यह ज़िम्मेदारी ‘नाडा’ को सौंपी गई। पीएमओ के हस्तक्षेप के चलते ही आईडब्ल्यूएफ ने मामले की पूरी जांच की और अंतत: आईडब्ल्यूएफ द्वारा अपनी गलती स्वीकार करते हुए भारतीय भारोत्तोलक संजीता चानू पर लगाया गया प्रतिबंध हटाने को बाध्य होना पड़ा। जब आईडब्ल्यूएफ  ने संजीता चानू के विफल डोप परीक्षण में अलग नमूना संख्या देने की बात स्वीकार की तो संजीता ने जांच की मांग की। आईडब्ल्यूएफ  ने राष्ट्रीय डोपिंग रोधी एजेंसी (नाडा) को भेजे पत्र में प्रशासनिक गलती स्वीकार करते हुए माना था कि संजीता के लॉस एंजिल्स में 17 नवम्बर को लिए गए नमूने का कोड नंबर 1599000 था जबकि नतीजे के वर्ग में नमूने का कोड नंबर 1599176 था। आईडब्ल्यूएफ द्वारा यह गलती स्वीकारने के बाद संजीता ने आईडब्ल्यूएफ  को पत्र लिखकर जांच करने की मांग की थी और पूछा था कि ऐसी गलती कैसे हो गई? संजीता और भारतीय भारोत्तोलन महासंघ को भेजे ईमेल में आईडब्ल्यूएफ की कानूनी सलाहकार ईवा निरफा ने स्पष्ट कर दिया है कि आईडब्ल्यूएफ  ने अब संजीता पर लगाए गए अस्थायी निलंबन को हटाने का निर्णय लिया है। संजीता शुरू से ही कहती रही हैं कि उन्होंने अपने कैरियर में कभी कोई प्रतिबंधित पदार्थ नहीं लिया और आईडब्ल्यूएफ  के निर्णय के बाद यह स्पष्ट भी हो गया है कि अंतर्राष्ट्रीय महासंघ की गलती के कारण ही पिछले आठ महीने में उन्होंने बेवजह इतनी मानसिक पीड़ा झेली। बहरहाल, बेगुनाही साबित होने के बाद संजीता का यही कहना है कि डोपिंग का दाग लगने पर जो मानसिक पीड़ा उन्होंने झेली, किसी अन्य खिलाड़ी के साथ फिर कभी ऐसा न हो क्योंकि एक खिलाड़ी की साख बहुत कीमती होती है। मणिपुर के काकचिंग जिले के खोनोऊ गांव में 2 जनवरी 1994 को जन्मी खुमुकचम संजीता चानू ने 2006 में भारोत्तोलन में कैरियर की शुरुआत की और बहुत ही कम समय में अपने सुनहरे प्रदर्शन से विश्व पटल पर भारत का नाम स्वर्णाक्षरों में लिखवाने में सफल हुई। 2006 में एक अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी बनने के बाद भी जब मणिपुर सरकार द्वारा उन्हें सिर्फ  एक कांस्टेबल के रूप में नियुक्त प्रदान की गई तो उनके परिजनों को बहुत निराशा हुई थी। बताया जाता है कि एक निर्धन परिवार से संबंध रखने वाली संजीता के परिजनों के लिए जब उसकी पोषक खुराक के लिए खान-पान का इंतजाम करना मुश्किल हो गया था तो संजीता ने यह खेल छोड़ने का मन बनाया था किन्तु परिवार वालों ने संजीता का हौसला नहीं टूटने दिया और वही संजीता आज डोपिंग के आरोप से मुक्त होने के बाद अपने शानदार खेल प्रदर्शन के कारण देश का गौरव बनी हैं। खेल में शानदार प्रदर्शन के बावजूद भारत सरकार द्वारा अर्जुन पुरस्कार न दिए जाने पर वह 2017 में दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर विवादों में भी रही थी। दरअसल जब उन्हें 2017 में अर्जुन पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया तो उसका विरोध करते हुए उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया था। हालांकि हाईकोर्ट द्वारा उनकी अपील खारिज कर दी गई थी। संजीता की दलील थी कि लगातार दो साल से बेहतरीन प्रदर्शन करने के बावजूद उन्हें इस पुरस्कार के लिए नहीं चुना गया जबकि खेल मंत्रालय ने उनसे कमतर परफॉरमेंस देने वाले एथलीट्स को इस पुरस्कार के लिए चुना। संजीता पहली बार उस समय सुर्खियों में आई थी, जब 2011 में उन्होंने एशियन वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप में ब्रॉन्ज मैडल जीता था। उसके बाद उन्होंने 2014 में ग्लासगो कॉमनवैल्थ गेम्स में महज 20 वर्ष की उम्र में 171 किग्रा वजन उठाने वाली मीराबाई चानू को दूसरे स्थान पर धकेलते हुए गोल्ड अपने नाम किया था। भारोत्तोलन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपार ख्याति बटोर चुकी कुंजुरानी देवी को अपना आदर्श मानने वाली संजीता चानू की गिनती आज देश की नामी महिला भारोत्तोलकों में होती है। वह भारत की ऐसी भारोत्तोलन खिलाड़ी हैं, जिन्होंने ग्लासगो में हुए 2014 के राष्ट्रमंडल खेलों में भारोत्तोलन स्पर्धा में 48 किलोग्राम वर्ग में स्वर्ण पदक हासिल कर देश को गौरवान्वित किया था। उस दौरान उन्होंने कुल 173 किलो वजन उठाकर यह कारनामा कर दिखाया था, जिसमें 77 किलोग्राम स्नैच में और 96 किलोग्राम क्लीन एण्ड जर्क में था। 2014 के बाद 2018 में पीठ की चोट से जूझने और सिर्फ 15 दिनों के प्रशिक्षण के बावजूद आस्ट्रेलिया के गोल्डकोस्ट में आयोजित राष्ट्रमंडल खेलों में भी 53 किलोग्राम महिला वर्ग में कुल 192 किलो वजन (84 किलोग्राम स्नैच में और 108 किलोग्राम क्लीन एण्ड जर्क में) उठाकर पुन: स्वर्ण पदक जीतकर संजीता ने इतिहास रच दिया था, जो राष्ट्रमंडल खेलों का एक रिकॉर्ड बना लेकिन उसके चंद ही दिनों बाद उनके माथे पर डोपिंग का ऐसा बदनुमा दाग लगा, जिसने उनकी सारी प्रतिष्ठा को एक ही पल में मिट्टी में मिला दिया। बहरहाल, डोपिंग के आरोप लगने के कारण संजीता एशियाई खेलों और विश्व चैम्पियनशिप में तो भाग नहीं ले सकी किन्तु अब वह इस साल विश्व चैम्पियनशिप खेलकर अगले साल होने वाले ओलम्पिक खेलों के लिए क्वालीफाई करना चाहती हैं और अगर संजीता को 2020 के टोक्यो ओलम्पिक में खेलने का अवसर मिला तो देश को उनसे एक पदक की उम्मीद तो अवश्य रहेगी।