दिमागी बुखार की चपेट में आया बिहार


लगभग हर साल सौ-डेढ़ सौ बच्चों की जान लेने के बाद इंसेफ्लाइटिस हमें याद दिला देता है कि इसे रोकने के मोर्चे पर हम पूरी तरह से विफल रहे हैं। इस बार नया सिर्फ यही हुआ है कि लीची को इसका स्रोत मान लिया गया। मुज़फ्फरपुर के जो नौनिहाल इसका शिकार हुए क्या उनमें से सभी बच्चों ने लीची का स्वाद चखा था? जो लोग लीची में इसका स्रोत ढूंढ रहे हैं, मालूम नहीं एक-एक मृतक परिवार से पूछकर इसका कोई डाटा जुटाया है या नहीं। लेकिन इस समय दक्षिण-पूर्व एशिया और पश्चिमी प्रशांत के 24 देश इंसेफ्लाइटिस की चपेट में हैं। सवाल क्या इन सभी देशों में लीची की पैदावार होती है? विश्व स्वास्थ्य संगठन ( डब्ल्यू.एच.ओ ) के अनुसार, इन 24 देशों में करोड़ों बच्चे, युवा और नौजवान इंसेफ्लाइटिस के रिस्क पर हैं यानी यह संख्या इंसेफ्लाइटिस के जोखिम से बाहर नहीं है ।डब्ल्यू.एच.ओ. के रिकार्ड को देखने पर पता चलता है कि 1871 में पहला ऐसा केस जापान में मिला था। इस वजह से इसका नाम जेई ( जैपनिज इंसेफ्लाइटिस) या जापानी बुखार पड़ा। इसका नया नाम बिहार में ‘चमकी’ पड़ चुका है । यह 1955 की बात है, जब तमिलनाडु के किसी गांव में सबसे पहले कुछेक बच्चों में ‘जैपनिज़ इंसेफ्लाइटिस’ के लक्षण पाये गये। यह वायरल बुखार 1973 में पश्चिम बंगाल, उड़ीसा फिर देखते-देखते धान की खेती वाले भारत के 22 राज्यों में फैल गया। वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन (डब्ल्यूएचओ) ने एक सर्वे में यह भी पाया कि 1970 के बाद जिन इलाकों में किसान, गन्ने की खेती से शिफ्ट कर धान की खेती करने लगे, उन इलाकों में भी जापानी बुखार का विस्तार ज़ोरों से हुआ। 
‘जेई’ का फैलाव ‘क्यूलेक्स स्पीशीज’ की वजह से होता है, इससे प्रभावित सुअरों, और जल में विचरण करने वाले पक्षियों को मच्छर काटते हैं, फिर वही मच्छर इंसान को काटते हैं, जिससे इंसेफ्लाइटिस का घातक वायरस शरीर में प्रवेश कर जाता है । वर्ल्ड हेल्थ आर्गेनाइजेशन ‘डब्ल्यूएचओ’ के मुताबिक, पूरी दुनिया में जैपनिज़़ इंसेफ्लाइटिस के 68 हज़ार मामले सामने आते हैं, उनमें 13 हज़ार 600 से 20 हज़ार 400 के आसपास बच्चे, बड़ों की मृत्यु हो जाती है। कितने लोग इस देश में इंसेफ्लाइटिस से मरते हैं, नीति आयोग और स्वास्थ्य मंत्रालय ने सन 2000 के बाद से कोई आंकड़ा नहीं दिया है। इस तरह के आंकड़े ‘नेशनल डाटा शेयरिंग एंड एक्सेसिबलिटी पॉलिसी’, स्वास्थ्य मंत्रालय और नीति आयोग के सहकार से जारी किये जाते हैं । विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, गर्मी और पतझड़ के महीने में उमस, बाढ़, जल जमाव के ज़रिये धान की खेती, उष्ण कटिबंधीय वातावरण में ‘जेई’ को विस्तार देने वाले ‘क्यूलेक्स़’ मच्छरों को फलने-फूलने में मदद मिलती है। चीन, कंबोडिया, फिलीपींस, वियतनाम, थाईलैंड, कोरिया, म्यांमार, श्रीलंका, बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान, लाओस ये देश ऐसे इलाके हैं जहां धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है, उसके साइड इफेक्ट के रूप में यह भयानक वायरस मौत का सामान बनकर आता है। भारत को छोड़कर बाकी देशों में जेई वैक्सीन लगाने के काम में सरकारें गंभीर दिखी हैं। वैक्सीन लगाने के कार्यक्रम में हमें भारत की तुलना नेपाल से करते हुए थोड़ी शर्म आ रही है कि वहां पर 2019 में इन्सेफ्लाइटिस वैक्सीन लगाने का लक्ष्य 95 फीसदी तक पूरा हो चुका है। यह विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़े हैं। नेपाल जैसे गरीब देश में ‘नेशनल इम्युनाइजेशन प्रोग्राम’ (एनआईपी) ने 2011 से 2018 तक का डाटा उपलब्ध करा रखा है। एनआईपी के अध्यतन आंकड़ों के अनुसार, ‘देश के 75 ज़िले के बच्चों को 95 फीसदी जेई वैक्सीन दी जा चुकी है। 2007 तक नेपाल के 24 ज़िले इन्सेफ्लाइटिस से प्रभावित थे। नेपाल स्वास्थ्य विभाग के इस लक्ष्य को पूरा करने में चीन ने वैक्सीन भेजकर भरपूर मदद की है। नेपाल में 1978 में इन्सफ्लाइटिस का पहला केस मिला था। 1978 से 2012 के बीच नेपाल में इन्सेफ लाइटिस के 29,877 मरीज रजिस्टर किये गये, जिनमें से 5589 की मृत्यु हो गई। नेपाल ने इन्सेफलाइटिस रोकने के वास्ते विश्व स्वास्थ्य संगठन और चीन की मदद ली थी।
इंसेफ्लाइटिस की रोकथाम के लिए 1930 में ‘जेई वैक्स’ नामक एक वैक्सीन तैयार हुआ, जिसे विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सुरक्षित माना था। फ्रांस के लियो शहर में सानोफी पास्टर नामक कंपनी ने इसकी मार्केटिंग शुरू की थी। भारत में  ‘जेई वैक्स’ जैसा वैक्सीन बनने में 82 साल लगे। 2012 में  ‘जीव’ ब्रांड से वैक्सीन ‘बायोलाजिकल ई लिमिटेड’ नामक फार्मा कंपनी ने निकाली, जिसकी कीमत 985 रुपये थी। इस वैक्सीन को सिर्फ एक बार लगाना था, जो मूलत: भारत आने वाले पर्यटकों के लिए तैयार की गई । साल 2013 में कर्नाटक के कोलार ज़िले में ‘भारत बायोटेक इंटरनेशनल’ ने भी वैक्सीन विकसित करने में सफलता पायी। तमाम ट्रायल के बाद यह निष्कर्ष निकला कि यह वैक्सीन एक साल के बच्चे से लेकर 50 साल के प्रौढ़ तक को इंसेफ्लाइटिस से बचा सकती है, साथ ही यह नब्बे फीसदी सुरक्षित है। इस वैक्सीन को दो बार दिया जाना था। पहला 9 से 12 महीने के बीच और दूसरा 16 से 24 महीने के बीच ‘डीपीटी-ओपीवी’ के साथ देना था। लेकिन यह खोज का विषय है कि पिछले पांच-सात साल में इंसेफ्लाइटिस का एपीसेंटर बने मुज़फ्फरपुर, गोरखपुर से लेकर देश के सर्वाधिक प्रभावित 11 ज़िलों के कितने बच्चों को यह वैक्सीन दी गई?  ऐसा नहीं है कि इन्सेफ्लाइटिस अचानक से दस्तक देता है। इसके दुष्प्रभाव में मुज़फ्फरपुर, गोरखपुर और भारत-नेपाल के सीमावर्ती इलाके अधिक हैं। क्या यह संभव नहीं कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की मदद से ऐसा कोई बड़ा अस्पताल बने, जिसमें कम से कम 500 इन्सेफ्लाइटिस पीड़ितों के इलाज के वास्ते अत्याधुनिक सुविधाएं मुहैया हों? ऐसे अस्पताल में रिसर्च के साथ दुनिया के दूसरे इलाकों से स्पेशलिस्टों को बुलाने की व्यवस्था हो। यह सब कुछ सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर है।

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर