जनता का राज जनता के लिए नहीं है


जब से भारत स्वतंत्र हुआ, देश को संविधान मिला और जब से विद्यार्थी जीवन प्रारंभ हुआ, लगातार यही पढ़ा-सुना और सुनाया कि भारत देश में जनता का राज जनता के लिए है और जनता के द्वारा भी है। समय बीतने के साथ-साथ स्थिति यह हो गई कि राज्य बनाने के लिए तो जनता मतदान करती है, पर राज्य जनता के लिए नहीं बनता और न ही जनता का है। वैसे भी मतदान शब्द का प्रयोग अब अधिक उचित नहीं लगता, क्योंकि आज के चुनावी तंत्र में मतदान बहुत कम प्रतिशत रह गया है। अधिकतर नोट तंत्र, डंडा तंत्र और नशा तंत्र का प्रभुत्व हो गया है। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि चुनाव से पूर्व मुफ्तखोरी की बौछारें करके ही सत्तासीन नेता जनता से अपने पक्ष में मतदान करवा लेते हैं। कहीं कर्ज माफ किए जाते हैं, कोई स्मार्ट फोन देने की बात करता है, कभी बिजली के बिल चुनावों के निकट कम कर दिए जाते हैं या बसों अथवा मैट्रो रेलगाड़ियों में वर्ग विशेष को मुफ्त यात्रा की सुविधा दी जाती है। स्मार्टफोन और लैपटॉप तक चुनावों से पहले बांटे गए या विजय प्राप्त होने के बाद बांटने की घोषणा कर दी जाती है। यह तो प्रत्यक्ष रिश्वत है, इसके अतिरिक्त कौन नहीं जानता कि देश में नोटतंत्र ने चुनावी तंत्र को अपने शिकंजे में पूरी तरह जकड़ लिया है। चुनाव आयोग तथा अन्य सरकारी तंत्र यह लेखा-जोखा करते थकते नहीं कि किस प्रत्याशी ने चुनाव पर कितना रुपया खर्च किया। निश्चित सीमाओं का उल्लंघन तो नहीं किया, पर सच यह है कि करोड़ों रुपये भी एक-एक प्रत्याशी लोकसभा और विधानसभा के चुनाव में खर्च कर देते हैं। संसद तो दूर की बात अब तो पंचायती चुनाव और नगर निगमों के चुनाव भी लाखों के हैं। हजारों की बात तो पुरानी हो गई। संभवत: इसी का परिणाम है कि जनता बेचारी हो गई। उसके भाग्य में धरने-प्रदर्शन, सरकारी लाठियों को सहना ही रह गया है। सरकार के जो कर्त्तव्य हैं वही जनता के अधिकार हैं, यह सब जानते हैं, पर अपने अधिकारों को पाने के लिए भी बेचारी जनता सरकारी दफ्तरों के धक्के खाती है। लोग मौत के मुंह में धकेले जाते हैं, अपाहिज हो जाते हैं, पर फिर भी आवारा जानवरों को सरकार काबू में करे। इसके लिए लोग प्रदर्शन करते और दुखी होकर जानवरों को इकट्ठा करके किसी जिला अधिकारी के कार्यालय में छोड़ते और वहां से सरकारी पिटाई का शिकार होकर वापस आ जाते हैं। देश में कुत्तों को किसी को भी काटने, मारने की छूट है। आमजन शोर मचाकर पीड़ा कहता है, पर जन-सेवक उस जनता को जानबूझकर या बेबस होकर तिरस्कार देते हैं, उनसे पीछा छुड़ाते हैं। पंजाब ने सबसे पहले उसके पश्चात चंडीगढ़, राजस्थान जैसे कुछ प्रांतों में भी आवारा घूम रहे पशुधन को संभालने के लिए गाय कल्याण कर लगा दिया। करोड़ों रुपये इससे इकट्ठे भी हो गए, सरकारी खजाना भरता गया। नियम पंजाब में यह तय किया गया कि जो भी चौपिहया वाहन खरीदेगा उसे पांच सौ रुपये और दोपिहया वाहन खरीदने वाले को दो सौ रुपये गायों के कल्याण के लिए अतिरिक्त टैक्स देना पड़ेगा। बिजली उपभोक्ताओं को 2 पैसे प्रति यूनिट गाय कल्याण के लिए देना तय किया गया। शराब की बिक्री पर भी यह टैक्स लगाया। देसी शराब पांच रुपये और अंग्रेजी शराब दस रुपये बोतल गाय कर के कारण महंगी की गई। सरकारी खजाना भर गया। जनता को कोई राहत नहीं मिली। आज किसान आवारा पशुओं के कारण खेती बर्बाद होने से परेशान है। शहरों और प्रमुख राष्ट्रीय राजमार्गों की सड़कों पर भी यह बेसहारा आवारा पशु घूमते हैं। एक दिन स्वयं मैंने जम्मू के सांभा से कठुआ तक की तीस मील की दूरी पर दो दुर्घटनाएं आवारा पशुओं के कारण देखी। रोपड़ में एक युवक की मृत्यु हो गई। फाजिल्का में दादा-पोती आवारा पशु के कारण ही मृत्यु के मुंह में पहुंच गए। सरकार नाम की वस्तु दिखाई नहीं देती जो यह समझाए कि इन दुर्घटनाओं के लिए कौन जिम्मेवार है। मृतकों के परिवारों की पीड़ा समझना तो बहुत दूर की बात है। यूं कह सकते हैं गाय कल्याण टैक्स के मोटे नोट खजाने के अंदर और पशु सड़कों पर आतंक का प्रतीक बने घूम रहे हैं। केंद्र सरकार ने जब पशुओं को नियंत्रित करने के लिए आपदा प्रबंधन कोष से राजस्थान को सहायता देनी बंद की तो वसुंधरा सरकार ने बीस प्रतिशत आबकारी टैक्स लगाकर शराब महंगी कर दी। शराब महंगी होना बहुत अच्छी बात है, पर उस बीस प्रतिशत से जो धन सरकार ने कमाया, वह आवारा पशुओं पर नहीं खर्चा गया। चंडीगढ़ में भी टैक्स लगा जो घर में पशु रखते हैं उन पर भी टैक्स लगाया जाता है, पर परिणाम ढाक के वही तीन पात। सवाल यह है कि सरकारें यह कानून क्यों न बनाएं कि जिनके घरों में पशु धन है, पशु कोई भी हो, जब वह दूध नहीं देते, प्रजनन के योग्य नहीं रहते तो फिर वे लोग अपना कर्त्तव्य क्यों भूल जाएं जिनके घरों में इन पशुओं के कारण दूध, दही और मक्खन की बहार रही। सरकार पशुओं के लिए गौशालाएं बनाए और जो लोग नकारा हुए पशुओं का पालन घरों में नहीं कर सकते वे उनके भरण-पोषण का खर्च देकर सरकारी गौशालाओं अथवा पशुओं के संरक्षण गृह में छोड़कर आएं। यह तभी संभव है जब हर पशु का रिकॉर्ड सरकारी कार्यालयों में होगा अन्यथा कोई भी व्यक्ति तभी जानवरों को घर में रखेगा जब तक वे लाभकारी हैं अन्यथा सड़कों पर धकेल देगा। 
वृक्ष सरकार कटवाए तो वृक्षों के पक्ष में खड़े होकर सरकारी डंडा भी जनता ही झेलती है। महाराष्ट्र के आरा में सरकार वृक्ष काट रही है और जागरूक नागरिक लाठियां खाते जेलों में पहुंचाए जा रहे हैं। आज यह सोचना होगा कि आखिर लोकतंत्र का स्वामी कौन है? राज्य जनता चलाती है या जनता को राज्य सरकारें डंडे से चलाती हैं। सच तो यह है कि जनता सरकारों की निर्माता भी है और भाषणों में स्वामी भी। वास्तविकता यह है कि जनता बेबस है, बेचारी है और चुनावी तंत्र से शासक बने नेताओं की लाठी से हांकी जाती है।