दिल है कि मानता नहीं


सुबह अंधेरे ही घसीटा ने दरवाजे पर ‘बांग’ दी। खंखारने की आवाज से ही मैं जान गया कि प्रभु दर्शन देने को आतुर हैं। कारण समझ में आ रहा था कि ‘पावस में ही नहीं टर्राया तो भला टर्राने वाला बनने का मतलब क्या?’ दरवाजे खोलते ही अपने कर कमलों में मिठाई का डिब्बा  लिए घसीटा जी जलवा फरोश हुए। हमने जानना चाहा कि दिवाली की बची हुई मिठाई को ठिकाने लगा रहे हो या अन्य कोई प्रयोजन है इस मिठाई की बलि चढ़ाने का तो बत्तीसी के बचे हुए दांत दिखाते हुए बोले, ‘अरे जो बात सारी दुनिया को मालूम है, क्या तुम्हें नहीं मालूम? अरे भाई इतिहास करवट ले रहा है और अनजान बने बैठे हो।’ ‘इतिहास की करवट तो आप जानो। कुछ देर पहले तक मैं स्वयं करवटें बदलते हुए सोच रहा था कि शेर घास खाने को उतावला क्यों हो रहा है? आखिर ऐसा क्यों है कि जिसका पिता शेर रहा हो, वह अपनी हैसियत खत्म करने पर क्यों तुला है? क्यों नहीं समझ रहा कि लोग कहेंगे कि वह जंगल का राजा बनने की चाहत में शेर की खाल ओढ़े कुछ और ही था?’ 
इतना सुनते ही घसीटा जी की त्यौरियां चढ़ गई। बोले, ‘तो क्या राजा बनने की हसरत पालना गुनाह है? जब तुम उसकी हसरतों पर पानी फेरोगे तो शेर मांद में तो बैठा नहीं रहेगा। कुछ दहाड़- पछाड़ तो जरूर करेगा ही।  तुम साथ दो या न दो, इस बार शेर का पुत्तर अपनी जिद्द पूरी करके रहेगा। इस बार उसकी जिद्द है तो है। भलाई इसी में है कि तुम ही उसका मान रखो।’ ‘मान बढ़ाने के चक्कर में तुम्हारा शेर मान-मर्यादा का ध्यान ही कहां रखता है। जब-तब अक्सर फुंकारता नजर आता है। उसे समझाओं कि धमकियों की भाषा हर समय चलना तो दूर सुनी कही भी नहीं जाती। जो हर समय फन उठाये घूमते हैं, कभी- कभी नाप भी लिये जाते हैं।’ ‘समझने की जरूरत तुम्हें है शेर कभी धमकियों से नहीं डरा करते और न ही कदम पीछे हटाते हैं। ’ घसीटा जी आंखें लाल किये नजर आये तो मैंने ठण्डा पानी प्रस्तुत करते हुए कहा, ‘चचा, आप तो असली सैनिक से अधिक ताव खा रहे हो। जरा सोचो चचेरे भाई को न छोड़ा होता तो कोई माई का लाल तुम्हें छोटा भाई नहीं बना सकता था। इस बार बड़े भाई को धोखा देकर न घर के रहोगे, न घाट के। जिनकी पंगत में बैठने की तैयारी में हो, उनका इतिहास भूगोल क्यों नहीं समझा।इतना सुनते ही चचा का पारा चढ़ गया। ‘दाऊद हमसे आंख नहीं मिला सका। हर छोटा बड़ा गुण्डा हमारे सामने कांपता था। तुम ही हो जो हमें डराने की कोशिश कर रहे हो। हम शेर  हैं, डरने वाले नहीं। ‘चचा अगर आत्महत्या की ठान ली है तो आपको कोई नहीं रोक सकता। एक शुभचिंतक के नाते सजग करना था सो अपना फर्ज निभा लिया। अब छोड़ भी दो ये आसन सिंहासन की कहानी,। मैं लाता हूं आपके द्वारा लाई मिठाई के बाद पीने वाला पानी।’

(अदिति)