मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा के कारण बढ़ रहा है आत्म-हत्याओं का रुझान-2


पर्याप्त कदम : जैसे जंगल की आ़ग पानी की बूंदे से नहीं बुझायी जा सकती, वैसे ही इस समस्या को सुलझाने के लिए सिर्फ एक वर्ग या समाज के एक हिस्से को ही नहीं, अपितु समूचे समाज को आगे आना पड़ेगा। शर्म, चुप्पी, धब्बे, रहस्य जैसे गुप्त दृष्टिकोण की बजाय ‘स्वीकृति’ वाला दृष्टिकोण अपनाना पड़ेगा।  हाल ही में दिल्ली मैट्रो ने सोशल मीडिया पर #Never Give Up# पर मुहिम चलाई थी, जिसमें वह हर रोज़ एक प्रेरणादायक पंक्तियां डालते थे। It's OK to have a bad day or phase अर्थात ज़िन्दगी में बुरा भावनात्मक दौर आना सामान्य है की तज़र् पर यह मुहिम इसलिए शुरू की गई कि 2015 से 2018 के बीच दिल्ली मैट्रो के आगे आत्महत्या करके 45 मौतें हुई थी। हम इसका और विस्तार में अध्ययन करें तो यह आंकड़ा 10 के आंकड़े से कहीं बड़ा है। भारत के स्तर पर 2 लाख और विश्व स्तर पर 8 लाख। इसलिए इस मुहिम को व्यापक बनाने की ज़रूरत है। दूसरा बुनियादी ढांचे के नाम पर न तो पर्याप्त विशेषज्ञ चिकित्सक मौजूद हैं, न ही पर्याप्त अस्पताल और न ही हैल्पलाइन नम्बर। भारत में पंजीकृत मनोचिकित्सकों की संख्या 4 हज़ार है। अर्थात् अढ़ाई लाख लोगों के
लिए एक चिकित्सक जबकि ज़रूरत कम से कम 20 हज़ार लोगों के पीछे एक चिकित्सक की है। यही समस्या अस्पतालों को लेकर भी है। भारत में इस बीमारी के संबंध में सिर्फ 48 अस्पताल हैं, जिनमें से सिर्फ दो या तीन ही अच्छी सुविधाओं वाले हैं। हैल्पलाइन के नाम पर 43 हैल्पलाइनें हैं, परन्तु कहीं भी एक यूनिवर्सल हैल्पलाइन नम्बर नहीं है।  तीसरा सरकार द्वारा इस संबंध में नीति बनाने की ज़रूरत है। हाल ही में सरकार ने आत्महत्या को अपराध मानने के कानून को रद्द कर दिया है, जोकि एक सराहनीय कदम है, परन्तु मानसिक स्वास्थ्य संबंधी सरकार को एक व्यापक तथा ठोस नीति लाने की ज़रूरत है। इसके अलावा इसके बारे में जागरूकता फैलानाभी सरकार की ज़िम्मेदारी है। चौथा तकनीक के तारों में उलझने की बजाये उसको अपना समकक्ष बनाएं। सोशल मीडिया पर गुड मार्निंग, गुड नाइट के सन्देश डालने के साथ-साथ कभी चाय-कॉफी के असली कप पकड़ कर आमने-सामने बैठ कर बातचीत करें। ज़िन्दगी के साथ समस्याएं तो होंगी ही, परन्तु कहते हैं कि बांटने से दुख आधा हो जाता है। बस वही करना है। सुबह 2 बजे वाला दोस्त पूंजी होता है। उसको सम्भाल कर रखें और फोन भी करें (सिर्फ आधी रात को ही नहीं, दिन के समय भी)। पांचवां सतर्क रहें! अपने और अपनों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर। डाक्टर, मनोचिकित्सक, विशेषज्ञ अपनी शिक्षा और अनुभव पर आपको दिमाग की उस अन्धेरी गुफा से बाहर ले आने में सहायता करेंगे, जहां नकारात्मक विचार आपको घेर कर बैठे हैं।  यहां एक रिपोर्ट का भी उल्लेख आवश्यक  है जिसके अनुसार आज भी 44 प्रतिशत लोग मानसिक बीमारियों के लिए बाबाओं की शरण में जाते हैं, जिनके श़फाखानों के बाहर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा होता है, पति को वश में करने के तरीके, रिश्तों में नाकाम, करियर में तरक्की न होने तथा अन्य किसी भी समस्या के लिए मिलें। यह फर्जी ‘डाक्टर’ आपकी जेब और ज़िन्दगी के लिए खतरा हो सकते हैं। अंत में एक ज़िक्र नलिनी का करनी चाहूंगी। 35 वर्षीय बैंक में नौकरी करने वाली नलिनी को देख कर हर कोई आदर्श, खुशहाल, ज़िंदादिल व्यक्ति के तौर पर मिसाल देता है। परन्तु नलिनी भी आम इन्सान की तरह ज़िन्दगी के उतार-चढ़ाव
गुज़ार चुकी है। भावनात्मक उभार के दौरान एक समय ऐसा भी आया था, जब उन्होंने स्वयं को खत्म करने का फैसला कर लिया था। उस समय वह 12वीं कक्षा की छात्रा थी। पुस्तकें पढ़ने की शौकीन नलिनी के हाथ में एक मैगज़ीन थी, जिसके पन्ने वह बड़े बेमन से पलट रही थी। अचानक उसकी नज़र एक हैडलाइन पर पड़ी ‘उसके बाद’ मन की कैफियत जैसा वाक्य पढ़ कर उन्होंने वह कहानी पढ़नी शुरू कर दी, जिसमें एक इन्सान के आत्महत्या करने के बाद उसके परिवार और अज़ीजों को हुए कष्टों का इतना स्टीक वर्णन था कि पढ़ कर वह एक दम सन्न हो गई। नलिनी ने उसके बाद आत्म-विश्वास और सकारात्मक साहित्य से स्वयं को उस उदासी की दलदल से निकाला। आत्महत्या कोई सोचा-समझा नहीं, अपितु आवेग में लिया फैसला होता है। नलिनी के लिए प्रेरणा बनी उस कहानी जैसा साहित्य समय की मांग है। साहित्य जो हाथ पकड़ कर तस्वीर का दूसरा रुख दिखा सके, जो बता सके कि ऐसा दौर हमेशा नहीं रहेगा। चलते-चलते एक आवश्यक बात अगली बार किसी का हाल पूछें तो उसके ‘ठीक हैं’ के जवाब के बाद एक बार पुन: उसके कंधे पर हाथ रखकर पूछना ‘ठीक हो न?’ जवाब, अंदाज़ और संबंध बदले नज़र आएंगे।  (समाप्त)